रफी और मेरे विचार
काफ़ी सालों से
में इस कोशिश में था के
रफी साहब के
लिए में क्या
कर सकता हूँ।
अनगिनित असफलताओं के
बाद में इस
योग्य बन पाया
हूँ की इस
ब्लॉग के माध्यम से
में अपने विचार आपके अर्पित कर
सकूं। मेरा हमेशा से यही मानना है के जो
कुछ भी मुझे
करना है वह
इसी जनम में
ही करना है।
अगर मैंने समय
नष्ट किया तो
इसका पापी मेरे
सिवा कोई दूसरा नही होगा। इसी
तर्क के मद्दे-नज़र मैंने लिखना शूरो किया। पहल किया मैंने व्व्व.मोह्द्रफी.कॉम
पर और मेरे
लेख वहाँ पर
छापने लगे। होसला बढ़ते ही मैंने यह ब्लॉग बनाया और मेरे द्वारा लिखे
कई लेख मैंने यह पर छापे। यार दूस्तों ने
प्रशंसा की पर
फिर भी मन
को ज्वाला भुजने को तैयार ना
थी। हर रोज़
इंटरनेट पर में
कम से कम
पाँच घंटे बिताता हूँ
और इस दौरान कोशिश यही करता
हूँ की अपनी
तरफ़ से में
रफी साहब को
एक नया तोहफा भेंट कर सकूं। कई कमियां और
खामियां अभी भी
नज़र में आ
ही जाती हैं, पर मुझे
इनसे एक नयी
स्फूर्ति मिलने लगती
है और नए
विचार मन में
आने लगते हैं।
रफी साहब ने
मुझ जैसे करोड़ों परवानों को
ज़िंदगी भर की
खुशियाँ अपने अनमोल गीतों से प्रदान की
हैं और हम
अपनी ओर से
जितने भी उनके
गुण गायें, कम
ही होगा। पर
इस बात को
लेकर हमें बेतहाशा नही
होना चाहिए। मुझे
इस बात पर
अत्यन्त ही गर्व
है कि रफी
साहब ना सिर्फ्त मेरे
युग के सबसे
बड़े महापुरुष थे, परन्तु वे
परम देशभक्त भी
थे। हम देशवासियों को
उनके सपनों को
साकार करने में
हर सम्भव योगदान देना
चाहिए।
आगे अगले
सप्ताह…..

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