18 Aug 2009 @ 3:19 PM 

घर मे कहलाते थे पापा जी जब थे वो उँचे सरकारी ओहदे पर
था बड़ा रॉब घर मे
हुक्म टाल नही सकता था कोई
बहू बेटे आगे पीछे घूमते, नतमस्तक होकर
ज़बान थकती नही थी कहकर पापा जी पापा जी
खुश बहुत होते सुनकर - पापा जी
लेकिन ईश्वर को यह मंजूर था नही
रिटाइयर्मेंट हुआ, खुश थे सब
मिला था उन्हे 40-50 लाख
देख कर दुनिया की बदलती तस्वीर
सोचकर बुढ़ापा सही कटेगा
कुछ ना दिया औलाद को अपनी
फिक्स किया सारा पैसा , आराम करने की सोची
लेकिन आराम तो हराम था
दुर्दिन शुरू हो चुके थे उनके
बहू बेटो की जुबान पर था नही - पापा जी
सुनेने को मिल रहा था बुड्ढा –बुड्ढा
बुड्ढा सनकी हो गया, बुड्ढा सठिया गया
बुड्ढे का दिमाग खराब हो गया
बुड्ढा टोकता है, बूढ़ा कब मरेगा
बुड्ढा सोने नही देता, बुड्ढा शोर ज्यादा करता
कान पाक गये उनके, लेकिन परवाह नही की
अपने बेटे बहुए पराए हो गये
फटकता नही था कोई उनके पास
दुखी बीवी के आगरह पर उन्होने बेटो को
अलग –अलग मकान दिलवा दिया
यह क्या – उनके तो दिन फिर गये
उनको वही रुतबा हासिल हो गया
सब पापा जी पापा जी कहने लगे
होड़ मच चुकी थी बेटो बहुओ मै
पापाजी का आदर सत्कार करने की
कोई पीछे नही रहना चाहता था
सब नालायक, लायक हो गये
क्योकि पैसा अभी बहुत था उनके पास
खुश थे मम्मी जी और पापाजी
बूढ़े बुढ़िया के खोल को
बेटो और बहुओ ने उतार फेंक दिया
पापाजी का खोल पहना दिया
और फिर कह ने लगे पापाजी पापाजी

( यह एक सच्ची  घटना है )

Tags Categories: Poetry Posted By: SURENDRA SAXENA
Last Edit: 18 Aug 2009 @ 03 40 PM

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