



पढ़े लिखे बुद्धिजीव वर्ग मैं जब धार्मिक अंधविश्वास बात छिड़ती है तो हमेशा यही निष्कर्ष निकलता हैं की अनपढ़ और गरीब लोगो मैं धार्मिक अंधविश्वास ज्यादा होता हैं बुद्धिजीव वर्ग सारा दोष इन्ही लोगो पर डाल देते हैं | क्या यह अधूरा सच नही हैं यदि व्यापक पहलू से देखे तो अहसास होता है की आज का सबसे ज्यादा शिक्षित और बुद्धिजीव वर्ग धार्मिक अंधविश्वास मैं जकड़ता जा रहा है | सुविधा भोगी गुरुओ के वैभवशाली आश्रमो मैं , जहा धन का खुलकर प्रदशन होता है , सारी सुविधायुक्त विशाल मंडप होते है जहा गुरु जी वचन देते है क्या कभी किसी गरीब को देखा जाते हुए नही - वहा केवल अमीरो और ज्यादा शिक्षित बुद्धिजीव वर्ग और अधिकारी वर्ग ही नज़र आता है | वैभवशाली धार्मिक स्थलो मैं
पैसा कहा से आया - जाहिर सी बात है की ग़रीबो से तो आया नही है, यह सब पढ़े लिखे उच्च्संपन्न और बुद्धिजीव
के ही कारण है , सोमवार को शिवालायो मैं दूध चढ़ाकर भगवान शंकर को प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है परंतु एक बूँद उस गरीब के मासूम को नही दे सकते जिसमे ईश्वर का वास हैं, शिक्षित बुद्धिजीव वर्ग जो कहता है की मैं ज्यादा अंधविश्वासी नही हू वाही सबसे ज्यादा अंधविश्वासी होता है | उसके घर वास्तु शास्त्र के अनुसार ही भवन का निर्माण होता है, वास्तु दोष निवारण के महंगे महंगे यंत्रो से घर सजा होता है. टोने टोटके , आदि धार्मिक कर्मकांड करवाने मैं ज्यादा शिक्षित बुद्धिजीव वर्ग और अधिकारी वर्ग मे एक होड़ सी लगी हुई है, पढेलिखे अधिकारियो - डॉक्टरो - इंजिनीयर्स - वकीलो के विवाह के लिए जन्मपत्री का मिलान करना अनिवार्य हो गया हैं क्या यह अंधविश्वास नही तो और क्या है इन्ही लोगो के अंधविस्वास के कारण आज सभी टी वी चॅनेल पर भविस्यवाणी ने सुबह के समाचारो की जगह ले ली हैं, महंगे रत्न -मोती , रुद्राक्ष की डिमांड यूही ही नही बढ़ गयी, इसको लेना वाला कोई अनपढ़ गरीब नही होता है , शिक्षित वर्ग ही होता है


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