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हो जाएंगे रुखसत एक दिन इस जहाँ से, दूर क्षितिज मे खो जाएंगे |
बस पल भर मे खत्म हो जाएंगे
गिले शिकवा ,
जो शरु हुए थे हमसे |
मिट जाएंगे नामोनिशान ,
जो कायम किए थे इस जहा मे |
यादे भी विस्मृत हो जाएंगी,
निशानिया भी शेष नही रह पाएंगी |
छूट जाएंगे सब रिश्ते नाते ,
इछा – अनिच्छा से निभाते गुजर चुके हे टेन चार द्शक
भोग विलासिता के जीवन मे ,
संघर्ष का कोई मोल नही |
मिथ्या की नीव पर देखा ,
उंचाइयो को छूते हुए लोग,
दिखावे छलावे मे जीते लोग,
छदम भोगविलासिता की मृगतृष्णा मे,
गवा रहे अपना सुख चैन |
देखकर भी विश्वासघात की पराकाष्टा,
रखनी पड़ती हे विश्वास की वही आस्था
विलाखते चेहरो पे दे दी खुशिया ,
तो चेहरे दमकते हसीन लगने लगे,
पाकर साथ किसी का , वही दमकते हसीन चेहरो पे कुटिलता छाने लगी |

कसर नही छोड़ रहा कोई दुश्मनी निभाने मे ,
वक़्त भी कटता जाता हे उनसे रिश्ता निभाने मे |
कैसी ये अजीब परंपरा हो रही कायम
छोड़कर वर्षो पुराना साथ,
बनाते गैरो को सुख के साथी
आती नही लाज तनिक उन्हे 
बनाते हुए हमे दुख के सारथी
यही दुनिया के है  अफ़साने 
देखते देखते 
हो जाएंगे रुखसत एक दिन इस जहाँ से, दूर क्षितिज मे खो जाएंगे |


Tags Categories: Poetry Posted By: SURENDRA SAXENA
Last Edit: 11 Jun 2009 @ 07 01 PM

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