16 Jul 2009 @ 5:17 PM 

इस खुदगर्ज जहाँ मे न जाने कब मिलेगा सुकून सपनो के साकार हो जाने का सुकून

हर कोई दूसरे से आगे निकलने की चाह मे
लगा रहता है दूसरे को गिराने की कोशिश मे
मिलता हे कुछ बन जाने का सुकून

हर रिश्ता , हर रिश्ते को लगता हे ढो रहा है
हर अपना , अपनो से दिन प्रतिदिन दूर हो रहा है
ऱिस्तो को टूटने से बचा पाने का सुकून

किसी के मिट जाने पे मुस्कराता है कोई
किसी के बन जाने पे द्वेष दिखाता है कोई
इंसान का इंसान हो जाने का सुकून

वहा मंदिर था , यहा मस्जिद है
हर धर्म को जैसे अपने ही ज़िद है
मज़हब की दीवारो के गिर जाने का सुकून

इस खुदगर्ज जहाँ मे न जाने कब मिलेगा सुकून
सपनो के साकार हो जाने का सुकून

Tags Categories: Poetry Posted By: SURENDRA SAXENA
Last Edit: 16 Jul 2009 @ 05 26 PM

EmailPermalinkComments (4)
\/ More Options ...
Change Theme...
  • Users » 45907
  • Posts/Pages » 43
  • Comments » 253
Change Theme...
  • VoidVoid « Default
  • LifeLife
  • EarthEarth
  • WindWind
  • WaterWater
  • FireFire
  • LightLight

About



    No Child Pages.

Friends



    No Child Pages.

Guest Book



    No Child Pages.