March 2011
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Home Minister and rahukal

गृहमन्त्री जी का राहूकाल


आजकाल हमारे गृहमन्त्री जी का राहुकाल चल रहा है। और सिर्फ राहुकाल ही नही शनि दशा का भी प्रभाव है। इसीलिये बौखलाहट में रस्सी को सांप समझते हैं और असली सांपों से मारे डर के मुंह छिपाते घूम रहें हैं। आतंकवाद में शेष दुनिया को जर्द होती हुयी इन्सानियत का सफेद रंग दिखता है, इन्हें भगवा रंग दिखता है।


अब राहुकाल को दूर करने के लिये कुछ उपाय करने भी आवश्यक लग रहे थे। नींद में भी बुरे बुरे सपने आ रहे थे। कभी काश्मीर कभी माओवाद व कभी 24 सितम्बर को आने वाला अयोध्या मस्जिद मुकदमे का फैसला। आधी रात को पसीने से नहाये हुये उठते और अपने ग्रहों को कोसते। पहले जहां क से कुर्सी दिखती थी अब क से काश्मीर दिखने लग गया था। पहले ह से हार्वार्ड समझते थे अब ससुरी ह  से अपनी ही हारी हुयी शक्ल दिख रही थी।  


मरता क्या न करता चले किसी खेवनहार की तलाश में। एक नये बाबा चुनावी कुम्भ में नये नये उतरे थे । नाम राहुल बाबा । बहुतों की नैया पार लगाई थी। आजकल इनके दिये मन्त्रों की बड़ी चर्चा थी। पहुंचे उनके द्वारे कुण्डी खड़खड़ाई। पता लगा बाबा अपनी ही किसी स्पेनिश समस्या के समाधान हेतु अमेरिका गये हुये हैं। खैर मन्त्री जी ने सोचा कि इस कुटिया में तो मिट्टी में ही मन्त्र बसते हैं। बाबा का कोई छोटा मोटा चेला हो तो भी कुछ न कुछ तो बता ही देगा। इस कुटिया में रहने वालों ने कभी किसी विद्यालय या महाविद्यालय की दहलीज तो लांघी नहीं थी। निराली कुटिया है। इस कुटिया में बस जन्म लेने की या कुछ समय भर रह लेने से सारे मन्त्र,उपचार स्वय ही आ जाते हैं। बड़े बड़े पढ़े लिखे सरदार यहां शीश नवाते हैं।


तो मन्त्री जी ने वहां उपस्थित माली से ही पूछ लिया। भैये तुमे इस परिवार के साथ विगत 40 वर्षों से हो।राहुल बाबा भी 40 के ही है। इस घर की छाया तुम दोनो को बराबर ही मिली है। अब तुम ही कोई मन्त्र सुझा दो। माली ने आनन फानन में गृह मन्त्री जी को भगवा आतंकवाद का मन्त्र दिया। कहा जब तक राहुल बाबा अमेरिका से वापस नहीं आजाते तब तक इसी मन्त्र से काम चला लीजिये। । श्री चिदाम्बरम जी ने तुरन्त मीडिया को बुला भगवा आतंकवाद के मन्त्र का जाप शुरु कर दिया। इस मन्त्र के सहारे कुछ दिन नींद भी आ गयी।


राहुल बाबा के आते ही पहुंच गये गृह मन्त्री जी बाबा के दरबार में। पहुंचे तो पाया कि राहुल बाबा अपनी मां के सामने “मैं तो वही SPANISH खिलोना लूंगा” के अन्दाज में बिफरे हुये नजर आये। मन्त्री जी समय का तकाजा समझ अपनी उपस्थिति नही जता बाहर खड़े रहे। अन्दर भारत की सबसे विषम राष्ट्रीय समस्या पर चर्चा हो रही थी। राहुल बाबा के नहीं हो रहे विवाह की। माताश्री राहुल बाबा को समझा रही थी । कि उनके विदेशी मूल के होने की वजह उनके प्रधान मन्त्री बनने में बाधा बनी। अब अगर राहुल बाबा भी अगर एक विदेशी SPANISH सुन्दरी से विवाह कर लेते हैं तो उसके एवज में उन्हें सत्ता सुन्दरी से निश्चित ही हाथ धोना पड़ेगा। उदाहरण से समझा रही थी। राहुल बाबा तुम तुम्हारे पिता के देहान्त के समय इक्कीस के थे। सन 2003 में जब तुम राजनीति में उतरे 33 के थे।ये बीच के बारह वर्ष बेरोजगार हो एम्प्लायमेन्ट एक्सचेंज के चक्कर काट रहे थे। अब जब अपने पारिवारिक व्यवसाय में Board of Directors में जगह मिल ही चुकी है फिर सिर्फ और सिर्फ अपने पारिवारिक व्यवसाय को सर्वोपरि मानो। शेष मुद्दों को गौण।


खैर चिदाम्बरम जी ने भी खांसते हुये कुटिया में प्रवेश किया। राहुल बाबा की माताश्री की भारतीय सरकार में वही स्थिति है जो महाभारत में श्री कृष्ण की थी। यानि धर्म संस्थापनाय संम्भवामि युगे युगे। चिदाम्बर ने मादाम से अपने राहु काल से निकालने का कोई उपाय सुझाने की प्रार्थना की। फिर अपने हाथ भी बंधे होने की गुहार लगाई।  इस इतनी बड़ी विपदा से बंधे हांथों से किसे निबटा जा सकता है मदाम कृपया आप ही कोई रास्ता बतायें।  मादाम से निवेदन किया कि राहुल बाबा तो साक्षात् अश्वमेघ यज्ञ के अश्व सम हैं। इन्हें काश्मीर भेज दीजिये। हुरियत तुरन्त इनकी मिलकियत स्वीकार कर लेगा।


मादाम ने गृहमन्त्री जी से कहा कि अश्वमेघ यज्ञ तो शायद यहां नहीं चले। अगर हुरियत वालों ने राहुल रुपी अश्व को ही बांध लिया तो परीस्थिति सांप नेवले की हो जायेगी। अन्य कोई उपाय बतायें राहु काल से निपटने का।  अब मादाम आप ही तो भारत में एक मात्र श्री कृष्ण हैं तो गीता का पाठ तो आपको ही पढ़ाना पड़ेगा।


मादाम: भई सच्चर कमिटी के सन्दर्भ में अल्पसंख्यकों को कुछ विशेष अधिकार तो हमें देने ही होंगे। उन्हें तो बम व ए के 47 तक चलाने के अधिकार दे देने चाहिये । अब बम एवं ए के 47 से अगर वे पत्थरों पर आ गये हैं तो सुरक्षा बलों को कहिये कि चुप चाप पत्थरों की बौछार सह लें। आई एस आई इन पत्थरबाजों को 300 रुपये दिहाड़ी दे रही है,आप सैन्य बलों को पत्थर खाने की 400 रुपये दिहाड़ी का विशेष भत्ता दे दीजिये। और हां सैन्य बल के लिये पत्थर खरीदने की निविदा क्वात्रौच्चि को दिलवा दें। 


तभी उनके सुरक्षा सलाहकार श्री शिव शंकर मेनन जी भी वहां पहुंच गये।  उन्होंने बताया कि सुरक्षा बल पत्थरों की बौछार सहने के लिये प्रस्तुत न्हीं है, तो अब और कोई जुगत भिड़ानी होगी। मादाम ने चेतावनी स्वरुप फरमाया कि ,खबरदार आप चिदाम्बरम जी के हाथ खोलने के अलावा ही और कोई सलाह दें अन्यथा हमें और कोई नया सलाहकार तलाशना होगा।


राहुल बाबा ने अपनी जुबान खोली। देखिये सारी समस्या पत्थरों की बौछार की है।तो ऐसा कीजिये कि घाटी में एक भी पत्थर नही मिले। तो क्या उठायेंगे और क्या फेंकेंगे। मादाम ने बड़े गर्व से अपने बेटे को निहारा। कहा देखिये बिना हाथ खुलवाये ही अपको आपकी समस्या का निदान मिल गया।


मेनन जी ने मादाम जी की ओर मुखातिब होते हुये उन्हें भारत के मनचित्र से वाकिफ करवाते हुये उसमें काश्मीर दिखाया। कहा मादाम वहां तो पूरी हिमालय पर्वत की श्रींंखला है। पत्थर खत्म करने के लिये तो पूरा हिमालय ही साफ करना पड़ेगा। अब यह काम न तो राज्य सरकार के बूते का है न केन्द्र स्रकार के बूते का।


राहुल बाबा ताजा ताजा ओड़िशा दर्शन कर लौटे थे। वहां से अर्जित अनुभव के आधार पर उन्होंने अपना सुझाव दिया। क्यों न हम हिमालय पर खनन करने का अधिकार वेदान्त उद्योग के अध्यक्ष श्री अनिल अग्रवाल को दे दें। कुछ न कुछ पार्टी फंड में धन भी आजायेगा। और उसमें हिमालय को साफ कर देने की क्षमता भी है। न हिमालय रहेगा न पत्थर तो यह समस्या आराम से सुलझ जायेगी।


या फिर इसके अलावा तो बस एक ही उपाय है कि श्री चिदाम्बरम जी एक विशाल हवन का आयोजन करें। समिधा में भारत का स्वाभिमान फूंक हुरियत के देवताओं को प्रसन्न करें। ऊं स्वाभिमान स्वाहा, ऊं सैन्य सुरक्षा बल स्वाहा, ऊं पांच लाख शरणार्थी हिन्दु स्वाहा, ऊं संविधान स्वाहा, से शायद काश्मीर के नव ग्रह शान्त हो जायेंगे।


मेनन जी फूटे, लेकिन अन्य समस्याओं यथा माओवाद,मन्दिर मस्जिद का क्या निदान है मादाम्। गृहान्त्री जी के हाथ तो यहां भी बन्धे हुये हैं। मादाम ने झुंझलाते हुये फरमाया कि मैं सोचती हूं कि मैं मेनन जी के स्थान पर अरुन्ध्ती राय को भारत का सुरक्षा सलाहकार नियुक्त कर देती हूं। राहुल भी तो वहीं से सीख कर आपको सुझाव दे रहा है। उनके पास ऐसी सारी समस्याओं का शर्तिया सुझाव रहता है।


अब चिदाम्बरम जी को महसूस हो रहा था कि शायद हवन का सुझाव ही आज की परिस्थिति में सर्वोत्तम रहेगा। निकल पड़े समिधा इकट्ठा करने हेतू। ऊं गणतन्त्र स्वाहा। ऊं अखण्डता स्वाहा।




 
   
 
 
   
 







     
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Marital Rape

 उफ्फ ये
पकौड़े क्यों जल गये

क्योंकि जब मैं कढ़ाई में पकौड़े तल रही थी

मानस में
रात की फिल्म चल रही थी

वो अभिसार था
या था वो व्याभिचार…

पकौड़े अब जल कर काले हो गये थे

हां रात जब
तुहारी इच्छा मेरी अनिच्छा पर भारी थी

क्या मैं
समझौता कर हारी थी

पकौड़ों से अब धुआं निकल रहा था… 

मानस कर रहा
था कुछ प्रश्न

क्या विवाह
का पर्याय है रति

क्या सेक्स
ही है सात फेरों की परिणिति ।

मैं गैस पन्द कर सोचने लगी….. 

जब भी मेरी
अनिच्छा पर तुम्हारी इच्छा बली हुयी है

तब पतिव्रता
की तमाम बातें मुझे बेहद खली हैं

हां मैं अगर
हारी हूं

तो जीता कौन
है???

अन्दर तो
कोलाहल है

लब लेकिन मौन
हैं।

बलात्कारी कब
किससे जीत पाया है

सर्वप्रथम वह
तो खुद से ही हारता आया है।

गणिका की भले
ही इच्छा नहीं लेकिन सहमति तो होती है।

मैं तुम्हारी
सहचरी की न इच्छा,न सहमति सिर्फ दुर्गति होती है।

मेरी इच्छा और दुर्गति के अन्तराल को

समाज समझे या
न समझे

तुम तो समझ
लो

प्यार और
बलात्कार में फर्क होता है

तुम्हारे मन
में भले ही प्रेम का भ्रम पला हो

मैं जानती
हूं कि मैने

मौन रह कर भी

सिर्फ
तुम्हें छला है।

लेकिन तुम
भला कैसे जान पाते

ये बातें

क्योंकि तुम
मुझसे नहीं,

सिर्फ मेरी
देह से बातें कर रहे थे

तुमने तो
सुना ही नहीं मेरे नयन क्या कह रहे थे ।

सुनते तो
क्या सह पाते मेरे अंतर्नाद को

शायद बधिर
होना आक्रान्ता की पहली आवश्यकता है

अब दोबारा बेसन घोल कर एक नयी सूर्य की अभ्यर्थना

के साथ एक नया निश्चय

अब और ऐसा नहीं चलने दूंगी

न मैं जलुंगी

न मेरे पकौड़े जलने दूंगी।


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Women are Not Born,They Are Made

लड़कियां पैदा नहीं होती बनायी जाती हैं

कुछ समय पहले बाजार में एक पुस्तक आयी
थी
Men are from Mars and Women are from Venus. इस पुस्तक का कथ्य था कि पुरुष और स्त्री में इतनी अधिक
विषमतायें होती है कि मानो वे दो अलग अलग ग्रहों के प्राणी हों।यथा इनकी जातियां बिलकुल
भिन्न हैं। लेखक ने इस पुस्तक में दोनो के एक ही अवस्था की भिन्न भिन्न
प्रतिक्रिया का उल्लेख कर अपने कथन की प्रामाणिकता को सिद्ध करने का प्रयास किया
है।
यथा किसी भी समस्या से मुखातिब होने से पुरुष, लोगों के पास जा कर अपनी समस्या
बताते हुये उस समस्या का समाधान ढुंढने का प्रयास करता है। महिला भी लोगों के पास
जाती जरुर है,अपनी समस्याओं को लेकर, लेकिन सिर्फ लोगों को अपनी समस्या से अवगत
कराने के लिये।

इसके अलावा एक सुपरीचित अन्तर के तहत दोनो
के लिये प्रेम शब्द के अर्थ में गहरी विषमतायें विद्यमान हैं।

वहीं मेरी धारणा इस विषय में बिल्कुल
उलटी है। मेरा यह मानना है कि लड़किया या लड़के, समाज या परिवार गढता है। पैदाइशी तो
दोनो बच्चे ही होते हैं। समाज अपनी संकुचित धारणा या अधपकी मान्यताओं  के अनुसार दोनो के साथ भिन्न भिन्न व्यवहार कर
उन्हें मानसिक व वैचारिक तौर पर अलाग अलाग रुप में ढालता है।

बायोलोजिकल व जनेन्द्रियों की भिन्नता तो
सर्वविदित है। किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में इन भिन्नताओं की भुमिका
नगण्य है।कुछ फर्क हार्मोन्स का भी रहता है। लेकिन हर्मोन्स का अन्तर व्यक्तित्व
के संवर्द्धन में नगण्य सा ही रोल अदा कर पाता है। लड़कियों को कोमलांगी कहा जाता
रही है। कोमलांगी  शब्द पाषाण युग में सही
था। क्योंकि उस योग में शारीरिक पुष्टता ही शक्ति का मापदण्ड होती थी।

मैथिली शरण गुप्त ने लिखा था कि:

अबला जीवन हाय तुम्हारी यह ही कहानी

आंचल में है दूध और आंखों में पानी।

अगर समाज ऐसे ही गीत गुनगुनाता रहेगा तो
लड़कियों का कोमलांगी बने रहना एक स्वाभाविक प्रक्रिया के रुप में उभर कर आयेगा। यहां
मैं सिर्फ भारत की बात भी नहीं कर रहा हूं। पूरे विश्व में पुरुष प्रधान समाज और
परिवार ने लड़कियों के खिलाफ साजिश के रुप में उन्हें एक अलग ढांचे में ढालने का
प्रयास किया है। आज परीस्थितियां ऐसी हैं कि हम अनजाने में भी सहज स्वभाव वश उस
साजिश में अपना किरदार निभा रहें हैं।

एक और तर्क आता है कि स्त्रियां अपने
कोमल स्वभाव के कारण वे पुरुष की पूरक होती हैं। यह पूरक होने की भुमिका निभाने का
ढोल सिर्फ महिला ही क्यों बजाये। क्या इससे यह अर्थ लगाया जा सकता है कि जिन लोगों
ने विवाह नहीं किया या बिना स्त्री संसर्ग के जीवन जिया है, वे कभी पूर्ण हो ही
नही सकते। दोनो संवाद सत्य की कसौटी खरे नहीं उतरते। भीष्म ने विवाह नहीं किया था
तथापि महाभारत के अन्य किसी भी पात्र की तुलना में एक मात्र कृष्ण के अलावा उनके
चरित्र में सबसे अधिक सम्पूर्णता थी। इसी तरह गौतमी का व्यक्तित्व अपनी पूर्णता के
लिये गौतम बुद्ध का मुखापेक्षी नहीं है , तभी तो कहती हैं कि
सखी रे मुझसे कह कर जाते

 समाज
व परिवार अक्सर बच्चियों को मर्यादाओं की दुहाई दे एक विवादास्पद लक्ष्मण रेखा में
कैद कर उन्हें लड़कियों में तदबील कर देता है।बच्ची से लड़की बनने के लिये उसे एक
तंग दायरे में से होकर गुजरना पड़ता है।

 लिंग
भेद से उपजी इस जाति  भेद को समझने की
आवश्यकता है। लिंग भेद
Physiology का अंग है sociology का नहीं।व्यक्तित्व की सम्पूर्णता के लिये kisiकिसी संगी के साथ का महत्व
निःस्सेन्देह है लेकिन आवश्यकता सिर्फ सत्य के प्रति एक आस्था की है।

अगर पुरुष व स्त्री को समाज एक सा
व्यवहार दे,तो दोनो का व्यक्तित्व एक सा ही उपजेगा।

पुरुष या स्त्री के व्यक्तित्व व व्यवहार
का पार्थक्य परिवेश की देन है लिंग भेद की नहीं। यानि स्त्रियां पैदाइशी स्त्री न
होकर अपने व्यक्तित्व में महज समाज की सोच व व्यवहार को ही प्रतिबिम्बित करती हैं।



MAOISTS

आज की ताजा खबर

माओवादियों ने ट्रेन उड़ाई

पाँच मरे पचास घायल

कल तक यह खबर बासी हो जायेगी

पुलिस के खाते में एक आंकड़े के रुप में

दर्ज़ पायेगी ।

मैं सकुन से हूं की

मैं देश के उस हिस्से में नहीं रहता

जहां ये खबरें जन्म लेती हैं।

मेरे लिये चाय के प्याले के मानिन्द

दस मिनट में यह खबर,

ठण्डी और बेमानी हो जाती है।

राजा जानता है इस हकीकत को

पहचानता है अपनी

नपुंसक व असंवेदनशील प्रजा को।

निश्चिन्त है कि उसका महल

"ज़ेड" श्रेणी की सुरक्षा सीमा में आता है।

 

अदने से मुझ को कभी कभी बेवकूफी

का दौरा चढ़ता है।

और मैं जोरों से कहता हूं

हे राजन् इन बम बनाने वाले

हाथों से पूछो

कि क्यों ये कविता लिखने वाले

हाथ बम बनाते हैं।

राजा अपनी "ज़ेड" श्रेणी की

जड़ संवेदनशीलता के घेरे से

बाहर आये

इनकी पहचान से रुबरु हो

इनसे पूछे कि

क्यों इन पर इस सर्पिलि सुरंग में

बम लगा कर

रोशनी ढुंढने का उन्माद छाया है।

आसमान मोल देने को राजधानी

के हाट में मत बुलाओ

यहां ही इनके गांव में सूरज उगाओ।

राजधानी के हाट में ठगे जाकर ही

तो इन्होंने इस सर्पिलि सुरंग का रास्ता चुना है।

पहचाने उनके त्रास को

समझो कि ये महज आंकड़े नहीं

मनुष्य हैं।

 

 


Bande Matram and Fatwa

भारत शायद भूमण्डल का एक अकेला राष्ट्र होगा जिसके दो दो राष्ट्रीय गीत हैं। "जन गण मन" अधिकारिक या Official तौर पर एवं "बन्दे मातरम्" सम्मानित तौर पर। इस विडम्बना के पीछे एक लम्बा एवं विवादित इतिहास है।

"जन गण मन" स्व: रवीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित है।यह गीत 1911 में सर्वप्रथम कांग्रेस के अधिवेशन में सम्राट जार्ज पंचम की उपस्थिति में गाया गया था। गुरुदेव के कथनानुसार उन्होंने इस गीत के माध्यम से दैवी शक्ति का आह्वान किया था एवं सम्राट जार्ज इस गीत के अधिनायक नहीं थे। इस समारोह के पश्चात इस गीत का कभी भी कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं रहा।

बन्दे मातरम सन् 1870 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने ग्राम प्रवास के दौरान लिखा था।बाद में सन् 1882 में आनन्द मठ नामक उपन्यास में इसे गूंथ कर छापा गया।

सन् 1923 तक बन्दे मातरम् भारतीय आकांक्षाओं एवं अस्मिता का प्रतीक चिन्ह रहा।प्रायः सभी राजनैतिक पार्टियों की सभाओं में यह गीत गाया जाता था।

सन् 1905 के बंग भंग के खिलाफ छिड़ा आन्दोलन सम्भवतः ब्रिटिश भारत में पहला जन आन्दोलन था। इस आन्दोलन में हिन्दु व मुस्लिम दोनों वर्गों ने पूरे जोश के साथ हिस्सा लिया था। इस आन्दोलन का प्रेरणा गीत दोनो वर्गों के लिये "बन्दे मातरम्" ही था।

सन् 1923 में पहली बार काकीनाड़ा में हो रहे कांग्रेस सम्मेलन में मौलाना अहमद अली ने इस गीत का विरोध किया। मूल विरोध का विषय था कि इस्लाम खुदा के अलावा किसी की वन्दना करने की इजाजत नहीं देता और इस गीत में मातृभुमि की वन्दना की गयी थी। बाद में क्षेपक के और पर में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनन्द मठ की पृष्ठभुमि (मुस्लिम जमींदारों के खिलाफ) के कारण इस गीत को इस्लाम विरोधी करार देकर मुद्दा बनाया गया।

ये दोनों मुद्दे तथ्यों से परे सिर्फ अलगाव वादी राजनीति से प्रेरित थे।खिलाफत आन्दोलन,जो कि समग्र रूप से इस्लाम परक था, की सारी बैठकें "बन्देमातरम्" गीत से ही शुरु होती थी। तत्कालीन सारे मुस्लिम नेता यथा अली बन्धु,जिन्ना इस गीत के सम्मान में खड़े होते थे।

"बन्देमातरम्" गीत के ऐतिहासिक महत्व के सन्दर्भ में आनन्द मठ उपन्यास के पृष्ठभुमि की भुमिका अर्थहीन थी। इबादत या वन्दना का मुद्दा हास्यास्पद था। इस विषय में मौलाना अहमद रजा का 1944 में प्रकाशित लेख उल्लेखनीय है। उन्होंने लिखा था """हमारे कुछ मुस्लिम भाई जिन्दगी के कुछ साधारण तथ्य(जन्मभूमि का मातृभूमि रुप)  को इबादत या बुत परस्ती का नाम देकर,नकारने का प्रयास कर रहें हैं।माता पिता के चरण स्पर्श,नेताओं के दीवार पर चित्र टांगना आदरसूचक हैं, इसे बुतपरस्ती की संज्ञा देना गलत है।मेरा निवेदन है कि इस गीत को एक पावन गीत के रुप में ग्रहण करें न कि बुतपरस्ती के रुप में।""

वाममार्गी इतिहासकार मजुमदार ने भी स्वीकार करते हुये कहा था कि " सन् 1905 से 1947 तक बन्देमातरम् भारतीय राष्ट्रभक्तों का प्रेरणा गीत एवं हार्दिक अभिव्यक्ति थी। अंग्रेज पुलिसकर्मी की लाठी खाते हुये या फांसी के तख्ते पर यही गीत उनके होंठों पर था।"

Government of India act 1935 के तहत 1937 में जब चुनाव हुये 11 राज्यों में कांग्रेस की सरकार गथित हुयी। मुस्लिम्स लीग ने एक बार फिर बन्देमातरम् के विवाद को उठाया।इस बार कांग्रेस ने गुत्थी सुलझाने हेतु तीन व्यक्तियों,यथा नेहरू जी,सुभाष बोस एवं जिन्ना, की एक समिति गठित की। इस समिति ने तुष्टीकरण स्वरुप इस गीत को खण्डित कर प्रथम दो पदों को ग्रहण किया।  अगले वर्ष पहली बार 1938 के कांग्रेसी अधिवेशन में सिर्फ पहले दो पदों को ही गाया गया।

अब मुस्लिम लीग ने और भी कड़ा रुख अपनाते हुये मांग की कि "V बन्देमातरम् गीत को सम्पूर्ण रुप से कांग्रेस पार्टी त्यागे,आनन्दमठ से इस गीत का निष्कासन करे एवं उर्दू को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा आदि।" अब यह मुद्दा अलगाव वादी राजनीति का अंग बन चुका था। फिर भी जमीनी हकीकत यह थी कि बन्देमातरम् ही सभी स्वतन्त्रता सेनानियों का प्रेरणा गीत था।

स्वाधीनता के पश्चात भारत के सभी शीर्षस्थ नेता बन्देमातरम् को ही राष्ट्रीय गीत के रुप में देखना चाहते थे।

गांधी जी ने नेता 28अगस्त 1947 को कहा था कि बन्देमातरम् को लयबद्ध कर राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया जाये।

गान्धी जी ने "जन गण मन" के सन्दर्भ में कहा था कि यह एक धार्मिक गीत है।

महर्षि अरविन्द: बन्देमातरम् राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है अतएव इसे स्वतः ही राष्ट्रगीत की संज्ञा प्राप्त होती है।

नेहरू जी की अकेले की मुस्लिम तुष्टी करण की भावना ने बन्देमातरम् को दोयम स्थान दिला ""जन गण मन"" को राष्ट्रीय गीत का स्थान दिलवाया

बन्देमातरम् को मात्र एक गीत कह नकारना भारत के इतिहास को अनदेखा करना है।यह गीत हमारी भारत वर्ष की राष्ट्रीय धरोहर है। इसके खिलाफ फतवा जारी करना एक भीषण अलगाव वादी प्रक्रिया की परिचायक है।

पुनश्च् : बंग्लाभाषा की लिपि में "व" अक्षर की अनुपस्थिति इस गीत को आधिकारिक तौर पर बन्देमातरम् (बंकिम बाबु ने इसे बंग्लाभाषा में ही लिपिबद्ध किया था)ही सही है,वन्दे मातरम् नहीं।

 


Diwali 2009

Couple of snaps and poignant moments of this diwali.Cd not load pics here hence Please visit

http://kuldipgupta.blogspot.com/2009/10/this-year-diwali-had-special-fervor-as.html


Monologue of Death II

कबीर ने मुझे परिभाषित करते हुये कहा था:

जल में कुम्भ,कुम्भ में जल है।

बाहर भीतर पानी॥

फुटा कुम्भ, जल जल ही समाना।

यह तत कथौ ज्ञानी।

यानि आत्मा का परमात्मा में विलय का ही नाम मृत्यु है। लघु का विशाल में समन्वय ही मृत्यु है। लहर का समुद्र में समाहित हो जाना मेरा परिचय है। तत्काल उसके पश्चात उसी लहर में निहित जल से एक नयी लहर का पैदा होना भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब लहर का परिचय समुद्र के अंश के रुप में होता है तो मृत्यु या लहर की समाप्ति अपना स्वरुप खो एक स्वाभाविक महत्वहीन क्रिया हो जाती है।

मृत्यु या जिन्दगी में मृत्यु अधिक महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि बेंजामिन फ्रैकलिन के शब्दों में मृत्यु और Taxes ही जिन्दगी में अवश्यम्भावी हैं। यानि मरना तो सबके लिये जरूरी है।जिन्दगी तो बस कुछ थोड़े से लोगों के हिस्से में आती है।

लोग अन्यथा ही मृत्यु से भय पाते हैं। मरने वाला तो सब वियों से मुक्त हो चिर शान्ति पा जाता है। शारीरिक या मानसिक कष्ट तो सिर्फ उनके हिस्से में आते हैं जो जीवित हैं। श्री  अरविन्द ने तो मृत्यु को, हिन्दू धर्म के हवाले से evolution  या विकास का उपादान बताया है। उनके विचार से मनुष्य भौतिक मृत्यु के पश्चात ही अपने उत्थान व जागरण के अगले सोपान की ओर कदम उठा पाता है। मानव के अतिमानव के राह में मृत्यु एक आवश्यक पड़ाव है। अन्यथा मनुष्य चिरन्तन अपनी स्थिति से सन्तुष्ट अगले सोपान के प्रति अनजान व विकास या evolution से वंचित रह जायेगा।

जैसा मैने अपने पिछले आलेख में कहा था मृत्यु या मेरे साक्षात्कार के समय जो लोग सर उठा कर जी पाते हैं , सिर्फ उन्हीं लोगों ने जिन्दगी जीयी है। नेपोलियन जिसने सम्पूर्ण योरोप पर शासन करने के प्रयास का दुःस्साहस किया था अपने अन्तिम क्षणों में कायरों की मौत मरा। उसके अन्तिम दिनों में वह पूरी तरह टूट चुका था।वह जब जेल गया तो उसके साथ उसके तकरीबन 35/40 मित्र स्वेच्छा से उसके साथ के हेतु जेल गये theथे। उसके सारे साथी अल्प समय में ही अपने टूटे हुये नेपोलियन को बर्दाश्त करने में अक्षम पा ,एक एक कर उसे छोड़ कर चले गये। मैंने या मेरी विभीषिका ने नेपोलियन का सारा स्वरुप बदल दिया।

वहीं रामकृष्ण परमहंस कैन्सर से युद्ध रत एवं मृत्यु के सम्मुख भी शान्त रहते हैं। जब उनके शिष्य उनकी पीड़ा से आहत हो कर सहानुभुति में उनसे कहते हैं कि,"उनकी पीड़ा से उन्हें भी दर्द है,वे कहते हैं कि "दर्द तो जिन्दगी के आवश्यक अंग है। महत्व शान्ति का है और उनका चित सम्पूर्ण रुप से शान्त है।" उस अनपढ कालि के साधक ने मुझ पर पर सुकरात सम विजय पा ली थी और पारस सम जीया। नरेन्द्र नाथ दत्त को विवेकानन्द बना कर अपने पारस होने को सार्थक किया।

व्यक्ति के विस्मरित हो जाने में ही मृत्यु है। जब तक वह लोगों के मानस पटल है जीवित है,तब तक वह अवश्य ही जीवित है।यथा गान्धी की मृत्यु का कारण गोडसे की गोली नहीं,भारत वासियों का उन्हें irrelevant कर देना है। नेहरू जी नेदिल्ली के अशोका होटल को ग्रामीण शौचालाय से अधिक प्राथमिकता प्रदान कर गान्धी की हत्या की। गान्धी जितनी बड़ी शख्सियत की हत्या का सबब कभी भी अकेले अदने आम आदमी के बूते के बाहर का कार्य था।

मुझ पर विजय पा, जीने के लिये मुझसे मित्रता आवश्यक है। मुझे स्वीकार कर जीने में ही जीवन समुचित रुप से जीया जाता है। इसाई मतावलम्बियों में मृत्यु के पश्चात मृतक के चार परीचित, चर्च के प्रांगण में उसके विषय में अपनी अपनी राय प्रदान करते हुये अपना अपना संवाद प्रस्तुत करते हैं। इन में से पहला वक्ता अक्सर नजदीकि रिश्तेदार यथा पत्नी,पुत्र,भाई दूसरा वक्ता उसका पड़ोसी, तीसरा उसका सहकर्मी एवं चौथा उसके चर्च का पादरी होता है। मान लीजिये आप अपनी मृत्यु के समय के वक्तओं के इच्छित संवादों को लक्ष्य मान जीना आरम्भ कर पाते हैं तो वहीं से आपकी मित्रता मृत्यु से हो गयी है और आप अपनी जिन्दगी समुचित तौर पर जी पायेंगे। यथा आपके इच्छित संवाद अपने रिश्तेदार से होंगे कि आपने उसे बहुत प्यार किया एवं अपनी सारी जिम्मेदारियां बखुबी निभाई। यानि इच्छित संवाद को आंक कर आप अपने जिन्दगी के लक्ष्य को अंकित कर रहें हैं। और मृत्यु को स्वीकार व अंगीकार कर एक सार्थक जिन्दगी जी पायेंगे।

 मृत्यु को जीते बगैर कोई भी व्यक्ति न तो जी सकता है और न मर ही सकता है। क्योंकि जो कभी जिया ही नहीं वह मर कैसा सकता है। इस सत्य के प्रतिपादन हेतु मार्टिन लुथर किंग ने कहा था कि "A person who does not have a cause worth dying, his life is not worth living"

चरम लक्ष्य है सुकरात या रामकृष्ण सम मृत्यु पर विजय पाने की।.


A Monologue by Death

मृत्यु  का संवाद

मैं मृत्यु हूं। दुनिया के प्रायः या यों कहूं कि तकरीबन सारे लोग ही मेरी विभीषिका से खौफ़जदा हैं।

या तो लोग मुझे शेष का पर्याय मानते रहें हैं। या जिन्दगी में मेरी भुमिका से परीचित ही नहीं हैं।

यनि जिस तरह लोग अन्धेरे को न भेद पाने की अवस्था में अन्धेरे से डरते हैं या प्लेटो के चिर निरुत्तरित प्रश्न से उत्पन्न शून्य से भयभीत हैं ,उसी तरह मुझसे मुझसे भी खौफजदा हैं। प्लेटो का प्रश्न था मृत्यु के पश्चात क्या। यह प्लेटो के चार चिर निरुत्तरित प्रश्नों में से एक है।

मेरा पहला समुचित परिचय एवं प्लेटो के इस प्रश्न का उत्तर नचिकेता के विषम प्रश्न के उत्तर में यम ने दिया था। जिसे पूर्वी जगत ने कथोपनिषद के नाम से जाना। पश्चिमी जगत आज भी इस प्रश्न को निरुत्तरित ही मानता रहा है।

कथोपनिषद का परिचय था कि मृत्यु जीवन यात्रा का एक पड़ाव भर है। उसी सत्य को प्रतिपादित करते हुये गीता ने उदाहरण के द्वारा सरली करण करते हुये "वासंसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृहोति नरो पराणि" के श्लोक का उद्घोघोष किया।

मै अपना आत्मपरिचय या आत्मविश्लेषण करते हुये कहूं, तो कहूंगा कि मनुष्य के मुझसे साक्षत्कार के काल के भाव में उसकी सारी जिन्दगी प्रतिबिम्बित हो जाती है। मैं उस क्षण उसकी सारी जिन्दगी को प्रतिबिम्बित करता हूं।

उदाहरण के तौर पर सुकरात की मृत्यु के दृश्य को देखें। सुकरात से जब उसके शिष्य पुछते हैं कि उसक अन्तिम संस्कार कैसा होने चाहिये तो  वह कहता है कि "जो मर रहा है वह सुकरात है ही नहीं। न कोई उसे पकड़ सकता है और न हीं कोई उसे मार सकता है।" कितनी सत्यता है इस संवाद में। वो 476 एथेन्स वासी जिन्होंने सर्वसहमति से उसे मृत्युदण्ड दिया था,सब मर चुके हैं लेकिन कालजयी सुकरात आज भी उतने ही मुखर रुप में जिन्दा है। सुकरात के इस एक वाक्य या यों कहें कि उसकी मृत्यु की अवमानना, उसके जीवन के सारे रंगों की एक झलक तो दिखला देती है।

अरस्तु का शिष्य व सम्राट अलेक्जेन्डर अपनी मृत्यु के वक्त कहता है कि "उसके दोनों हाथ से ताबुत से निकाल कर रखे जायें। ताकि दुनिया जान सके कि आधी दुनिया जीतने वाला अलेक्जेन्डर भी खाली हाथा जा रहा है।" यह एक योद्धा के अन्तिम काल का आभास था कि वह व्यर्थ ही सारी जिन्दगी मृग की भांति मरीचिकाओं के पीछे दौड़ता रहा।

जहां सुकरात ने मुझे अच्छी तरह पहचान कर जिन्दगी समुचित रुप से जीयी, वहीं अलेक्जेन्डर जिन्दगी भर भ्रम में जीया और अपने अन्त काल में ही मुझसे परीचित हो पाया।

क्रमशः

 

क्रमशः








Islam and Democracy



आज विश्व
में 57 राष्ट्र में बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है। इनमें से एक में भी आधिकारिक तौर
पर सेक्युलर या गणतान्त्रिक सरकार नहीं है।क्या इस्लाम गणतन्त्र के विरुद्ध है ?
इस विषय पर एक उच्चस्तरीय संवाद की गहन आवश्यकता है

तकरीबन अस्सी वर्ष पहले कमाल अतातुर्क ने पहली बार किसी इस्लामिक राष्ट्र में गणतन्त्र की
स्थापना का प्रयास किया था। आज वहां भी धार्मिक संगठन सरकार के उपर अपनी प्रभुता
काबिज कर पा रहें हैं। मेरे मानस पटल पर 
फिल्म निर्माता हिचकाक की एक घटना अनायास ही कौंध जाती है। हिचकाक अपनी
गाड़ी चलाते हुये कहीं जा रहे थे। वे हठात बोल पड़े के
मैने इससे भयावह कोई दृश्य जिन्दगी में नही देखा है। दृश्य  था सड़क के किनारे एक पादरी एक बालक के सर पर
हाथ रख कर उससे बातें कर रहा था। हिचकाक ने खिड़की से सर निकाला और जोर से
कहा,  
 बच्चे भागो। तुरन्त इससे दूर भागो। संगठानात्मक
धर्म और संगठानात्मक अपराध दोनो में काफी सामंजस्यता है। दोनो को पूर्णरुपेण
मिटाना असम्भव है। दोनो ही अपने अपने आकाओं के लिये विशाल धन का श्रोत सिद्ध होते
रहें हैं।

धार्मिक या यों कहूं कि Religious संगठनों की प्रभुता,
समाज में सोच खत्म करने की प्रक्रिया है।
इस्लाम सिर्फ मजहब से परे एक सविधान देने पर आमदा है। कोई
भी पुस्तक,धर्मग्रन्थ जहां जिज्ञासा या अन्वेषण पर प्रतिबन्ध लगायें वे आततायी हो
जाते हैं।

जिस जमीन पर भी  धर्मगुरु शासन पर हावी हो जायें वहां
गणतन्त्र नहीं पनप सकता। कुरान या शरीयत में आम चुनाव को कहीं भी परिभाषित नहीं
किया गया है। आज इरान में धर्मगुरुओं ने अपने आपको खुदाई या दैवी हवाले से आवाम के
प्रतिनिधियों से वरिष्ठ घोषित कर रखा है। पाकिस्तान और भारत तो एक ही मां से जन्मे
दो राष्ट्र हैं। भारत में चुंकि हिन्दुओं का बहुमत था, सेक्युलर विचार धारा बिना
किसी आन्दोलन के स्वीकृत हो गयी है। गणतन्त्र भी इसी सिक्के का दूसरा पहलु है।  शायद भारत विश्व में एक मात्र राष्ट्र है जहां गणतन्त्र एवं
ADULT  FRANCHISE  को बिना
किसी आन्दोलन या प्रसव पीड़ा के, पहले दिन से ही लागु कर पाया गया । वहीं पाकिस्तान
जिसका जन्म जुड़वे भाई कि मानिन्द एक साथ ही हुआ , आज 62 वर्ष पश्चात भी कार्यकारी
गणतन्त्र से कोसों दूर है।

अगर कोई धर्म अपने ग्रन्थों को सर्वोपरि मनने के लिये मजबूर करता है,वहां गणतन्त्र कभी पनप नहीं
सकता। गणतन्त्र में आवाम सर्वोपरि होता है अन्य कोई भी मृत संस्था
  नहीं। सारे ग्रन्थ एवं तीर्थ स्थल मनुष्य की सोच के आगे बौने हैं।गणतन्त्र का अर्थ है कि हर एक व्यक्ति का महत्व या वजन बराबर रहेगा। हर इकाई को अपने मत का महत्व दिया जाना। किसी खलिफा या मुफ़्ती का वजन अन्य किसी भी नागरिक से अधिक नहीं होगा। गणतन्त्र के लिये नागरिकों को अपनी पारम्परिक पहचान में विशेष परिवर्तन की
कीमत तो अदा करनी ही पड़ेगी।

इस्लाम का अर्थ है समर्पण। धर्म के प्रति पूर्ण समर्पण । यहीं से गणतन्त्र की परम्परा को
आघात पहुंचता है। गणतन्त्र में महत्व शासन का है, तन्त्र का है। अन्य सभी मानक यथा
कुरान या मौलवी की सत्ता इनके सामने गौण हो जाती है।

अपनी अभिव्यक्ति की पूरी स्वतन्त्रता,तर्क को किसी भी नियम से उपर की सत्ता,सत्य की

कसौटी को सर्वोच्च पायदान आदि गणतन्त्र के मूलभुत नींव के पत्थर हैं। किसी भी DOGMA की कोई अड़चन गणतन्त्र की हत्या कर देगी

अगर इस्लाम अपने प्रारुप में थोड़ा परिवर्तन स्वीकार कर ले,थोड़ा लचीलापन ले आये तो गणतन्त्र की
स्थापना जरुर सम्भव है। अन्यथा नहीं।    


Rakhi and Rahul

आजतक हमने तो दो ही स्वयंवर का उल्लेख सुना था।एक जिसमें शिवजी का धनुष तोड़ा गया था एवं दूसरा जिसमें मछली की आंख फोड़ी गयी थी। इस कलियुग में पहली बार तीसरे स्वयम्वर की चर्चा सुनी। राखी भौजी का स्वयम्वर।अब आप कहेंगे कि भौजी के स्वयंवर का क्या अर्थ है ? अरे भई जो भी धनुष तोड़ लेगा कोई न कोई "भाई" ही होगा। तो फिर इन्डिया में हो या न हो हमारे भारत में तो भावी भौजी को भी भौजी कहने का रिवाज है।
तो जनाब हम भी पंहुच गये राखी सावन्त का स्वयंवर देखने। इच्छा तो participate करने की ही थी। लेकिन कुंवारा होना उम्मीदवारी की अनिवार्य शर्त थी। अब भैया क्या पता उ स्वयंवर जीते या न जीते ,लेकिन उस की उम्मीदवारी में जो हम जीत चुके थे उसे तो नहीं गंवा सकते थे।

तो हमने पड़ोस के नेताजी को पटा कर दर्शक दीर्घा का पास बनवा ही लिया। अब ये बात और है कि हमारी संसद तक में दर्शक दीर्घा के पास पर भी मण्डप में प्रवेश सकता है , तो यह तो NDTV का स्टुडियो भर था। सोचा अगर मौका मिला तो ठीक वर्ना चलो दूल्हा नहीं तो कम से बाराती बन दावत तो मिल ही जायेगी । फिर गधे और नट की कहानी याद आयी। क्या पता लड़की रस्सी से गिर ही जाये। या फिर एक और भी सम्भावना थी कि जैसे BAYWATCH की Pamela भौजी ने अपनी हनीमून की विडियो राइट्स बेची थी क्या पता सीरीयल के निर्माता TRP के खातिर यहां भी ऐसा कुछ कर दें।तो भैये सम्भावनायें अनन्त थीं।
राखी जी के स्वयंवर की शर्तें बाहर वीडियो पर सुन्दर एनीमेशन के साथ नाच रहीं थी.:
शर्तें::
1) कुंवारा होना
2) जन्म कुण्डली मिलनी चाहिये
3) सार्वजनिक रुप से कभी किसी को किस्स नही किया होना चाहिये
4) कद लम्बा
5) रंग गोरा
6) उम्र : 25 से अधिक
7) तालीम : चेक पर दस्तखत करना आता हो।
8) अगर प्रेम पत्र अच्छे लिख सके तो एक अतिरिक्त योग्यता मानी जायेगी।
9) थप्पड़ खाने का तजुर्बा भी आवश्यक है।
9)
सब उम्मीदवरों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने बैंक (स्विस) एकाउंट स्टेटमेंट साथ ले कर आयें।
10) शादी की मियाद बैंक (स्विस) स्टेटमेंट के अनुसार तय की जायेगी।

पर्दा उठता है। कोई एक श्रीमान भावी वधु का परिचय करवाते हैं।
ये राखी सावन्त हैं।
इनकी जबान तो बोलती ही है जिस्म उससे अधिक बोलता है।
सबजगह से बोलता है।
इनकी खासियत है कि ये खुद कितना भी नीचें गिरें, बस TRP उपर जानी चाहिये।
लोग इनसे थप्पड़ खाने के लिये भी कतार में खड़े रहते हैं। अब मीका को कोई नहीं जानता था लेकिन एक थप्पड़ ने उसकी तकदीर बदल दी। स्टेज शो एव स्टेज शो के पैसे दोनो मिलने लगे।
अब बगल में एक दिलजले (खट्टे अंगूर वाली लोमड़ी, किस्म के व्यक्ति) बैठे थे। उनसे रह नही गया। फुसफुसाते हुये कान के पास आ कहने लगे ,भाई साहब उस थप्पड़ से मीका की तकदीर तो खुली ही, साथ साथ राखी की तकदीर को भी चार चंद लग गये। इनसे शादी करने के बनिस्बत थप्पड़ खाना अधिक लाभ का सौदा है।
मैंने कहा भाई अभी तक तो मेरा या आपका दोनो(शादी का और थप्पड़ का) का ही कोई चान्स नहीं है। तो फिर दोनों के बीच मोल तोल क्यों किया जाये।
फिर तमाम कुंवारों का परिचय करवाया गया। भारत के सारे WHO IS WHO कुंवारे वहां उपस्थित थे। महेन्द्र सिंह धोनी से लेकर राहुल गान्धी तक।
राखी ने पहले उम्मीदवार के रुप में राहुल गान्धी से मुखातिब होती हैं।
राखी:: आपके बैंक एकाउंट से तो सारा देश वाकिफ है। स्विस भी और इटालियन भी। और आपकी नाम राशि भी हमारे नाम राशि से मिलती है।जब नाम राशि मिलती है तो कुण्डली भी मिल ही जायेगी। पेशे से आप किसान हैं ऐसा आपने लोकसभा के चुनाव अधिकारियों को बताया है।
भारत में आपसे अधिक अमीर किसान तो और कोई नही, होगा। बाकी अन्य खुबियां भी बताइये।
राहुल G :: अब देखिये तुम्हारी प्रेम पत्र वाली शर्त पर तो हमसे बेहतर कोइ नहीं होगा । हमने अपने प्रेम पत्र से पूरा उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान हिला दिया। तुम अपनी cleavage से तो सिर्फ झुमरी तिलैया ही हिलाती रही हो।
मेरे प्रेम के किस्से कोलम्बिया तक फैले हैं।
TRP के लिये जैसे लटके झटके तुम करती हो।मैं भी करता हूं। कभी किसी गांव में रात बिताता हूं, कभी दिहाड़ी
मजदूरी करता हूं। तुम्हारा भी सारा किरदार TRP पर निर्भर करता है मेरा भी। इस TRP के बाहर तुम भी और कुछ भी करने में अक्षम हो ,मैं भी। फर्जी युनिवर्सिटी की डिग्री, चुनाव आयोग में दाखिल कर चुनाव तो लड़ा जा सकता है। CORPORATE SECTOR में कोई नौकरी तो नहीं मिल सकती इसकी बिना पर।
बाकी उम्मीदवार जैसे महेन्द्र सिंह धोनी कि क्रिकेट की कोई जागीर तो है नहीं।बकौल गब्बर जब तक इसका बल्ला चलेगा तब तक इसकी TRP चलेगी। क्या पता बैंक एकाउन्ट पहले खत्म हो या TRP। तो फिर क्या मुकाबला है मुझमें और उसमें। यहां तो खानदानी जागीर है। कम से कम चार पुश्तों से तो चल ही रही है।
मिxxन्द वो तो हमारे मुनीम का बेटा है। युवराज के पास तो सिर्फ भारत के टटपुंजिया बैंकों की पासबुक ही है।
और
फिर जब हमने एक हाथ से हाथी को पछाड़ दिया तो शिव जी का धनुष तोड़ने में क्या देर लगेगी।
मेरी मानो बाकी सब को दफा करो ।
यह सब सुनने के बाद राखी जी ने भी सीता मैया की जय का उद्घोष लगाया। मुझे तुलसी दास जी की चौपाइयां याद आ रहीं थी "याते सब सुधी भुल गयी।। कर टेक रही, पर टारत नाहीं"। तो भैये अब बिल्कुल राम राज्य आने को ही है। "अब हमारे चारण, विप्र, गण मिलि वेद पढ़ाईं" शुरु कर ही दें।


मध्यान्तर  के बाद दूसरे एपिसोड की शूटिंग होनी थी। शूटिंग शुरु हुयी। राहुल भैया ने मंच पर आकर धनुष ढुंढना शुरू किया। राखी ने कहा देखो शायद पलंग के नीचे पड़ा होगा। राहुल ने धनुष निकाला, तो पाया कि वह तो पहले से दो जगह से टूटा हुआ था। राहुल ने कहा कि यह तो पहले से ही टूटा हुआ है। राखी ने झुंझलाते हुये कहा कि देखो मैंने कब कहा कि यह मेरा पहला स्वयंवर है।यह तो मेरा तीसरा स्वयंवर है। भइ क्यों  तमाशा कर रहे हो ।


राखी: देखो मैं समझाती हूं। पहला स्वयंवर टू व्हीलर वालों में से हुया था। दूसरा फोर व्हीलर वालों में से था। अब आज तीसरी बार मर्सीडिज वालों के साथ स्वयंवर है। अब अधिक नखरा किये बिना एक कोने से तुम भी तोड़ लो। तुम्हारी TRP भी 5 साल के बाद क्या पता रहे न रहे। इसीलिये धनुष में चौथे स्वयंवर के लिये भी जगह बची रहनी चाहिये। उधर धोनी जी भी शोर कर रहे थे कि यह क्या खिचड़ी पक रही है। हमें भी धनुष पर जोर लगाने की इजाजत मिलनी चाहिये। अन्य दोनो ने भी सुर में सुर मिलाया। हंगामे की पर्रिस्थिति हो रही थी।   


 


राखी भौजी ने बड़ी समझदारी का परिचय देते हुये कहा कि छोड़िये ये सब। हम चारों को ही जीता घोषित कर चारों से ही ब्याह रचा लेते हैं। पिछली बार भी तो पांच पतियों के वरण का इतिहास है ही। अब मेरी बांछें खिल रहीं थीं कि ये तो चार ही हैं। क्या पता मीका नहीं यार मिका नहीं छींका , हमारे भाग्य का छींका टुट ही जाये।