Haas-Parihas
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तारी जिन गौतम की नारी बिचारी
निज चरनन की धूरि शिला सों छुवाई के,
सोई अवध के जुबराज जू
रहिहें चौदह बरस एहि कानन मा आई के.
जोगी-जती तपसी तिरियान बिन
ताकि रहे एकटक मन लाई के,
जुबती जस चाहें ढूढ़ी वैसी शिला ,
दंडक-बन में बइठे मुनि धूनी रमाई के …..
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दर्शन को प्रभू के आतुर दिखें,
पै डिगें न शिला तज एकहू क्षण को..
देखो दयालु की कैसी कृपा,
कि फिरें वन कानन मुनिन ते मिलन को..
कैइसे कहैं अब कीजै परस,
प्रभु मोद भरे समुझें मुनि- मन को
लौटती बार बतईयो हमें,
मुनि धीरज धरो न तजो या जतन को
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नाक कटाय के सूपनखा ,
पहुची जब लंक में आग लगावन
सीय हरण का बहाना बनाय के
रावण का कुल नाश करावन
नारी के कारण राख भई
तब स्वर्णपुरी अतिशय मनभावन
कंचन कामिन की गति देखीय
शेष न कोऊ नाम धरावन
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फेरि थामे दंडक बन में
जब रावन मारि प्रभु घर आये
संग सिया लछमन हनुमान औ
कोटिक बानर वीर लिवाये
पूँछि रहे मुसकाय प्रभु
मुनि! आज शिला वो कहाँ धरी आये
हेरि सिया अकुलाय उठे मुनि
कीजै क्षमा हम तौ भरी पाए….
ब्रिजेश त्रिपाठी


Nice and poetry, Brij. …..Bahut hi umda prihaas aapka, Brij ….bhakti ras ki mithhas se bharpoor.
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