मेरा विश्वास
सच्ची प्रीति में पगी जो प्रार्थना की रीति ये तो नेह नीति में विरह की गाँठ न लगाइए जब भी प्रेम भाव से बुलाया जाय आपको तो भक्तों के काज आप बनाने चले आइये आप मूर्तिमान हैं निधान हैं दया के प्रभु अंतिम आसरे से मुझे यूँ न ठुकराइये प्रीति रीति नीति से सजाये मन मंदिर में बिना देर किये प्रभु पास मेरे आइये …. मैं अबोध जान नही पाया कभी रीति तेरी आप तो भविष्य मेरा सारा जानते रहे मेरी सारी आशा तृष्णा,मेरी सारी व्यथा कथा मेरी सारी उठा-पटक अनुमानते रहे कहाँ जाऊं किससे कहूँ किसे मैं बुलाऊँ आज खोज में जहान सारा नाथ छानते रहे नाथ मेरे आप ही संभालिए हमारा काज शरण आये को कभी क्या आप टालते रहे? कहाँ ला के आज मुझे छोड़ दिया आपने भी नाथ मैं अनाथ हुआ…कैसे कहूँ आपसे? आप तो अनाथों के नाथ कहे जाते फिर भी मैं अनाथ कैसे छूटा हुआ आज आपसे? मेरे काज आप जो विसारते हैं आज प्रभु कौन नेह रज्जु से जुड पायेगा आपसे? मेरी आस, मेरा सारा अटल विश्वास,नाथ कायम रहेंगे ये विश्वास मुझे आपसे डॉ.बृजेश कुमार त्रिपाठी
