March 2011
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Marital Rape

 उफ्फ ये
पकौड़े क्यों जल गये
क्योंकि जब मैं कढ़ाई में पकौड़े तल रही थी
मानस में
रात की फिल्म चल रही थी
वो अभिसार था
या था वो व्याभिचार…
पकौड़े अब जल कर काले हो गये थे
हां रात जब
तुहारी इच्छा मेरी अनिच्छा पर भारी थी
क्या मैं
समझौता कर हारी थी
पकौड़ों से अब धुआं निकल रहा था… 
मानस कर रहा
था कुछ प्रश्न
क्या विवाह
का [...]


MAOISTS

आज की ताजा खबरमाओवादियों ने ट्रेन उड़ाईपाँच मरे पचास घायलकल तक यह खबर बासी हो जायेगीपुलिस के खाते में एक आंकड़े के रुप में दर्ज़ पायेगी ।मैं सकुन से हूं कीमैं देश के उस हिस्से में नहीं रहताजहां ये खबरें जन्म लेती हैं।मेरे लिये चाय के प्याले के मानिन्द दस मिनट में यह खबर, ठण्डी [...]


Illusions

जी हां मैं भ्रम बेचता हूं।इस गणतन्त्र की हाट में मैं भ्रम बेचता हूंसब तरह के भ्रम रखे हैं मेरे झोले मेंअलग अलग रंग अलग अलग छाप केपूरा विश्वास है आपकोआपकी पसन्द का भ्रम भी दे पाऊंगाबताईये कैसा भ्रम ढूंढ रहें हैं आपरंग बताइये आकार समझाइयेहां क्या कहा आपनेसफेद रंग में चाहिये है आपकोतो ले [...]


Mirror

जब कभी आईना देखता हूँसिहर उठता हूँहर बार एक नया चेहराहर बार आईना एक बिना धार के चाकु सेमेरे व्यक्तित्व काकुछ न कुछ अंशतराश ही देता है।और फिर मुझे इस क्षीण होते व्यक्तित्व की विभीषिकासे भय लगता है।कभी कभी प्रतीत होता हैकि सम्भवतः अगली बार जब आईना देखूंतो उसमें, मेरा लुप्तप्रायः व्यक्तित्वशायद नजर ही न [...]


Jindagi

क्या जिन्दगी सिर्फ कल आज और कल के अन्तराल को भोगने का नाम है।या इस से परे अन्य कोई भूमिका भी है मनुष्य की जिन्दगी के नाम॥कल आज और कल से परे मनुष्य की जिन्दगी तो एक प्रयास हैबीते हुये कल व आगामी कलको अर्थहीन संज्ञाओं मे परिवर्तित करने का।कम से कम मानव के हिस्सेआयी [...]


Gandhi

गांधी  गांधी तेरे चर्खे पर खद्दरधारी आज कात रहें हैं सोने के धागेपहन जन सेवा का मुखौटारहते लूट खसोट मे सबसे आगे राष्ट्र के तीनों स्तम्भ गाँधी तेरे तीन बन्दरों की नाईंआंख कान मुंह बन्द कर लाचाररक्षक नेता कान बन्द कर तक्षक बन गयेकरते राष्ट्रसेवा के नाम पर व्याभिचार। राजघाट पर हर साल मगरमcछी आंसू बहातेदो अक्टुबार [...]


Sun and Me

मैं क्यों नहीं मान पाता हूंकि सूर्योदय के बाद सूर्यास्त होता हैसोम के बाद मंगल होताऔर आज के बाद कल होता क्योंकि मैं जानता हूँ कि सूर्य का न उदय होता है न अस्तवो तो सिर्फ टंगा खड़ा है, एक खूंटे से ।यह तो है पृथ्वी का घूमना,और मेरी पृथ्वी बद्धता ।जिससे सूरज कभी होता [...]


The Proletariat/ मजदूर

बरगद का पेड़( a poem written by me when i was 20 abt 34 years back) बरगद का पेड़ तो बूढा ही पैदा हुआ थावह सदा झुका रहा हैहथेलियां  जमीं पर टिकी रहीं सूरज के ताप से झुलसताताउम्र चौपाये सा पीठ झुकाये खड़ा रहा वह नासमझ समझता था किसूर्य की किरणें तो जीवनदायिनी हैं। एक दिन हठात् [...]


Mujarim

सोचता बहुत हूं, बोलता नहींबोलना मना है, और सत्य बोलना तो जुर्मजब देखता हूं भीड़ कोयहां से वहां तकसब के सब शरीके जुर्म हैंकोई जमानत पर हैतो कोई फरार है।—-दुष्यन्त कुमार


Godhara

गोधरागोधरा हिरोशिमा की नांई हठात् विश्व के नक्शे पे आ गयाएक गुमनाम सा कस्बा इन्सानियत की कब्रगाह बनसुर्खियों में थायह बात और थी किउन सुर्खियों को सुर्ख रंगइन्सानों के लहू से ही मिला था अब मुझ जैसे समर्थ लोगों कोप्रतिशोध में कुछ और शहरों के नाम सुर्खियों में लाने थेफिर से हुई इन्सानियत की हत्याफिर कुछ [...]