



इस खुदगर्ज जहाँ मे न जाने कब मिलेगा सुकून सपनो के साकार हो जाने का सुकून
हर कोई दूसरे से आगे निकलने की चाह मे
लगा रहता है दूसरे को गिराने की कोशिश मे
मिलता हे कुछ बन जाने का सुकून
हर रिश्ता , हर रिश्ते को लगता हे ढो रहा है
हर अपना , अपनो से दिन प्रतिदिन दूर हो रहा है
ऱिस्तो को टूटने से बचा पाने का सुकून
किसी के मिट जाने पे मुस्कराता है कोई
किसी के बन जाने पे द्वेष दिखाता है कोई
इंसान का इंसान हो जाने का सुकून
वहा मंदिर था , यहा मस्जिद है
हर धर्म को जैसे अपने ही ज़िद है
मज़हब की दीवारो के गिर जाने का सुकून
इस खुदगर्ज जहाँ मे न जाने कब मिलेगा सुकून
सपनो के साकार हो जाने का सुकून


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