April 18, 2010
By: Brij Tripathi
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हे मातृभूमि!
तेरे आँचल मे सुख से पलित-पोषित,
तेरी संतति,स्नेहमयी माँ!
करती नमन समर्पित.
मंगलमय इस पुण्य धरा के लिए समर्पित जीवन…..
हो तेरी रक्षा निमित्त,
बलिदान हमारे ये तन…..
हे शक्तिमान प्रभु! अंगभूत हम
हिन्दू स्थान के वासी,
नमन तुझे करते हैं हम सब….
अज़र-अमर-अविनाशी!
कार्य तुम्हारा ही करने को
हमने कमर कसी है…
पूरा हो यह शुभ वर दे दो
मन मे चाह बसी है ….
शक्ति दो जिसका न कोई
विश्व मे प्रतिरोध हो….
शील दो जिससे जगत को
नम्रता का बोध हो…..
कष्ट-कंटकों से परपूरित मार्ग
जिधर चलना है…
ध्येय ग्यान दो सुगम हमे
इस पथ को भी करना है….
एक मात्र है उत्तम साधन,
पुरूषार्तों के अर्जन का
धर्म अर्थ और काम आदि के
सर्जन और विसर्जन का
उग्र वीर व्रत से सब पाते
भोग- त्याग की समरसता
विजय सुनिश्चित करने वाली
स्फूर्ति, हृदय की आतुरता …..
जगे निरंतत्र भाव हृदय मे
ध्येय न विस्मृत क्षण भर हो
विजयशालिनी संघ-शक्ति से
न्याय धर्म का शासन हो
संघ-शक्ति के सदुपयोग से,
विश्व-गुरु के आसान पर
शोभित हों अपनी भारत माँ
हमे चाहिए यह शुभ वर….
भारत माता की जय
डॉ.बृजेश कुमार त्रिपाठी द्वारा संस्कृत से अनूदित
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April 13, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Uncategorized
….
किसी आतंकी-अत्याचारी का हम
ग्रास बन जाएँ सुगमता पूर्वक….
यह नहीं स्वीकार हमको…
कठिन प्रतिरोध होगा…
हार यूँ ही नही स्वीकार हमको
प्रकृति मे है नहीं यद्यपि…
उलझना व्यर्थ ही,
‘जिएं हम और सब आनंद से‘
यही है कामना ….और जीवन अर्थ भी
लड़ेंगे… जीत के हम वास्ते
ललकार है….
चुनौती हर तरह की अब हमे स्वीकार है…..
डो बृजेश कुमार त्रिपाठी
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April 07, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Uncategorized
Reposted…….
My Reverend Vetreran
The touch of your sweet memories
Soothe my whole conscience.
No matter if you are absent from
My physical eyes?.
Your infinite existence
Pierce through every blindness
And I find your unlimited presence
Up to the limit of my eyes
When my eyes are closed?
You are enclosed.
Thank you sir, my reverend veteran !
Thank you sir, for being my patron.
You are the vision of my eyes..
You are the reason of my life?
I seek your guidance
For the rest of my life?
I pray to give me a strong will
To chase your style.
Dr. Brijesh Kumar Tripathi
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April 02, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Personal
DearCarl,
Your exellent expression has reminded me an old story from Hindu myathalogy….
Once the great philospher and emperor Janak was sleeping in his luxurios bedding. He then saw a dream that while hunting he gets isolated from his team and forgets the way to his camp.suddenly the attack of a lion forces him down to the earth.the fearful king becomes helpless…His mouth begins to dry and he starts begging a glass of water.Suddenly his dream is broken,and he finds a number of his attadants holding the cented sweet water as his appeal for water was comming from his dream.
The scene was changed. Now Janak was a powerful king.But He started to think what was the truth….the scene that he was looking now or what he just seen in his dream..A deep melancholy followed him and as he was thinking it seriously a deep sadness was making him unrest.
consequently he fell ill..No physician could cure him..
At last a skilled philospher who was then a child named Ashtavakra came to him. He told him, after knowing his problem in detail that either of two situations,which were faced by the king were fake.These were not real…but the king him self was real in both situation.
This world is too like the dream..nothing is stable here…Every thing is fragile and mortal except the good deeds,which make a history..and this history penitrates through the time…So one must leave the essence of his good deeds… and THIS THE ONLY TRUTH.
Dr. Brijesh
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April 01, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Emotion, Uncategorized
तुम्ही पहचान हो मेरी,
तुम ही बस जान हो मेरी,
यह तुम हो जिससे हम ’हम’ हैं
यह हम हैं जिसके रग-रग मे,
बसे बस तुम हो, तुम ही हो .
तुम्हारा नाम लेकर ही,
मेरी हर सांस आती है….
तुम्हारे बिन
मेरी साँसें न आती हैं …न जाती हैं
तुम्ही हो मायने अबतक,
हमारे ज़िंदा रहने के…..
तुम्ही कारण बनोगे,
मौत मेरी जब भी आएगी
नही मालूम मुझको,
ज़िंदगी से चाहिए क्या अब ?
तुम्हारे प्यार और दीदार का बस
आसरा हो जब…..
तुम्हे पाऊँ… न पाऊँ
इसका कोई गम नहीं मुझको…..
हर एक सांस मे एक आस है…
यह कम नहीं है क्या?
नही हो सामने तो क्या ?
खयालों मे बसे तो हो….
तुम्हारी आस मे हर सांस आती है
तो आने दो….
कहो मत, भूल जाने को….
भुलाना अब नहीं मुमकिन,
तेरे दीदार की चाहत मे मुश्किल से
ज़माने को भुलाया है….
डॉ बृजेश कुमार त्रिपाठी
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March 20, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Blogs
नमस्कार मित्रों,
एक बार फिर मैं आप सभी सहृदय मित्रो के साथ अपनी एक छोटी सी दोस्त की व्यथा
पर सह चिंतन करने के लिए आपके समक्ष उपस्थित हूँ.मेरे घर के आंगन पर रोज़
सुबह मेरे भी जागने से पहले दाना चुगने के लिए मेरी प्यारी दोस्त आया करतीं थी…
उनकी चहक सुन कर अक्सर बचपन मे मेरी नींद खुला करती थी.
उनको फुदकते देखना मुझे बड़ा प्रिय लगता था…उस समय जितने बड़े घर होते थे,
उससे कहीं बड़े मन हुआ करते थे..
हम बच्चों को छोड़ दीजिए गौरैया का फुदकना बड़े बड़ों का मन मोह लेता था…उनको
फुदकते देख अक्सर मेरी दादी अपने मन से बिना आग्रह असमय गौरैया से संबंधित
कहानियाँ सुनाया करती थी.लगता था गौरैया उनके अतीत को आते ही कुरेदने लगती थी
..उन कहानियों को मै काफी कुछ भूल गया हूँ किन्तु जो याद हैं यदि उनका
संग्रह करूँ , तो लोक कथा का एक सुंदर ग्रंथ तैयार हो जाए .
सुबह सुबह एक बड़ी ही प्यारी आवाज़ कहीं दूर se आती थी,गर्मी की सुबह हम
बच्चों के लिए वह अलार्म का काम करती थी…संगीत भरी उस दर्दीली आवाज़ मे दादी
ने मिलताजुलता एक शब्द खोज लिया था …और अक्सर कहतीं थी देखो पेंढूकी कह
रही है…‘..फूफू के कैसे गए? ….’फूफू के कैसे गए? मैंने एक दिन उनसे पूँछ ही लिया
”दादी ये फूफू के घर जाने को क्यों रोक रही है”.
दादी ने हँसते हुए कहा ,”अरे ऐसा बोलते रहने को उसे सज़ा मिली है.”
” क्यों?” बाल सुलभ जिग्यासा से मैने पूंछा.
”यह चिड़िया पिछले जन्म मे एक संपन्न और प्रतिष्ठित महिला थी. संयुक्त परिवार मे
इसके साथ एक नन्द रहती थी जिसे यह बहुत प्यार करती थी. शादी भी उसने अपनी
प्यारी नन्द की बहुत अच्छे घर मे किया था…
किन्तु समय के साथ पता नही क्या हुआ,उसका अपनी नन्द से मन फिर गया….
स्त्री सुलभ ईर्ष्या….या कुछ और पता नहीं…..समय के साथ उसकी बेटी भी बड़ी हो गयी
और उसकी भी शादी अच्छे घर मे हो गयी…..एक बार बेटी के घर उसे त्योहार भेजना था …
मेहनत से रुचि पूर्ण व्यंजन तैयार कर नये नये कपड़ों के साथ बेटी के घर भेंट तैयार ही हुई
थी की नन्द के घर आग लग जाने का समाचार आ गया ….सब कुछ नष्ट हो
गया था . घर के लोगों की सहमति थी कि तुरंत राहत के लिए तैयार सामग्री नन्द के घर भेज दी
जाए…किन्तु महिला इसके लिए तैयार नही थी …वो यह सामग्री अपनी बेटी के ही
घर भेजना चाहती थी…किन्तु परिवार का दबाब….उसे इसे नन्द के ही घर भेजना पड़ा.
…किंतू इसे वह बर्दास्त नही कर पाई…बेटे को चलते समय ये निर्देश दिया कि फूफू के
घर ना जाओ … किन्तु बेटा भी अपनी फूफू को बहुत चाहता था उसने माँ की यह
बात नही मानी और सीधा अपनी फूफू के घर गया…वहाँ से लौट कर जब अपनी माँ
को यह बताया …तो वो बहुत आहत हुई ….और जल्दी ही चल बसी….मरते समय
क्योंकि उसके मन मे जो बसा था, इसलिए आज तक वह पेन्दुकि बन kar भी
फूफू के कैसे गए? …. फूफू के कैसे गए? रट रही है..
..
मित्रों पेडुकी की तरह गौरैया भी हमारे घर की बेटी है…आज हमारा रहन सहन कुछ
ऐसा हो गया है कि गौरैया और पेन्दुकि हमारे घर अपना घोंसला नही बना पा रही है..
जबकि बड़े पेंडो पर घोसला बनाना इनकी प्रकृति मे नही है…और आज इनके घोसलों
को हम आज गंदगी मानते हैं…अनाज के दाने छत पर फैलाना आज
हम भूल ही गये हैं…प्यासी चिड़ियाँ क्या पीएंगी… आज यह हमारी चिंता का विषय ही नही रहा हैं…. परिणाम हमारे घर उनकी चह्क बिना सूने हो रहे हैं….कब तक हम
अपनी परंपरा छोड़ते जाएंगे…और स्वार्थ मे अंधे हो हम फूफू के कैसे गए? रटते जाएंगे… .
एक और बात कुछ लोग गौरैया के सूप को यौन वर्धक औषधि के रूप मे प्रयोग कर रहे हैं …इस मे एक
डोज़ के लिए सौ गौरैयों का प्रयोग किया जाता है यह सिर्फ अंध विश्वास है और कुछ नही….
अतः आप सभी से निवेदन है कि गौरैयों का संरक्षण करें और इस छोटे से प्राणी को हमारे मध्य घर पर ही रहने का अवसर प्रदान करें ….धन्यवाद
Dr. Brijesh KumarTripath
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February 28, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Personal
भुवन भास्कर!
उगो हमारे घर के आंगन,
दूर करो जग का अंधियारा
फैला दो असीम उजियारा…..
मन का कोना कोना जगमग,
रहे शेष ना कोई डगमग…
उल्लसित मन को अब खुल कर जीने दो…
पल-पल अमृत- रस को अविरल पीने दो…
फैला दो असीम उजियारा…..
भुवन भास्कर!
उगो हमारे मन के अंदर,
दूर करो मन का अंधियारा.
भागो मन की शंका-दुविधा,
भय-आशंका .
स्वार्थ-कपट-छल एकाकी ही
सुख सुविधा पाने की इच्छा !
खाली करो हमारे आंगन
मन का यह स्वर्णिम सिंहासन,
जिस पर अब तक जमे हुए हो….
रक्त बीज से बार-बार, मार
फिर असंख्य रूपों मे,
घातक, पैदा हो कार,
परजीवी से, मेरे मन को
मार रहे हो….
स्वार्थ और भय-कलुष,निष्ठुरता,
रूप अनेकों धार रहे हो.
भागो हे मन की कायरता,
बिना परिश्रम पाने की
विव्हल लोलुपता,
जग की चमक-धमक
मे फंस कर भटक रही
मन की आतुरता !
अब ना तुम्हारा जोर चलेगा
यत्न तुम्हारा अब न फलेगा..
घोर तमस मे ज्योति किरण सम
प्रभु की कृपा-वृष्टि होने दो…
इस जीवन के महा-समर मे
आशिर-वचन सृष्टि होने दो….
जागो हे, ऐश्वर्य-तेज-रस,
जागो हे, उदार जीवन –यश!
जागो, शक्ति-पुंज! अब जागो
जागो, कृपा-कुंज! अब जागो
दमके यह आ सार जग सारा …
फैला दो असीम उजियारा…..
भुवन भास्कर!
उगो हमारे मन के अंदर,
दूर करो मन का अंधियारा….
. बृजेश कुमार त्रिपाठी
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February 15, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Uncategorized
सुख दिए हैं आपने
मन में बड़ा उत्साह है …
उत्साह से उल्लास को कैसे मिटाऊँ
क्या करूँ ?
कैसे तुम्हारा प्रिय बनूँ ?
हर्ष जो उपजा हमारे ह्रदय में ,
मै छिपाऊँ या जनाऊँ
किस तरह ?
क्या करूँ ?
कैसे तुम्हारा प्रिय बनूँ ?
शोक में या क्रोध में ,
मै शांत हो जाऊं ,
बताओ किस तरह ?
क्या करूँ ?
कैसे तुम्हारा प्रिय बनूँ ?
शांत मन जो व्यक्ति हैं ,
वे , तुम्हारे सर्वदा ही प्रिय रहे हैं .
मांग कर जो नित्य ही हलके हुए हैं …
प़ा कर सब कुछ भी
वे केवल जी रहे हैं .
मै तुम्हे कुछ आज देना चाहता हूँ .
अपना जो भी है लुटाना चाहता हूँ .
मुझको कब नश्वर जगत से आस है ?
एक तेरा ही अटल विश्वास है .
लो ! सम्हालो ,
सुविधा -दुविधा , हर्ष और ये शोक भी
राग और विराग , सुख -दुःख , मिलन और वियोग भी .
और जो भी चाहते हो ..
ये करूँ ….या वो करूँ ,
तो बोल देना , और अब मैं क्या करू?
कैसे तुम्हारा प्रिय बनूँ ?
डॉ . ब्रिजेश कुमार त्रिपाठी
Comments (3)
February 14, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Poetry, Uncategorized
Sukh diye hain aapne ,
Man me bada utsah hai …
Utsah se ullas ko kaise mitaoon
Kya karoon?
Kaise tumhara priy banoon?
Harsh jo upja hamare hriday me,
Mai chhipaoon ya janaoon
Kis tarah?
Kya karoon?
Kaise tumhara priy banoon?
Shok me ya krodh me,
Mai shant ho jaoon,
Batao kis tarah?
Kya karoon?
Kaise tumhara priy banoon?
shant man jo vyakti hain…
Ve, tumhare sarvada hi priy rahe hain.
Mang kar jo nitya hi halke huye hain…
Pa kar sab kuchh bhi,
Ve kewal jii rahe hain.
Mai tumhe kuchh aaj dena chahta hoon.
Apna jo bhi hai lutana chahta hoon.
Mujhko kab nashwar jagat se aas hai?
Ek tera hi atal vishwas hai.
Lo! Samhaalo ,
Suvidha-duvidha, harsh aur ye shok bhi
Rag aur virag, sukh-dukh, milan aur viyog bhi.
Aur jo bhi chahte ho..
Ye karoon….ya vo karoon,
To bol dena,
Aur ab mai Kya karoon?
Kaise tumhara priy banoon?
Dr. Brijesh Kumar Tripathi
No Comments →
February 08, 2010
By: Brij Tripathi
Category: Uncategorized
आओ प्रियवर द्वार हमारे,
पलक पांवड़े बिछा रहा हूँ
आओ हे प्रभु द्वार हमारे….
कब आओगे द्वार हमारे ….
ह्रदय सिन्धु का मंथन कर
मै ले आया हूँ भाव सुधा-रस
मन मंदिर हो सजा रहा हूँ
स्वागत में हे नाथ तुम्हारे ….
कब आओगे द्वार हमारे ?
आओ न प्रभु गेह हमारे….
शबरी के बेरों का व्यंजन
विप्र सुदामा जी के तंदुल
और विदुर घर जैसा स्वागत
पाओगे हे नाथ हमारे…..
कब आओगे द्वार हमारे
आओ न प्रभु द्वार हमारे
ह्रदय रुद्ध है, शंकित मन है
दर्शन को तन मन व्याकुल है
कैसे पाती भेजूं तुमको ….
कब आओगे द्वार हमारे
आओ न अब द्वार हमारे
अब तो आओ द्वार हमारे
बहुत व्यस्त हो उपरवाले
तुम हो जग भर के रखवाले
राह तुम्हारी देखूँगा मै
जीवन की अंतिम संध्या तक
आओगे न द्वार हमारे
कब आओगे द्वार हमारे?
अब तो आओ द्वार हमारे….
डॉ ब्रिजेश त्रिपाठी
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