
varsad aave tyare aavjo tame,
mor jevi kala, lavjo tame,
todvani koshish karse aa jagat,
mul unda prem na vavjo tame,
lagni thi sinchya karo ene satat,
najuk hoy che sambandho janjo tame,
bhulo padu aa jag ni galio ma jo,
rah bani hath maro tham jo tame,
shabdo kya hoy che, hriday ni bhasha ne,
maun ni thodi samj rakhjo tame,
aam e ghazal bani jay re ‘kamal”
shabdo bani kagal par lakhao jo tame.
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फिर आज उसकी आंखो मे भर आई है नमी…..फिर आज उस का दिल बेकरार है…….
सामने आईने मे देखा….. तो…….
आईना तो पूरा था…..मगर….
अक्स टुकड़ो मे बिखरा पड़ा था…….
और क्यूँ ना हो आखिर………
आज ही के दी न तो …..वो मिला था उसे…..उसी साहिल पर…..
समंदर के पानी की आवाज़े…….
अभी भी उसके कानो मे गूंज रही थी……
साहिल की गीली रेत…… अभी भी पाव से लिपटी हुई थी…….
शाम बुझ रही थी…..और दिल जल रहा था….
आँखे गुमसुम सी …… और काजल बिखर रहा था…..
इस चार दिवारी मे…..अब उसका जी घुट रहा था….
वो निकली घर से….. और फिर उसी साहिल की और चल पड़ी……
बरसात की हल्की बूंदे…. जो जिस्म पे पड़ते ही गुदगुदी सी लगती थी…..
आज चुभ रही थी उसे…..
वो साहिल पर पहुची ……….और…..
उसी जगह खड़ी रही जहा उस दीं न थी……
सामने देखा तो……… समंदर पहले से ही बेताब था……
एक खयाल से उसका ज़हन भर रहा था……
बस एक ही बार…..वो मिल जा तो…..
बस एक ही बार…..वो मिल जा तो…..

वीरान पलको पे, अब जाके बहार आई है,
दर्द से ही सही, आँखे तो भर आई है.
आज बहोत बेताब है समंदर…आज बहोत सुमसाम्म् है समंदर….
वो बहोत देर से खड़ी थी साहिल की रेत पर….
सामने बेताब समंदर की लहरें….तूफान सी आती थी…..
और…. साहिल से टकराकर फिर समंदर मे लौट जाती थी…
उसके अंदर भी तो आज समंदर उभर रहा था…..
अतीत से आती आवाज़े उसे भी बेताब बना रही थी…..
वो दोनो.. अक्सर आते थे इसी साहिल पर…
और समंदर को देखे… देर तक बैठे रहते थे….
वो थामे रखता था उसका हाथ…. कुछ इस तरह अपने हाथो मे…..
मानो…. उंगलिया पिघलकर एक हो जाती हो जैसे…….
सब कुछ वैसा ही हे आ भी…..
वोही साहिल….वोही समंदर……..
मगर आज…. वो अकेली ही आई हे…..
ये बेताब समंदर भर आया था उसकी आंखो मे….
और उसकी पलको पे कुछ देर ठहरकर…..
फिर उतर जाता है उसकी आंखो मे…..
और इसी बेताबी मे…..
एक कतरा उसकी आंखो से निकला….और…
उसके खुश्क गालो से सरकता हुआ…..
समंदर मे जा मिला……
उस एक कतरे ने सारे समंदर को बेताब बना दिया….
एक मौज समंदर की…..साहिल से टकराकर वापस नही लौटी….
बस इसीलिए …….
आज बहोत बेताब है समंदर…
main guzarta hu aaj bhi….
kabhi kabhi un raston se…..
wo raste jin pe kabhi…..hum saath chala karte the…
wo raste aaj bhi…
tumhare sath ke gwahi de rahe hai…
ye puchte hai mujse….
tera humsafar kaha hai….?
kaha hai tera humsafar…….?
unhi rasto ke kisi mod par….
main chod aaya hu khudko….
yahi soch kar…..
k…
kabhi tum bhi to guzrogi un raston se…..
aur chod aaogi khudko…..
usi mod par…..jahan…..
main chod aaya hu khudko…..
main guzarta hu aaj bhi….un raston se……
———-kamlesh
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