



ब्लॉग मित्रो प्रणाम
हमारे ब्लॉग सखा श्री संजय खरे जी ने भगवान चित्रगुप्त और उनकी जयंती के बारे मे जिग्यासा जाहिर की , सच तो यह है की , भगवान चित्रगुप्त जी के बारे मे बहुत कम लोग जानते हे, पद्मपुराण और अन्या ग्रंथो से , मुझे जो भी जानकारी मिली, वही गाथा मे लिख रहा हू | कही कोई त्रुटि रह गयी हो तो निसंकोच मुझे लिखने
का कष्ट करे – मुझे अति प्रसन्नता होगी
पद्मपुराण के अनुसार, ब्रहमा जी की सृष्ठी की रचना क्रम मे देव, असुर , गंधर्व, अप्सरा, स्त्री-पुरुष, जलचर , पशु और पक्षी का जन्म हुआ | ब्रहमा जी ने उनके जीवन की गति भी निर्धारित की, अथार्थ मर्त्यु निर्धारित करी | ब्रहमा जी , ने जीवन लेने का अधिकार का प्रस्ताव कई देवताओ के सामने रखा | लेकिन सबने इसे बहुत बड़ा महापाप समझकर , इनकार कर दिया | तब ब्रहमा जी , ने यमराज को जन्म दिया और जीव को सजा देने और जीवन लेने का अधिकार, उन्हे दे दिया | लेकिन यह आसान काम ना था, क्योंकि संपूर्ण सृष्ठी मे जीव और देह अनंत है, देशकाल ग्यात- अग्यात आदि, भेदो और कर्म भी अंनत है, उसमे कर्ता ने कितने कर्म किए- कितने भोगे, कितने शेष रहे और उनका भोग कैसा है ? हर एक जीव का लेखा-जोखा कैसे रखा जाएगा , इसके लिए यमराज जी सोचकर परेशान थे, तब उन्होने ब्रहमा जी से कहा – प्रभु मुझे कोई ऐसा सहायक दीजिए जो धार्मिक, न्याय, बुढिमान, शीघ्रकारी, लेख कर्म मे विद्वान , चमत्कारी, तपस्वी, और प्रभु आप जैसा ब्रहम्निस्थ और वेद शास्त्र जानता हो. ब्रहमा जी उनकी बात सुनकर मनन करने लगे की उक्त सभी गुणो वाला ग्यानी लेखक होना चाहिए और फिर ब्रहमा जी तपस्या मे लीन हो गये.
पद्म पूरण के अनुसार करीब 1 हज़ार बर्ष तपस्या के पश्चात , कार्तिक शुक्ल की द्वितीया तिथि के दिन जब ब्रहमा जी ने समाधि तोड़ी – तब आपने सामने एक श्यमाल रंग, कमाल नयन, शंख की सी गर्देन, गूड सिर, चंद्रमा के समान मुख, एक हाथ मे कलम-दावात, दूसरे हाथ मे पुस्तिका, कमर मे किरपान बांधे , आगंतुक को देखा
“ आज़ानभूज कारवाल पुस्तक कर कलम मासिभाजनं
तब ब्रहमा जी ने पूछा – वत्स कॉन हो ? तब उसने कहा - प्रभु मे आपकी काया से उत्पन , आपके चित्त मे गुप्त रूप से निवास कर रहा था | आप मेरा नामकरण करे | मेरे लिए जो भी दायित्व हो मुझे सोंप दीजिए | तब ब्रहमा जी ने कहा – पुत्र तू मेरी काया से उत्पन्न हुआ है इसलिए मेरी काया मे तुम्हारी उपस्थिति है – इसलिए तुम्हारी जाति कायस्थ है, चूंकि मेरे चित्त मे गुप्त रूप से निवास कार रहे थे , अत : तुम्हारा नाम चित्रगुप्त है | धरमराज के पूर मे प्राणियो के समस्त सत्कर्म और उपकर्म का लेखा जोखा रखना और तदनुसार संही न्याय करना तुम्हारा दायित्व है, जाओ धरमराज के सखा बनो इसलिए तुम्हारी उत्पत्ति हुई है | तब भगवान चित्रगुप्त जी धरमराज के पास गये, तो महबुद्धि, देवताओ का मान बड़ाने वाला धर्मा धर्म के विचार मे, महाप्रावीण लेखक, क्रम मे महाचतुर पुरुष को देखकर यमराज अति प्रसन्न हुए और उन्हे उनका दायित्व दे दिया |
दीपावली के बाद जो कार्तिक शुक्ल की द्वितीया तिथि ( भैया दूज) को भगवान चित्रगुप्त की पूजा –अर्चना कलम दावात रखकर की जाती है, इस दिन को चित्रगुप्त जयंती कहते है.
यमराज के दरबार मे सभी जीवतमाओ के कर्मो का लेखा जोखा होता है, भगवान श्री चित्रगुप्त जी , कर्मो का लेखा जोखा तैयार करते है, जनम से लेकर मरण तक जीवात्मा के सभी कर्मो को आपने पुस्तक मे लिखते है और जीवात्मा, मर्त्यु के बाद यमराज के समक्ष पहुचता है, भगवान श्री चित्रगुप्त जी , उस जीवात्मा के कर्मो को, एक एक करके सुनते है और कर्मो के अनुसार दंड की वव्यस्था करते है
भगवान चित्रगुप्त जी की दो शादी हुई – ब्रहमन कन्या- सूर्या दक्षिणा, पहली पत्नी थी, जिनसे 4 पुत्र हुए – भानु ( माथुर), विभानु ( भटनागर), विश्वभानु ( श्रीवास्तव) और वीरयभानु ( सक्सेना) के नाम से जाने जाते है. दूसरी पत्नी अरावती क्षत्रीया कन्या थी – जिनसे 8 पुत्र हुए – चारू ( सूर्याध्वज), सुचारू ( अम्बस्थ), चित्रख्या ( गौर), मतिमान ( निगम), हिमवान ( करण), चित्राचरू ( अस्थाना)
अरुणा ( कुल्श्रेस्थ) और जितेंद्री.
भगवान चित्रगुप्त की कायस्थ जाति के संदर्भ मे, मै अगले ब्लॉग मे उल्लेख करूंगा …….
ओम श्री चित्रगुप्त नमः :




सभी बंधुओ को दीपावली की हार्दिक शुभकामना
दीपावली के दिन श्री राम अपने 14 वर्ष का बनबास पूरा करके लोटे थे. अयोध्याबासियो का हिरदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लासपूर्ण था.
श्री राम के स्वागत मे अयोध्याबासिओ ने घी की दीपक जलाए और खुशिया मनाई थी जो आज भी परंपरा चली आ रही है. ऋग्वेद और अर्थ्वेद की दो रचाओ मे 14 मर्यादा का वर्णन आता है | जिसमे 7 वयक्तिगत मर्यादा का वर्णन पिच्छ्ले ब्लॉग मे कर चुका हू.
श्री राम मे 7 सार्वभोमिक मर्यादा भी कूट कूट कर बाहरी थी तभी तो मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम को सर्वश्रेस्ट माना जाता है – मैथली शरण गुप्ता ने अपनी रचना “ साकेत” मे लिखा है =
राम तुम्हारा चरित स्वंय ही काव्य है | कोई कवि बन जाए स्वत: संभव है ||
आदर्श -> श्री राम जो मर्यादा पुरषोत्तम का आदर्श इस्तापित किया है, वह सभी रूपो मे सर्वश्रेस्ट उत्तम बन गया है | श्री राम एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई, आदर्श पिता, आदर्श मित्र, आदर्श राजा और आदर्श शिक्षार्थी थे. उनके आदर्श कल भी पावन सात्विक शाश्वत थे, आज भी है और कल भी रहेंगे .
कर्तव्य पुरुष -> श्री राम एक कर्तव्य शील पुरुष थे, उन्होने अपने कर्तव्य से कभी मुह नही मोड़ा और ना ही विचलित हुए , उन्होने जो भी प्रण किया उसे पूरी ज़िम्मेदारी से निभाया, राक्षसो का बध करके मुनियॉ की रक्षा करना, शरणागत की रक्षा करना, उन्होने अपना परम कर्तव्य माना
सुनहु सखा निज कहहु सुभाहु | जन भुसुंदी संभू गिरिजाऊ ||
जो नर होइ चराचर द्रोही, आवे सभैय् सरन तकि मोहि ||
धैर्यवान –> विनर्मशील = श्री राम बहुत ही विनर्मशील थे, उन्होने कभी क्रोध नही किया वरन सबका सम्मान करते थे और सभी विपत्तियो का सामना बहुत ही धेर्यपूर्वक किया | चाहे वो अयोध्या का बनबास प्रकरण हो या सीताजी का अपरहण अथवा रावण से युध, उन्होने कभी भी धेर्य नही खोया और नही उत्तेजना के आवेश मे आए |
अति कोमल रघुबीर सुभाहु| जदपि अखिल लोक कर राउ ||
समान भाव -> वे सभी का आदर सम्मान करते थे चाहे वो किसी भी जाति और वर्ग से जुड़ा हो , उन्होने कभी उच् नीच का फर्क नही माना.
जाति पाती कुल ध्रम बड़ाई | धनबल परिजन गुण चतुराई ||
केवट की नाव मे बेठे हो या शबरी के जूठे प्रेमपूर्वक बैर खाए – उन्होने यही दर्शाया हे की वो सर्वभाव सम्मान रखते थे को भेदभाव नही करते थे. श्री राम केवट की नाव से जब उतरते है तो सोचते है –
केवट उतरी दंडवत कीन्हा | प्रभु सकुच एहि नही कुछ दीन्हा ||
लोक मर्यादा -> श्री राम ने लोक मर्यादा का बहुत ध्यान रखा , राजा के रूप मे उन्होने कभी भी अमर्यादित व्यवहार नही किया, प्रजा की बात सुनकर उन्होने खुद सीता का परित्याग करके लोक मर्यादा का पालन किया जिसे आज भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
आदर भाव -> श्री राम अपने माता पिता गुरुजनो का विशिष्ट आदर करते थे , उनकी हर् आग्या का पालन करते थे, गुरुजनो की, रात्रि मे पैर दबाकर सेवा करते थे , गुरु की आगया से उन्होने जन कल्याण हेतु राक्षस का बध किया तथा ऋषीओ को उनके
अत्याचारो से मुक्ति दिलाई.
प्रजा वत्सल राजा - > श्री राम अपनी प्रजा को अपने परिवार के समान समझते थे, कोई भी व्यक्ति उनके पास अपना अपना दुख सुख सुना सकता था | उनके घरो मे तले नही लगाए जाते थे,
आज भी राम राज्य को आदर्श माना जाता है , श्री राम ने सूर्यवंश की कीर्ति को बढ़ाया तथा अश्वमेघ यग्घ करके
चकर्वर्ति सम्राट बने |
देहिक देविक भॉतिक तापा | राम राज नाही काहुहि ब्यापा ||
सब नर करही परस्पर प्रीति , चलही स्वधरम निरत श्रुति नीति
श्री राम आदि अनादि सनातन पुरुष है , कल्याणकारी , मानवतावादी पुरुष है, वो एक महान आत्मा जो सबके हिरदेय मे निवास करती है., श्री राम नाम की महिमा गान से वेद पुरान भरे पड़े है
सेस सारदा वेद पुराना- सकल करही रघुपति गुण गाना |
जय श्री राम




भारत भूमि देवभूमि है. स्वयम् भगवान विष्णु ने लोक कल्याण हेतु इसी धरा पर बार बार अवतार भारत भूमि पर ही लिया है | त्रेता युग मे मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम का अवतार हुआ | वेदो के अनुसार मन से, वचन से और कर्म से पालन करने वाला ही मर्यादा पुरषोत्तम कहलाता है | ऋग्वेद और अर्थ्वेद की दो ऋचाओ मे 14 मर्यादा का वर्णन आता है | जिसमे 7 वयक्तिगत मर्यादा और 7 सार्वभोमिक मर्यादा है | भगवान श्री राम के जीवन चरित्र का विशद अन्वेषण कर तो हम पाएंगे की वो इस कसोटी पर सर्वथा खरे उतरते है | श्री राम 7 वयक्तिगत मर्यादा की धनी थे | उन्होने कभी मर्यादा नही तोड़ी ,
बुद्धि –विवेक की मर्यादा : श्री राम विपरीत परिस्थितिमे भी उनकी बुद्धिशीलता चमक कार उभरी है | जब भरत अपनी चतुरंगी सेना के साथ श्री राम को वापिस लेने आते है तो लक्षमन जी अति क्रोधित हो जाते है परंतु राम जरा भी विचलित नही होते और बड़ी शांत प्रकती से लक्षमन को समझाते है की –
भरतिहि होइ ना राज मदु विधि हरी हर पद पाई,
कबहु की कांजी सिकरेनी छीर सिंधु बिन साई |
( श्री रामचरित मानस)
नेत्रो की मर्यादा : श्री राम ने कभी पराई स्त्री पर नज़र नही डाली | श्री राम, अतुल राक्षस सुंदरी सूपर्नकहा को भर नेत्र देखते भी नही | जबकि कामातुर स्त्री अनेक हावभाव दिखाकर भी, श्री राम के समकक्ष विवाह का प्रस्ताव रखती है | जिसे वो ठुकरा देते है | उनके सामने सूपर्नकहा को हार माननी पड़ती है |
सीतही चितई कभी प्रभु बाता , अहैई कुआर लघु भ्राता
( श्री रामचरित मानस)
कानो की मर्यादा : श्री राम ने परनिंदा से दूर् ही रहे | 14 वर्ष का वनवास मिलने पर भी उन्होने कुछ नही कहा , बल्कि माता-पिता का आशीर्वाद माना | जबकि लक्षमन जी वनवास की सुनकर आग बबूला हो जाते है , माता कैकयी के लिए अपशब्द कहते है | किन्तु श्री राम, लक्षमन के भर्त्सना करते है और कहते है की मा – बाप की मीन- मेख करना पुत्रो को शोभा नही देता | उन्होने कभी मंथरा या माता कैकयी की बुराई नही सुनी |
वाणी की मर्यादा : श्री राम म्रदु भाषी थे | वे सबसे प्रिय व मधुर वार्तालाप करते थे, यह तक की अपने परम शत्रु रावण ke प्रति कटु भाषा का प्रयोग नही किया , बल्कि युध मे मेघनाद का पराक्रम देखने पर भी उसकी प्रसंसा भी करते थे |
सुनु गिरिजा अति प्रभु प्रभुता | केवल भक्तय देत बढ़ाई
( श्री रामायण )
हाथो की मर्यादा : श्री राम के हाथो दुखी जनो के कष्ट दूर् हुए | धनुष्वान का प्रयोग भी साधुजनो की सुरक्षा हेतु ही किया अपनी स्वार्थ सिदह के लिए नही किया , उनके हाथो कभी कोई निर्दोष नही मारा गया, जिसने अन्याय किया उसी को उन्होने मारा | उन्होने उन सभी राक्षसो का वध किया जो निर्दोषो को हानि पहुचाते थे | उनके द्वारा मारे गये सभी राक्षस और शत्रु मोक्ष को प्राप्त हुए |
भोजन की मर्यादा : श्री राम भोजन की भी मर्यादा को कायम रखते थे, वन मे रह कर भी , किसी भी निर्दोष पशु या पक्षी का शिकार नही किया | मांस – तामसी भोजन से , वे दूर् ही रहे . उनका आहार बड़ा शुद्ध और सात्विक था | वन मे भी उन्होने कंदमूल फल खा कर ही समय बिताया
दांपत्य की मर्यादा ; श्री राम एक आदर्श पति थे | उनका दांपत्य जीवन भी उच्च आदर्श प्रस्तुत करता है | अपनी पत्नी का वे बहुत ही आदर करते थे | वे प्राणो से भी अधिक सीता माता से स्नेह करते थे | उनके बिछुरने पर भी बहुत दुखी हुए थे |
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनि | तुमः देखी सीता मृग नैनी
( श्री रामचरित मानस)
सीता परित्याग के पश्चात भी दूसरा विवाह नही किया | अश्वमेघ यघ भी सीता की स्वरण प्रतिमा के साथ संपूर्ण किया | पत्नी प्रेम की यह परकाष्ट ही है |
श्री राम आदि अनादि सनातन पुरुष थे . श्री राम मे 7 सार्वभोमिक मर्यादा भी कूटकूट कर भरी थी
( जिसका वर्णन नेक्स्ट पोस्ट मे करूंगा)
जय श्री राम


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