



3 महीने के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤, मैं सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ लाठपà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करके , मैं अपने फिर उसी à¤à¤¨à¤°à¥à¤œà¥€ के साथ अपनी वरà¥à¤•िंग पर लोट आया हू, 30 मई 2010 की रातà¥à¤°à¤¿ मे मेरी सड़क दà¥à¤°à¥à¤˜à¤Ÿà¤¨à¤¾ हà¥à¤ˆ , तीन चार जगह इंजà¥à¤°à¥€ के साथ Left Shoulder Joint Fracture था , Dr.Rupali Mishra, Mr Vinod Sharma के अथक पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ से तà¥à¤°à¤‚त First Aid, Admission के बाद मेरा ऑपरेशन आसानी से हो गया, जिसका मैं सदैव ऋणी रहूà¤à¤—ा , Dr. Prashant Rastogi ने मेरा ऑपरेशन किया था, इनका à¤à¥€ सदैव आà¤à¤¾à¤°à¥€ रहूà¤à¤—ा , Hospital मे Dr. Gunjan Kapoor, Dr. Mohit Sharma, Dr. Mahesh , Dr. Wasim, Vinod Sharma, Shiv Kumar Tomar, Ravindra, Sonu, Ruchi, Krishna, Bajrangi, Tarun, Gulfam का à¤à¤°à¤ªà¥‚र सà¥à¤¨à¥‡à¤¹ और सहयोग मिला, जिसका मà¥à¤à¥‡ सदैव सà¥à¤®à¤°à¤£ रहेगा,
Mintu, Simpu, Dimpal, Arun, Sanjeev, Titu, RadheyShyam, Kitty, Sanju, Anshu, Manni Bhavi राखी, धीरेनà¥à¤¦à¥à¤° à¤à¤¾à¤ˆ ने अपना à¤à¤°à¤ªà¥‚र बहà¥à¤®à¥‚लà¥à¤¯ समय मेरी तीमारदारी मे दिया ,
देर से पता चलने पर गौरव, असीम , डबलई ,
मनटू, संजू, दोनो दीदी ने नाराज़गी वयकà¥à¤¤ करते हà¥à¤ चिंता वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ की और आने के लिठततà¥à¤ªà¤° थे , ये
उनका अपनापन ही था जो मà¥à¤à¥‡ à¤à¤• सà¥à¤–द अनà¥à¤à¥‚ति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हो रही थी. सबकी दà¥à¤† मेरे साथ थी और रहेंगी,
sk saxena




HI ALL friends
Once Again , I come back in your blog world.




सामाजिक नियम,प्रथाओ और बंधनो के कारण भारतीय समाज आपनी गरिमा बनाए हुए है- लेकिन पशिचमी सभ्यता के अवगुणो को अपना कर आधुनिक समाज के युवा , परंपरा को तोड़ने मे आपने शान समझने लगे है, प्रथाए टूट रही है, परंपरा खंडित हो रही है-
ऐसे ही आज प्रेम का मतलब सिर्फ वासनाओ की पूर्ति से लगाया जाने लगा है, पहले प्रेम का इज़हार करते करते समय गुजर जाता था, लेकिन आज प्रेम एक स्वीट आइटम की तरह हो गया है, पसंद आ जाए तो ठीक वरना नापसंद करते देर नही, आजकल प्रेमी प्यार के सहारे, प्रेमिका का तन चाहता है और प्रेमिका तन के सहारे प्यार पाना चाहती है, दोनो अपने इच्छा की पूर्ति के लिए प्रेम विवाह का फ़ैसला लेते है, और यह एक तरह से उचित भी है- आजकल प्रेम विवाह तो कॉमन हो गये है- प्राचीन काल मे प्रेमविवाह को प्रोत्साहन दिया जाता था लेकिन धीरे धीरे जाति प्रथा के चलन के कारण इसमे कड़वाहट आ गयी और प्रेमविवाह को सामाजिक दृष्टि से हेय समझा जाने लगा, सामाजिक प्रथाओ और परंपराओ को तोड़ा जाता है तो समाज उसे आसानी से मान्यता नही देता, और ना है आसानी से स्वीकार कर पता है ……..
वैसे भी विवाह एक सुनिश्चित व्यवस्था है जो सभी धर्मो और वर्गो मे लागू होती है, पुरानी कहावत के अनुसार – विवाह तो स्वर्ग मे तय होते है – ईश्वर ने जोड़ी , पहले से ही तय कर दी है, इंसान के हाथ मे कुछ नही है, कितनी ही कोशिश कर ले, लेकिन रिश्ता वही होता है , जहा ईश्वर को मंजूर होता है, विवाह – जीवन की एक नयी शुरुआत होती है, वास्तव मे वेवाहिक रिश्ते की बुनियाद परस्पर समझ और विश्वास पर केंद्रित होती है, फिर भी मन मे एक यक्ष प्रश्न उठता है की जिसे हम प्यार करते है उस से विवाह करना चाहिये या नही ? क्या प्रेम विवाह सफल हो पाएगा ? क्योंकि प्रेमिका को पत्नी बनाया नही की प्रेमिका का आकर्षण खत्म हो जाता है, प्रेमी , पति बना नही की पति का भी आकर्षण खत्म हो जाता है, जब प्रेमी पति बनता है तो प्रेमिका को लगता है की आकर्षण खो गया है, विवाह के बाद सब कुछ निश्चित हो जाता है, आसमान मे उड़ने वाले, प्रेमी-प्रेमिका को वेवाहिक बंधन मे बंधने के बाद ज़मीनी हकीकत से रूबरू होना पड़ता है, ज़िम्मेदारिया उनके चारो तरफ मडराने लगती है, और प्रेम इन सब मे गुम हो जाता है, यदि प्रेम की माँग की पूर्ति नही हुई तो कलह – झगड़ो की शुरुआत हो जाती है.
प्रेम मात्र वासना की पूर्ति का साधन नही , प्रेम एक पूजा है,
प्रेम का मतलब है – पल पल मे जीना , इसका अहसास और अनुभव केवल वर्तमान मे ही किया जा सकता है, इसका भविष्य सुनिश्चित नही होता, आज के पल मे यदि प्रेम जीया गया है तो कल गहरा जाएगा, लेकिन यह अनिश्चित है, प्रेम एक ऐसा फूल है जो सुबह खिलता है , सांझ होते ही मुरझा जा जाता है आजकल जब लड़के लड़किया एक दूसरे से मिलते है तो वे अभिनय कर रहे होते है, वे अपने चेहरे दिखा तो रहे होते है परंतु अपनी असलियत नही, उनके प्रेम की बुनियाद जूठ पर टिकी होती है, सीधे शब्दो मे कहा जाए तो दोनो ही एक दूसरे को फंसा रहे होते है, लड़का –प्रेमिका को इंप्रेस करने के लिए , किसी की बाइक / कार माँग कर , प्रेमिका को घूमाता है, उधार के पैसे माँग कर महगे शॉपिंग माल और होटल मै ले जाकर प्रेमिका को खुश करता है, प्रेमिका भी , अपने प्रेमी को गुमराह करती है, गाड़ी की सर्विस करने वाला मेकेनिक भी ग्राहक की नई कार् ले जाकर प्रेमिका को अपने को बहुत बड़ा इंजिनियर ही बताता है, और प्रेम मे अंधी प्रेमिका भी कार् मे घूमने के बाद असलियत जानने की कोशिश ही नही करती, जब प्रेमविवाहा के बाद, जब सच का सामना होता है तो ……………..दिल के अरमा आँसू मे बह जाते है.
प्रेमी जब अपनी ड्रीम गर्ल को बरतना मलते देखेगा तो उसे प्रेमिका नज़र नही आएगी जो उठकर तुरंत प्रेम प्रदर्शित करेगी ऐसे ही जब लड़का मेहनत करके घर वापिस आएगा तो उसके शरीर से फ्रेंच पर्फ्यूम की महक नही आएगी - तन से पसीने की गंध आएगी, और यह सहन करना ही होगा. प्रेम प्रद्रशित करने मे जो पैसे पिज़्ज़ा , आइस क्रीम , कोल्ड ड्रिंक, मह्न्गे होटेल , शॉपिंग माल , रेस्टोरेंट मे खर्च होते थे, वो बंद हो जाते है, यदि दोने ने ऐसी परिस्थितयो से अड्जस्टमेंट कर लिया तो सोने पे सुहागा, वरना ………..जिंदगी बोझ बन जाने मे देर नही लगती.
क्या प्रेम विवाह सफल हो पाएगा ? यह चिंतन हर मा बाप और परिवार के सदस्यो को होता है,
प्रेमविवाह करने वाले केवल अपनी दृष्टि से सोचते है, अभिभावक की दृष्टि से नही, वे आपने बड़े बुजर्गो की नाराज़गी दूर करने का प्रयास नही करते , उल्टे उनपर इल्ज़ाम लगाते है की उन्होने हमारे साथ अच्छा व्यवहार नही किया और हमसे संबंध तोड़ लिया, वे यह नही सोचते की उनके माता-पिता की भी कुछ अभिलाषा थी, उन्होने भी सपने देखे थे जिन्हे इन्होने तोड़ दिया, प्रेम के चक्कर मे वो अपना कॅरियर भी खत्म कर लेते है, माता –पिता के विरोध करने पर, लड़की या लड़का मरने की धमकी या घर से भागने की धमकी देकर इमोशनली ब्लॅकमेल करके, माता पिता को मजबूर कर देते है, उन्हे अपने मा बाप के स्वास्थय से भी कोई मतलब नही होता, उन्हे सिर्फ अपनी खुशियो से ही मतलब होता है. ऐसे मा बाप अंदर ही अंदर घुट घुट कर रोग ग्रसित हो जाते है. विवाह से केवल लड़के या लड़की का नाता नही जुड़ता बल्कि दो परिवारो से नाता जुड़ता है, जिससे समाज मे एक ताकत बनती है, महज अपना रिश्ता जोड़ने के लिए , पुराने रिश्ते को नहो तोड़ना नही चाहिए
नयी पीडी अपने पूर्वजो के महान उद्धेस्यो को समझे , अपने माता पिता की भावनाओ को समझे ताकि वे अपने माता –पिता को सुखी बना सके और स्वयं भी सुखपूर्वक रह सके. प्रेम विवाह कोई गुनाह नही लेकिन थोड़ा सयम से काम ले तो दोनो परिवारो की गरिमा बनी रहती और समाज उसे स्वीकार करता है. प्रेम एक पूजा है, सयम इसकी विशेषता है, त्याग प्रेम का कर्म है और प्रेमविवाह ग्रह्स्थ जीवन की व्यवस्था है.




मेरे जीवन का अधिमान बनना है मुझको इंसान
नही है यह इतना आसान
क्योंकि मैं इतना नादान
कब वह शुभ दिन आएगा
जब सपना सच हो जाएगा
दुनिया मे आने का मेरा
प्रायोजन सफल हो जाएगा
लेकिन मुझको भास नही
इतना मुझको ग्यान नही
कही तो मै कुछ कर जाता
इंसान थोड़ा बन जाता
कोई प्रेरणा साथ नही
फिर भी मन को भास नही
सवकर्मो पर देना ध्यान
यही बचा है बस एक ही ध्यान
मेरे जीवन का अधिमान
बनना है मुझको इंसान




बचपन की याद आप सब लोगो से शेयर कर रहा हू.
1982 की बात है जब मैं 7 क्लास मे था , तो नही पता था की प्यार मोहब्बत क्या होती है, मेरे घर के सामने एक भैय्या रहते थे जो 12 क्लास मे थे, जिनका चार मंजिला मकान था , हमारा भी चार मंजिला मकान था . एक दिन की बात है की , अपने घर की छत पर पतंग उड़ाते उड़ाते शाम हो गयी थी, देखा समने वाले भैया के चोथी मंजिल के कमरे की खिड़किया खुली थी और, उस कमरे की बत्ती जलती और बुझ जाती , हम समझे की लाइट खराब होगी, थोड़ी देर बाद देखा की थोड़ी दूर पर एक घर के 5 मंजिल के कमरे से भी लाइट जल्दी जल्दी बुझती और जल जाती . हम देर तक यह देखते रहे , कुछ समझ नही आया, करीब एक हफ्ते तक हमने यही देखा , तो हमने उन भय्या
की मम्मी से कहा – आंटी आपके उपर वाले कमरे की लाइट खराब है जो जलती बुझती रहती है. आंटी ने भैया से डाट कर कहा उपर कमरे की लाइट खराब है और तुम देख नही सकते. मैने फिर कहा ऐसे ही शर्मा अंकल के उपर वाले कमरे मे भी ऐसा ही होता है.,
आंटी ने दोबारा मुझसे पूछा क्या शर्मा अंकल के भी ऐसा होता है, मैने कहा हा. उन्होने फिर भैया को बोला तेरे पापा से शिकायत करूंगी. भैय्या ने हुमे घूर कर देखा तो हम सहम गये, उस दिन भैय्या ने हमारी शिकायत हमारे पिताश्री से कर दी की यह लोग देर तक पतंग उड़ाते रहते है……..बस फिर क्या था हमारी पतंग और हुच्का आग के हवाले कर दिया गया. लेकिन उनके घर भी लाइट जलनी बूझनी बंद हो गई.
फिर उन्होने काले कोयले से अपनी छत की दीवारो पे बहुत बड़ा सपना लिख दिया उसके बाद एक दिन हम अपनी घर की छत पर थे तो देखा भैया अपने पैंट उतार कर धोबी की तरह छत पर जोर जोर से ज़मीन पर मार रहे थे, तोड़ देर बाद देखा तो उसी घर से भी कपड़े को ज़मीन पर पटकने की आवाज़ आने लगी . यह सिलसिला 3 दिन तक चला , चोथे दिन आंटी अपनी छत पर थी , भैया भी थे , आंटी भैया से पूछ र्है थी की तेरी पेंट कैसे फट गयी , मैने ज़ोर से चिल्ला कर कहा भैया अपनी पैंट उतर कार छत पर देर तक पटकते है.
उस दीं आंटी ने फिर मुझसे पूंछा की शर्मा अंकल के भी ऐसा होता है, मैने कहा हा वहा से भी कपड़े पटकने की आवाज़ आती है ,
यह सुनकर आंटी को गुस्सा आ गया और फिर भैइया को बहुत डांटा. और नीचे जाकर जीने मे ताला डाल दिया , भैया ने फिर हमारे पिताश्री से शिकायत कर दी की मै उपर पड़ता हू, और यह लोग शोर मचाकर मुझे डिस्टर्ब करते है. उस दिन से हमारे छत पर जाना बंद कर दिया गया………..
धीरे धीरे हम सब भूल गये. सम्प्रयदिक दंगो के बाद हमको भी मज़बूरन वो मोहल्ला छोड़ना पड़ा क्योंकि मुस्लिम बहुलय इलाका था और हम दूसरी जगह शिफ्ट हो गये ……………………………
वक्त अपनी गति से चलता रहा और हम अपनी पढ़ाई मे व्यस्त हो गये. पढ़ने के बाद अपने कम धंदे मे लग गये ………………एक दिन रविवार को एक दूजे के लिए फिल्म का प्रसारण टी.वी पर हुआ . हम उस फिल्म को देखने लगे, जैसे जैसे वो फिल्म आगे बड़ी तो कमाल हसन और रति को लाइट बुझाते – जलाते थे – कपड़े पटक पटक कर धोते देख कर वो भैइया की हरकते याद आने लगी जब भैइया लाइट बुझाते – जलाते थे – छत पर पेंट पटकते थे. जब हम नही समझ पाए थे उनके प्यार के इंडिकेशन को .
आज वो भैइया कहा है हमे कुछ नही पता. लेकिन उनकी यादे मेरे जहन मे आज तक याद ताज़ा है, अनजाने मे हम उनके प्यार मे विलेन बन चुके थे
जब भी उनकी याद आती है तो मै यह फिल्म एक दूजे के लिए जरूर देखता हू. और इस फिल्म के 2 प्रिंट मैने संभाल कर रखे हुए क्योकि यह फिल्म मेरी बचपन की याद से जुड़ी है.




सुबहा उठकर, नित्यकर्म करके राधे बैठा ही था, अचानक उसे खासी उठी , गला खखाकर वाश बेसिन मे थुका तो , थूक के साथ खून के कतरे देख कर वो घबरा गया , तरह तरह कि आशंका जनम लेने लगी. आशंकित होकर उसने पड़ोस मे कहा तो पड़ोसी ने उसे तुरंत किसी डॉक्टर को दिखाने को कहा . करीब 11 बजे वो एक निज़ी अस्पताल मै गया और 200 रुपये एक प्रसिध डॉक्टर को दिखाया, डाक्टर ने पूरी बात सुनी और अपना रूटिन चेकअप करने के बाद बोला – देखो थूक मे खून के कतरे आये है , यह गंभीर बीमारी के लक्षण है , आप एक एक्सरे . अल्ट्रसाउंड और खून की जाँच कराके मेरे पास आना, रिपोर्ट देख कर मै दवा लिख दूंगा. यह बात सुनकर राधे ने
उसी अस्पताल मे 1500 रुपए देकर एक्सरे, अल्ट्रसाउंड और खून की जाँच कराई. इसी मे आधा दिन निकल गया. जिस कारण उसका कालिज मे फॉर्म और फीस जमा करने का टाइम भी निकल चुका था. शाम को फिर अस्पताल गया , सारी रिपोर्ट लेकर वह फिर उसी डॉक्टर के पास गया , डॉक्टर ने सारी रिपोर्ट देखकर कहा - रिपोर्ट तो नॉर्मल है , हो सकता है की दाँतो मे से खून निकल आया होगा, ऐसा करो किसी डेंटिस्ट को दिखा दो. यह सुनकर राधे बाहर आ गया. और घर जाने के लिए बस स्टॉप पर खड़ा हो गया, तभी उसका दोस्त मिल गया -उसको पूरा हाल बताया , दोस्त कहने लगा अरे यार दाँतो मे ब्रश ज्यादा लग गया होगा , तो खून निकल गया होगा, चिंता मत कर, यह आम बात है. किसी को दिखाने की ज़ररूरत नही है , बात उसके भी समझ मे आ गयी, इतने मे उसकी लोकल बस आ गयी , बहुत भीड़ थी, लेकिन जैसे तैसे , राधे उस बस मे चढ़ गया , थोड़ी दूर् चलने पर अचानक शोर मचने लगा – की जेब कट गयी – बस तुरंत रुक गयी. लेकिन पॉकेटमार गायब था. जिसकी जेब कती वो चिल्ला रहा था की “मै तो लूट गया - महीने भर की कमाई चली गयी ”
राधे उसको देख कर सोचने लगा – लूटा तो मै भी हू, लेकिन मै उसकी तरह से शोर नही मचा सकता ……………………..और यह भी जानता हू की
किसने लूटा लेकिन किसी से कुछ कह नही सकता………वो सोचने लगा की कितनी मेहनत से 4 जगहा टूशन पढ़ाकर पैसे जमा किए थे की आज MA का फार्म फीस के साथ जमा करूंगा | लेकिन अब अगले साल तक इंतज़ार
करना पड़ेगा………..क्योंकि आज फार्म जमा करने की अन्तिम तिथि थी…………




ब्लॉग मित्रो प्रणाम
हमारे ब्लॉग सखा श्री संजय खरे जी ने भगवान चित्रगुप्त और उनकी जयंती के बारे मे जिग्यासा जाहिर की , सच तो यह है की , भगवान चित्रगुप्त जी के बारे मे बहुत कम लोग जानते हे, पद्मपुराण और अन्या ग्रंथो से , मुझे जो भी जानकारी मिली, वही गाथा मे लिख रहा हू | कही कोई त्रुटि रह गयी हो तो निसंकोच मुझे लिखने
का कष्ट करे – मुझे अति प्रसन्नता होगी
पद्मपुराण के अनुसार, ब्रहमा जी की सृष्ठी की रचना क्रम मे देव, असुर , गंधर्व, अप्सरा, स्त्री-पुरुष, जलचर , पशु और पक्षी का जन्म हुआ | ब्रहमा जी ने उनके जीवन की गति भी निर्धारित की, अथार्थ मर्त्यु निर्धारित करी | ब्रहमा जी , ने जीवन लेने का अधिकार का प्रस्ताव कई देवताओ के सामने रखा | लेकिन सबने इसे बहुत बड़ा महापाप समझकर , इनकार कर दिया | तब ब्रहमा जी , ने यमराज को जन्म दिया और जीव को सजा देने और जीवन लेने का अधिकार, उन्हे दे दिया | लेकिन यह आसान काम ना था, क्योंकि संपूर्ण सृष्ठी मे जीव और देह अनंत है, देशकाल ग्यात- अग्यात आदि, भेदो और कर्म भी अंनत है, उसमे कर्ता ने कितने कर्म किए- कितने भोगे, कितने शेष रहे और उनका भोग कैसा है ? हर एक जीव का लेखा-जोखा कैसे रखा जाएगा , इसके लिए यमराज जी सोचकर परेशान थे, तब उन्होने ब्रहमा जी से कहा – प्रभु मुझे कोई ऐसा सहायक दीजिए जो धार्मिक, न्याय, बुढिमान, शीघ्रकारी, लेख कर्म मे विद्वान , चमत्कारी, तपस्वी, और प्रभु आप जैसा ब्रहम्निस्थ और वेद शास्त्र जानता हो. ब्रहमा जी उनकी बात सुनकर मनन करने लगे की उक्त सभी गुणो वाला ग्यानी लेखक होना चाहिए और फिर ब्रहमा जी तपस्या मे लीन हो गये.
पद्म पूरण के अनुसार करीब 1 हज़ार बर्ष तपस्या के पश्चात , कार्तिक शुक्ल की द्वितीया तिथि के दिन जब ब्रहमा जी ने समाधि तोड़ी – तब आपने सामने एक श्यमाल रंग, कमाल नयन, शंख की सी गर्देन, गूड सिर, चंद्रमा के समान मुख, एक हाथ मे कलम-दावात, दूसरे हाथ मे पुस्तिका, कमर मे किरपान बांधे , आगंतुक को देखा
“ आज़ानभूज कारवाल पुस्तक कर कलम मासिभाजनं
तब ब्रहमा जी ने पूछा – वत्स कॉन हो ? तब उसने कहा - प्रभु मे आपकी काया से उत्पन , आपके चित्त मे गुप्त रूप से निवास कर रहा था | आप मेरा नामकरण करे | मेरे लिए जो भी दायित्व हो मुझे सोंप दीजिए | तब ब्रहमा जी ने कहा – पुत्र तू मेरी काया से उत्पन्न हुआ है इसलिए मेरी काया मे तुम्हारी उपस्थिति है – इसलिए तुम्हारी जाति कायस्थ है, चूंकि मेरे चित्त मे गुप्त रूप से निवास कार रहे थे , अत : तुम्हारा नाम चित्रगुप्त है | धरमराज के पूर मे प्राणियो के समस्त सत्कर्म और उपकर्म का लेखा जोखा रखना और तदनुसार संही न्याय करना तुम्हारा दायित्व है, जाओ धरमराज के सखा बनो इसलिए तुम्हारी उत्पत्ति हुई है | तब भगवान चित्रगुप्त जी धरमराज के पास गये, तो महबुद्धि, देवताओ का मान बड़ाने वाला धर्मा धर्म के विचार मे, महाप्रावीण लेखक, क्रम मे महाचतुर पुरुष को देखकर यमराज अति प्रसन्न हुए और उन्हे उनका दायित्व दे दिया |
दीपावली के बाद जो कार्तिक शुक्ल की द्वितीया तिथि ( भैया दूज) को भगवान चित्रगुप्त की पूजा –अर्चना कलम दावात रखकर की जाती है, इस दिन को चित्रगुप्त जयंती कहते है.
यमराज के दरबार मे सभी जीवतमाओ के कर्मो का लेखा जोखा होता है, भगवान श्री चित्रगुप्त जी , कर्मो का लेखा जोखा तैयार करते है, जनम से लेकर मरण तक जीवात्मा के सभी कर्मो को आपने पुस्तक मे लिखते है और जीवात्मा, मर्त्यु के बाद यमराज के समक्ष पहुचता है, भगवान श्री चित्रगुप्त जी , उस जीवात्मा के कर्मो को, एक एक करके सुनते है और कर्मो के अनुसार दंड की वव्यस्था करते है
भगवान चित्रगुप्त जी की दो शादी हुई – ब्रहमन कन्या- सूर्या दक्षिणा, पहली पत्नी थी, जिनसे 4 पुत्र हुए – भानु ( माथुर), विभानु ( भटनागर), विश्वभानु ( श्रीवास्तव) और वीरयभानु ( सक्सेना) के नाम से जाने जाते है. दूसरी पत्नी अरावती क्षत्रीया कन्या थी – जिनसे 8 पुत्र हुए – चारू ( सूर्याध्वज), सुचारू ( अम्बस्थ), चित्रख्या ( गौर), मतिमान ( निगम), हिमवान ( करण), चित्राचरू ( अस्थाना)
अरुणा ( कुल्श्रेस्थ) और जितेंद्री.
भगवान चित्रगुप्त की कायस्थ जाति के संदर्भ मे, मै अगले ब्लॉग मे उल्लेख करूंगा …….
ओम श्री चित्रगुप्त नमः :




देखकर उसके बिखरे बाल
मै सहम सा गया
फटी –फटी सी आँखे
खोफनाक नज़र आ रही थी
जैसे किसी खतरनाक पागल की
लाख कोशिश करके भी
नही गिन पा रहा था
उसके चेहरे पर पड़ी
खरोंचो को
क्योंकि अब तक
बचता- बचता आया हू
आपने आप को
इस तरह के खोफनाक चेहरो से
फिर भी
साहस करके मेने पूछा
कोन हो तुम?
दबी जुबान से वो बोली
“ जिंदगी हू मै “




दोस्तो मुझे यह गाना बहुत पसंद है – काफी पुराना है,
शायद यह मेरी लाइफ पे सटीक बैठता
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फिक्र को धुए मे उड़ाता चला गया
मैं ज़िंदगी………………..
बरबादियो का शोक मनाना फ़िज़ूल था, मनाना फ़िज़ूल था
बरबादियो का जशन मनाता चला गया
मैं ज़िंदगी………………..
जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया,
मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया,
मैं ज़िंदगी……………….
गम और खुशी मैं फर्क ना महसूस हो जहा,
महसूस हो जहा
मैं दिल को उस मुक़ाम पे लाता चला गया
मैं ज़िंदगी……………….
***************
From :
फिल्म : हम दोनो (1961)
गायक: मो. रफी
लिरिक्स: साहिर लुधियानवी
हीरो : देव आनंद,




सभी बंधुओ को दीपावली की हार्दिक शुभकामना
दीपावली के दिन श्री राम अपने 14 वर्ष का बनबास पूरा करके लोटे थे. अयोध्याबासियो का हिरदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लासपूर्ण था.
श्री राम के स्वागत मे अयोध्याबासिओ ने घी की दीपक जलाए और खुशिया मनाई थी जो आज भी परंपरा चली आ रही है. ऋग्वेद और अर्थ्वेद की दो रचाओ मे 14 मर्यादा का वर्णन आता है | जिसमे 7 वयक्तिगत मर्यादा का वर्णन पिच्छ्ले ब्लॉग मे कर चुका हू.
श्री राम मे 7 सार्वभोमिक मर्यादा भी कूट कूट कर बाहरी थी तभी तो मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम को सर्वश्रेस्ट माना जाता है – मैथली शरण गुप्ता ने अपनी रचना “ साकेत” मे लिखा है =
राम तुम्हारा चरित स्वंय ही काव्य है | कोई कवि बन जाए स्वत: संभव है ||
आदर्श -> श्री राम जो मर्यादा पुरषोत्तम का आदर्श इस्तापित किया है, वह सभी रूपो मे सर्वश्रेस्ट उत्तम बन गया है | श्री राम एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई, आदर्श पिता, आदर्श मित्र, आदर्श राजा और आदर्श शिक्षार्थी थे. उनके आदर्श कल भी पावन सात्विक शाश्वत थे, आज भी है और कल भी रहेंगे .
कर्तव्य पुरुष -> श्री राम एक कर्तव्य शील पुरुष थे, उन्होने अपने कर्तव्य से कभी मुह नही मोड़ा और ना ही विचलित हुए , उन्होने जो भी प्रण किया उसे पूरी ज़िम्मेदारी से निभाया, राक्षसो का बध करके मुनियॉ की रक्षा करना, शरणागत की रक्षा करना, उन्होने अपना परम कर्तव्य माना
सुनहु सखा निज कहहु सुभाहु | जन भुसुंदी संभू गिरिजाऊ ||
जो नर होइ चराचर द्रोही, आवे सभैय् सरन तकि मोहि ||
धैर्यवान –> विनर्मशील = श्री राम बहुत ही विनर्मशील थे, उन्होने कभी क्रोध नही किया वरन सबका सम्मान करते थे और सभी विपत्तियो का सामना बहुत ही धेर्यपूर्वक किया | चाहे वो अयोध्या का बनबास प्रकरण हो या सीताजी का अपरहण अथवा रावण से युध, उन्होने कभी भी धेर्य नही खोया और नही उत्तेजना के आवेश मे आए |
अति कोमल रघुबीर सुभाहु| जदपि अखिल लोक कर राउ ||
समान भाव -> वे सभी का आदर सम्मान करते थे चाहे वो किसी भी जाति और वर्ग से जुड़ा हो , उन्होने कभी उच् नीच का फर्क नही माना.
जाति पाती कुल ध्रम बड़ाई | धनबल परिजन गुण चतुराई ||
केवट की नाव मे बेठे हो या शबरी के जूठे प्रेमपूर्वक बैर खाए – उन्होने यही दर्शाया हे की वो सर्वभाव सम्मान रखते थे को भेदभाव नही करते थे. श्री राम केवट की नाव से जब उतरते है तो सोचते है –
केवट उतरी दंडवत कीन्हा | प्रभु सकुच एहि नही कुछ दीन्हा ||
लोक मर्यादा -> श्री राम ने लोक मर्यादा का बहुत ध्यान रखा , राजा के रूप मे उन्होने कभी भी अमर्यादित व्यवहार नही किया, प्रजा की बात सुनकर उन्होने खुद सीता का परित्याग करके लोक मर्यादा का पालन किया जिसे आज भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
आदर भाव -> श्री राम अपने माता पिता गुरुजनो का विशिष्ट आदर करते थे , उनकी हर् आग्या का पालन करते थे, गुरुजनो की, रात्रि मे पैर दबाकर सेवा करते थे , गुरु की आगया से उन्होने जन कल्याण हेतु राक्षस का बध किया तथा ऋषीओ को उनके
अत्याचारो से मुक्ति दिलाई.
प्रजा वत्सल राजा - > श्री राम अपनी प्रजा को अपने परिवार के समान समझते थे, कोई भी व्यक्ति उनके पास अपना अपना दुख सुख सुना सकता था | उनके घरो मे तले नही लगाए जाते थे,
आज भी राम राज्य को आदर्श माना जाता है , श्री राम ने सूर्यवंश की कीर्ति को बढ़ाया तथा अश्वमेघ यग्घ करके
चकर्वर्ति सम्राट बने |
देहिक देविक भॉतिक तापा | राम राज नाही काहुहि ब्यापा ||
सब नर करही परस्पर प्रीति , चलही स्वधरम निरत श्रुति नीति
श्री राम आदि अनादि सनातन पुरुष है , कल्याणकारी , मानवतावादी पुरुष है, वो एक महान आत्मा जो सबके हिरदेय मे निवास करती है., श्री राम नाम की महिमा गान से वेद पुरान भरे पड़े है
सेस सारदा वेद पुराना- सकल करही रघुपति गुण गाना |
जय श्री राम


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