



कभी भोर की बाँट जोह ली , कभी शाम मिल बैंठ बाँट ली
यो ही तपती रह काट ली
बूँद बूँद , रिश्ते पी कर ही ,
बनती एक जिल्द अनुभव की ,
रेशा रेशा, धूप ओढ़कर ,
मिलती कही छाँव मरुस्थल की ,
कभी स्वप्न की आस ओढ़ ली
कभी फ़ांस की चुभन आँज ली
यो ही उजली किरण छांट ली
धुआ गरद ,मिले या चंदन ,
इतना चिंतन का दल दल क्या,
महज़ जिंदगी के नाटक मे ,
इतनी भागदोड - हलचल क्या,
कभी खुशी की सांस खोज ली
कभी नदी की बांह थाम ली
यो ही मन की कथा बांच ली




देखती जब दोपहर को टी वी सीरियल पड़ोस की आंटिया
तब मा हमारी तैयारी करती , हम बच्चो को पढ़ाने की
उड़ेल नही पाती मा की ममता , तब नज़र आती हमे प्रिन्सिपल
जैसे गवर्नर बना कर ही दम लेगी
शाम को खाना बनाने के बाद
शिक्षित होने की सजा भुगतने के लिए
हम बच्चो को लेकर बैठना पड़ता हे, पढ़ाने के लिए
मेरे दोस्तो के पापा , खुद पढ़ाते है
तो सीधे घर आते है ऑफीस से
मा हमारी पढ़ाने मे व्यस्त रहती
पापा अपने दोस्तो के साथ , निकल जाते सैर सपाटे को
छोड़कर मा को मोर्चे पे
मा घर का कम निपटाती , रहता उलझा दिमाग उनका
हमारी पढ़ाई मे
आज की पढ़ाई, किताबो का बोझ
जैसे माता पिता की महत्वकांक्षाओ का बोझ उठाना भारी
होमवर्क इतना अधिक, ना खेल पाते , ना देख पाते टी वी
गुम हो गया बचपन हमारा किताबो मे
और माता पिता की उच्च आकांक्षाओ में
जैसे उनकी आन बान और शान , के केंद्र बिंदु हम बच्चे है
परेशान हो जाते है, अकड़ जाती है गर्दन हमारी
फिर भी करते रहते होमवर्क अपना
सहमे हुए सजा के डर से ,
स्कूल के संचालको ने , उमर से पहले ,बड़ा बना दिया ,
अक्सर मा बन जाती स्टूडेंट हमारी
ड्राइंग - चार्ट और बचा कूचा करती होमवर्क हमारी मा
सुबह सवेरे उठाती जल्दी
तैयार कराती, झटपट नाश्ता करवाती
निकल ना जाए बस , वो भी पकडवाती
वापिस जब स्कूल से आते , खाना खिलाकर
फिर, तैनात हो जाती ,पढ़ाई के मोर्चे पर
हमे पढ़ाने को


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