



कितने खुशनसीब लोग थे जिनका अपना भरपुर परिवार होता था | जंहा दादा –दादी, ताऊ – ताई, चाचा –चाची , माता-पिता सब मिल जुलकर अनुशासन् मे रहते थे | जहाँ त्याग और आदर्श भावबाओ को आत्मसात करके दुख –सुख के सहभगीदार होते थे | जिस कारण सब तनाव मुक्त या चिंता रहित होते थे | सबके अपने बच्चे होते थे जिन्हे पूरे परिवार का भरपूर लाड़ प्यार मिलता था | बच्चे भी ऐसे प्यार भर माहोल मे भावनातमक सुरक्षा पाते हुए अपनी भोली – भली सूरतो और खेलो से घर परिवार मे हसी खुशी की लहरो से गूँजयमान करते रहते थे | लेकिन यह सब आज किस्से कहानिया बन कर रह गये है |
परिवार तो आज भी हे परंतु उनकी शक्ल बदल गयी है | आजकल , घर सभी सुविधाओ से युक्त महज एक गेस्ट हाउस बन कर रह गया है | दंपत्ति सुबह सवेरे काम पर निकल जाते हे और शाम को देर से लोटते है | बच्चे स्कूल - क्रेच- कम्पूटेर – टूशन या म्यूज़िक क्लास या फिर साइबर केफे मे पूरा दिन बिताते है | रात्रि मे भोजन के नाम पर नज़दीक के फास्ट फुड कॉर्नर से खाने की चीज़े मंगवा कर परिवार खाना खाता है |
सच तो यह है की कामकाजी दंपत्ति बहुत ही व्यस्त है , दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद उन्हे हर महीने एक बड़े अमाउंट का चेक मिलता है जिस से वे हर भॉतिक सुख सुविधाए खरीद सकते हे, पर इन सबके बीच उनके पास कमी है तो वक्त की जिसे कोई खरीद नही सकता | यही कारण हे की आजकल ऐसे दमपत्तिओ की एक नई ज़मात खड़ी हो गयी है है | जो परिस्थ्तिवश ऑफीस की ज़िम्मेदारियो या अन्य कारणो से बच्चो की ज़िम्मेदारियो से मुक्त है या फिर केरियर की ज़िम्मेदारियो से उन्हे बच्चे को जनम देने की फुरसत नही | यह लोग आजकल आधुनिक समाज मे DINKS यानी डबल इनकम नो किड्स के नाम से पुकारे जाते है |
DINKS यानी डबल इनकम नो किड्स वाली कल्चर को अपना रहे है, यह एक ऐसी कल्चर हे की जिसमे डबल इनकम के चक्कर मे बच्चा ना पैदा करने का फ़ैसला लिया जाता हे. बच्चे होंगे तो ज़िम्मेदारिया बढ़ेगी जिस कारण कॅरियर डिस्टरब होता है | जिसका असर इनकम पर भी पड़ता हे | सीधी सी बात हे की कामकाजी महिला के प्रेग्नेंट होने और बच्चे के जन्म के बाद तरह तरह् की परिस्थितिया उत्पन्न होती है | मजबूरन छुट्टी लेनी पड़ती हे , और केरियर पर असर पड़ता है | केरियर से दंपत्ति को बहुत ही लगाव होता है | वे जिंदगी को अपनी खुशी के अनुसार जीना चाहते हे | अपनी कमाई को खर्च करने के लिए स्वतंत्र और तां निर्भर ही रहना चाहते हे | इसीलिए बच्चो की परवरिश से बचने के लिए नो किड्स की प्लॅनिंग करते हे “ इन दंपत्तियो के पास नोकरी की व्यस्तता इतनी है की पति पत्नी के पास समय का अभाव हो गया है इसका सीधा सा कारण है यह पीडी उन्मुक्त माहोल मे पली बढ़ी हुई है | उनकी मा भी वर्किंग वोमेन रही हे | उन्होने बचपन से ही मा , बहन – भावी को भी नोकरी करते देखा हे | बड़ी – बड़ी डिग्री हासिल करके पत्नी सिर्फ इसलिए नोकरी छोड़ दे या काम से ब्रेक ले ले की उसे सिर्फ बच्चे पैदा करने हे | दूसरी और ऐसे लोग जो संतान से वंचित ना जाने कोन कोन सी शारारिक और मानसिक त्रासदी झेल रहे है और दूसरे ऐसे लोग जिन्हे कमाई के आग बच्चा नही चाहिए
लेकिन काम की आपाधापी मे यह क्यो भूल रहे हे की यह भागdor आखिर किस लिए और और किस कीमत पर ? क्या ऐसी सोसाइटी कीं नीव रख रहे है जो सिर्फ मै और मेरा तक ही सीमित होगी | कमाने के लिए ही तो नही कमाते , जिंदगी मे इतना उंचा उठने की कोशिश करना क्या ठीक हे की धरती पे पाव ही ना टिक सके.
DINKS अपने DINKS होने के लिए तर्क देते है की हम भले शारीरिक उपस्थिति का समय नहे देते है पर भावनात्मक उपस्तिथी है | पर क्या समय की यह कमी महज़ आपने लिए जीना सिखा कर स्वार्थी नही बना रही | हम बच्चो को समय नही दे पाएंगे इसलिए उन्हे जन्म ही ना दिया जाए यह तो एक प्रकार का पलायन है | व्यकितत्व का विकास तो समस्यायो से जूझकर उनसे उपर उठकर आगे बड़ने मे ही होता है | जब फुरसत होगी तब बच्चो को अपने जीवन मे लाएंगे के स्थान पर उनके लिए फुरसत निकालने की कोशिश होनी चाहिए | जिंदगी का असली मजा अकेले सुख भोगने मे नही बल्कि परिवार के साथ रहकर अकेलेपन को दूर कर जीने मै है |






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khoobsurat post ke liye dhanywad .is prakar ke post padne se aadmi ek shahwat satye ko samjhne ki taref badat he.
rekha dave
good thinking thanks for sharing.
aapka kehna bilkul sahi hai..aur antim lines mein aapne bahut achchi baat kahi hai…vaasav mein DINKS jaisa culture apnane vaale puri manushya jaati ka apmaan kar rehe hain…parivaar samaj ki sabse choti ikaai hai aur ek achche samaj ka nirmaan bhi tabhi ho sakta hai jab ham parivaar rupi vriksh ko swabhavik rup se falne fulne dein
kitana sundar chintan kiya hai aapane….haan ye hamare sanskritik dharatal par chot karata hai, bikharate parivar aur ekaki jiwan shaili sukh ki aadharshila kaise ho sakati hai,vo Dada,dadi,…ki god me hi pallawit hoti hai.achchhe chintan ki badhai……………….Kim.
Nice Post!
…..hum ki jagah ab ””mai”” ne jo le li hai…….nice post sir
aap pahle sakhs hain jinhone kuchh kaayde ka likha hai…very touching…
mai om ki baat se bilkul sehmat nahi hoon ki aurat hi dosi hai…..any ways very touching post ….DINKS me believe kerne walo ko ye sochna chahiye i wo jo din raat itni mehnat ker rahe hai wo kiske liye ? aise logoe ka budhapa bahut dookhdaai hota hai , bahut akela hota hai !!!
aapke is post ki to tarif karni padegi, aapne bahut hi gambhir aur sochniy vishay par ye post likha hai. aapka kahna sahi hai aaj aadmi paiso ko pariwar se jyada ahmiyat dene laga hai. ek samay tha jab aadmi ke liye family first wali baat hoti thi par aaj ke samaj ko dekh ke lagta hai ki family last position par aa gai hai. par ek baat wo bhool jate hain ki unki asli daulat unka pariwar hai na ki wo daulat jiske piche wo pagalon ki tarah bhag raha hai.
Yahe Apne bahut sahi likha he, Hamara samaj ek bahut hi bhayawah position me ja raha he, jahan hoga to sirf shunya (0), Aur kuch nahi, Iska karan he Aurat, Agar aurat apni mahatwakanksha to simit kar leti he to hura samaj humara pariwar Tutne se bach sakta he.
OM