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Archive for the ‘From Blog of Kim Agrawal’ Category

सांस्कृतिक परंपराओं की विरासत—— बस्तर दशहरा

October 1st, 2011
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(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.)

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हमारी संस्कृति में,  हमारे संस्कारों का कैसे बीजारोपण हुआ है, इसकी मिसाल हैं,  हमारे तीज-त्यौहार. यकिनन हम सबको इसका अहसास है. एक-एक त्यौहार क़ी, हर एक परम्परा में, कहीं न कही सामाजिक मूल्यों का बोध होता जान पड़ता है. बस्तर के दशहरे को ही ले लीजिए, जो एक पिछड़े कहे जाने वाले, धूर जंगली इलाक़े में ठेठ भारतीय अंदाज में, पुरखो से मनाया जा रहा. लेकिन, इसके हर तौर तरिके में वो संदेश अभिव्यक्त हैं, जिस पर हम सब गर्व कर सकते हैं. अमूमन बस्तर के दशहरे के संबंध में, यही अधिकतर लोग जानते हैं कि यह भगवान राम क़ी रावण पर विजय के उपलक्ष्य में नही, अपितु माँ दंतेश्वरी{बस्तर अंचल के लोगो क़ी आराध्य देवी जो दुर्गा का ही एक रूप है }क़ी आराधना को समर्पित एक पर्व है, जो 10 दिन नहीं पूरे 75 दिन तक चलता है. पर बस्तर के दशहरे क़ी जानकारी इससे अधिक का मायने रखती है, एक-एक रस्म, हमारे संस्कृतिक मुल्यो क़ी, महान परंपराओं क़ी संदेश वाहक हैं.
               काछिन गादि को ही लीजिए,ये रस्म है, दशहरे के, मुख्य समारोह के शुरू होने क़ी पहचान.{वैसे यह दशहरा शुरू होता है,श्रावण मास क़ी अमावश्या से, रथ बनानेवाली लकड़ी पूजा से और चलता है अश्विन मास के शुक्ल पक्ष क़ी त्रयोदशी तक} दिन होता है भाद्र मास क़ी अमावश्या.  इस दिन माँ दंतेश्वरी से मुख्य समारोह शुरू करने क़ी अनुमति ली जाती है, जो विराजित रहती हैं काछिनगादि पर. यह एक कांटो क़ी सेज होती है,जिस पर एक बाल कन्या माँ दंतेश्वरी के रूप में लेटती है. यह कन्या होती है एक अनुसूचित जाति {एस.सी.} क़ी और उससे समारोह क़ी अनुमति लेता है, बस्तर के राजपरिवार का व्यक्ति. वह हाथ जोड़कर बालिका क़ी पूजा करता है और उससे बदले में फूल भेंट पाने पर, देवी क़ी अनुमति समझा जाता है. इस रस्म का अद्भुत पहलू देखिए, बस्तर आदिवासी बाहुल्य वाला इलाका है और जब बस्तर का दशहरा 15 वीं शताब्दी में चालू हुआ उस समय भी यह क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य वाला था. वैसी स्थिति में एक दलित वर्ग{आदिवासी नहीं] क़ी कन्या को, इतना सम्मान कि स्वयं राजा, उसकी पूजा करे और उससे किसी समारोह क़ी शुरूवात की याचना करे, यह सम्मान तो आज के वोट के राजा भी नहीं देते.
                      समारोह की परंपरा में फिर होती है, जोगी बिठाई. जिसमें एक हलबा अनुसूचित जनजाति [ एस.टी.]  का व्यक्ति माँ दंतेश्वरी की लगातार 9 दिन तक उपवास रख कर, एक ही स्थान पर आराधना करते रहता है. जोगी बिठाई से प्रतिदिन मांझी, मुंडा, नाईक इत्यादि विभिन्न आदिवासी समुदाय के लोग रथ को रोज शाम को सात दिन तक राजमहल के सिह द्वार तक खींचते हैं. जोगी उठाई के बाद भीतर रैनी (विजया दशमी) और बाहर रैनी (रथ खींचने की परंपरा कासमापन) में सभी समुदाय के लोग मिलजुलकर हिस्सा लेते हैं. आश्विन शुक्ल की बारहवी को लगता है मुरिया (इसी आदिवासी जाति का घोटुल विश्व प्रसिद्ध है) दरबार. जिसमे आम जनता के साथ राज परिवार के लोग बैठकर विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर बातचीत करते हैं. और अंत में अश्विन शुक्ल 13 वी को होता है ओहाडी पर्व. जो मावली माई के सम्मान में होता है. और सब लोग इस दिन मिल जुलकर भोजन ग्रहण करते हैं.
                        बस्तर दशहरे के इन रस्मों में सामाजिक समरसता और भाईचारे का जो संदेश पग-पग पर दिखाई देता है वह आज के इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजसी ठाठबाट पा रहे उन राजनेताओ के लिए एक सीख है कि सत्ता प्राप्ति के लिए समाज को बांटने की जरूरत नहीं बल्कि इस देश की माटी ने सत्ता को ज़िम्मेदारी का बोध कराया है. जातपात के नाम पर हायतौबा करने वाले उन लोगों को काछिन गादि की परंपरा से कुछ सीख तो जरूर लेनी चाहिए कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में समरसता पुरखों से है. उसे रैलियों, भाषनो और नारों की आवश्यकता नहीं. वे इसे न समझ सके तो आकर बस्तर दशहरा से सीख सकते हैं.
             


(29 सितंबर 2008 से इस वर्ष के बस्तर दशहरा की काछिन गादि रस्म की शुरूवात हुई है. आप सबको बस्तर आने का सादर आमंत्रण है.)


नवरात्रि की शुभकामनाएँ———-

हमारे संस्कारों की धरोहर

October 1st, 2011
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(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.)

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हर साल,हम महाशिवरात्रि पर राजिम (छत्तीसगढ़ की राजधानी से कोई 50कि.मी. दूर) जाते हैं ? रायपुर से रवाना हुए, तो एक दोस्त ने ये सवाल उठाया था ?लगभग इसी सवाल को, आज (23फ़रवरी 2009) हमने राजिम कुंभ पर जूना अखाड़े से पधारे एक पूजनीय संत के सामने रखा ? महाराज,लाखो-लाख लोग एक ही दिन में पवित्र स्थलों पर पहुँचते हैं, ऐसा क्यों ? पहले वे मुस्कुराए फिर बोले, तुम लोग पढ़े-लिखे योग्य लोग हो, तर्क-वितर्क के लिए पूछ रहे हो, तो मेरे पास उत्तर नही है, श्रद्धाभाव से पूछ रहे हो तो मैं कुछ कह सकता हूँ. हमने जिज्ञासा जाहिर की. वे कहने लगे “शब्द” या “नाम” का महत्व तुम लोग जानते हो ? हमने कहा नही. संतश्री ने कहा, तो बताओ तुम्हे कोई गाली दे, कोई प्रशंसा करे या कोई डराए तो अलग-अलग प्रतिक्रिया व्यक्त करते हो ? इसका मूल कारण है कि तुम इस शब्द के भाव से जुड़ जाते हो. तुम्हारा स्थूल शरीर और मन के भाव प्रतिक्रिया देते हैं. अध्यात्म में नाम का भी यही महत्व है. “सीताराम” हो या और कोई जप, सब से सूक्ष्म भाव पैदा होता है, आत्मा पवित्र होती है. ठीक नाम जप की तरह, पवित्र धार्मिक स्थलों का महत्व है, खास दिनों मे ये महत्व कई गुना बढ़ता है. इन स्थलों पर जितने अधिक लोग श्रद्धा से आते हैं, वे सब पवित्र आत्माएँ हैं. जो ईश्वर का अंश है. संख्या जितनी अधिक होगी, श्रद्धा का घनीभूत रूप उतना ही अधिक होता है. सदियों से, इन स्थलों पर एक दिन विशेष पर कई ऋषियों, संतो, और पुण्यात्माओं का आगमन हुआ है, उनका आगमन इन स्थलों पर प्रभाव की ऊर्जा छोड़ता है, जो जितने श्रद्धाभाव से आएगा, उसे उसकी उतनी ही अधिक अच्छी अनुभूति होगी. ठीक उसी तरह, जिस तरह तुम्हारे हाथों में मोबाइल सेट का नेटवर्क सेट की क्वालिटी पर निर्भर है. 
            राजिम छत्तीसगढ़ का प्रयागराज कहलाता है. और यहाँ महानदी के त्रिवेणी संगम पर, हर वर्ष कुंभ का आयोजन होता है. महाशिवरात्रि पर इस कुंभ का समापन होता है जिसमें देश के कोने-कोने से हज़ारों पूजनीय साधु,संतों, महामंडलेश्वरों, आचार्यों और वंदनीय शंकराचार्यों का आगमन होता है. राजिम का महत्व पौराणिक समय से रहा है. जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) के दर्शन तब तक अधूरे माने जाते हैं जब तक वहाँ (पूरी) से दर्शन कर भगवान राजीव लोचन (राजिम) के दर्शन न कर लें. इसी मान्यता के चलते वैष्णव संप्रदाय के महाप्रभु वल्लभाचार्य के माता-पिता जब पूरी दर्शन कर राजीव लोचन धाम, राजिम पधार रहे थे, तब राजिम के पास चंपारण में उनका (वल्लभाचार्य) जन्म हुआ था. राजिम में त्रिवेणी संगम पर माता सीता द्वारा स्थापित शिवलिंग है, जिसे कुलेश्वर महादेव कहा जाता है. महाशिवरात्रि पर संगम में स्नान कर, कुलेश्वर महादेव के दर्शन की ललक हर व्यक्ति की रहती है. संगम पर महानदी लोमश ऋषि के आश्रम को स्पर्श करती है. इस नदी का उद्गम भी श्रिन्गी ऋषि के तपोस्थल (सिहावा पर्वत) से हुआ है. वो ऋषि (श्रिन्गी) जिसके कारण भागवतगीता (परीक्षित को अभिशाप) का उद्गम हुआ. जो सनातन धर्म में गोमाता की महिमा गाथा के सबसे प्रकाण्ड ऋषि माने जाते हैं. यह भी मान्यता है कि राजिम के त्रिवेणी संगम पर ही, ऐरावत (हाथी) को मगरमच्छ द्वारा अपने चंगुल में लिए जाने पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ को खंडित कर ऐरावत का उद्धार किया था. मान्यता यह भी है कि एक भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं विष्णु भगवान राजीव लोचन मंदिर में मूर्ति रूप में विराजित हैं. इसीलिए मंदिर को पूरी के दर्शन के साथ जोड़ा गया माना जाता है.

                आज महाशिवरात्रि पर राजिम कुंभ का अन्तिम शाही स्नान हो रहा है. कई अखाड़ों से पधारे, आचार्य और महामंडलेश्वरों के नेतृत्व में, त्रिवेणी संगम में, हज़ारों साधु-संतों ने डुबकी लगाई. जय-जय घोष के साथ. चारों ओर जन सैलाब इस कदर है कि नदी का कोई तट इंच मात्र को भी खाली नही है. स्त्री-पुरुष एक साथ, एक भाव से डुबकी लगा रहे हैं. जहाँ मन का फेर नही होता, वहाँ तन की पहचान खो जाती है. कम से कम मनोहारी पुण्य स्नान में आपको ये अनुभूति अंतर्मन से अवश्य प्रतिध्वनित होगी. सबका एक ही लक्ष्य है, भावनाओं की हिलोरों को पुण्य भाव से सराबोर करने की.

               पुण्य की डुबकी के साथ कुंभ स्थल पर एक यज्ञकुंड सबकी श्रद्धा का केंद्र बिंदु बना हुआ था. संतश्री बालक दास महाराज के इस स्थल पर चौबीसों घंटों “नाम” जप को हम यज्ञ की शान कह सकते हैं तो गौमाता के साथ गौशाला की उपस्थिति यज्ञ की जान कह सकते हैं. व्यस्त क्षणो में महाराज श्री (बालक दास जी) से दुर्लभ मुलाकात हमारे किए आत्मविभोर होने वाला क्षण था. उन्होने अपने श्रीमुख से कहा कि यज्ञ की आहुति हमारे मन, शरीर और बुद्धि को पावन करती है. शक्ति देती है. मन का पुण्य ऊर्जा से शक्तिवान होना ” शक्ति ” प्राप्ति है, यही शिवत्व की प्राप्ति है. शिव यानि तपोनिष्ट जीवन का प्रतीक स्वरूप जो आत्ममंथन में लीन रहता है, पर हमेशा दूसरे का कल्याण करता है. जो नाश करता है हमारे मन के दर्प को और नाश करता है उस अहम को जो पद, प्रतिष्ठा, बल, बुद्धि, रूप, शरीर या धन के कारण पैदा होता है. यही अहम “रात्रि” के प्रतीक हैं, महाशिवरात्रि की आराधना इन्हें दमन के लिए ही है.
                         कई घंटों के सुखद अनुभूतियों के बाद वापसी में भी हम देख रहे थे, लोगों का रैला का रैला. कोई पैदल, कोई बैलगाड़ी, कोई ट्रेक्टर आदि में संगम की ओर बढ़ रहा था. जिसमें दूधमुहे बच्चे से लेकर, कृशकाय जीवन के आखिरी पड़ाव को देखते वृद्धजन भी शामिल हैं. अब उत्तर था हमारे पास, हम राजिम क्यों जाते है ?  सदियों से हमारी आस्थाओं के तार संस्कारों में इस तरह पिरोते आए हैं कि हम अव्यक्त को व्यक्त होते वहाँ देख पाते हैं. यही तो हमारे संस्कारों की धरोहर हैं. नाज़ है हमे इन पर……..



धर्म का मर्म

October 1st, 2011
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(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.)

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घंटियों की निनाद और जयघोष की मधुर अनुगूँज के बीच, हम खड़े थे अरदास लिए, माँ काली के मंदिर में. भावविभोर और निश्छल मन से समवेत रूप से जय-जय घोष हो रही थी–विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सदभावना हो, धर्म की जय हो. आज ही नहीं अक्सर हम इस मंदिर में धोक् मारने आते हैं, पत्नी के साथ और यही अनुगूँज होती है,सदैव. लेकिन, आज जब मंदिर से घर पहुँचे, तो ड्योढ़ी पर खड़ा पाया, चुनावी रंगदारों को { छत्तीसगढ़ मे 14 & 20 नवंबर 2008 को विधानसभा के चुनाव होने हैं}. घर के अंदर जाते उसके पहले ही, हमें घेर कर समझाया जाने लगा, कैसे और किसे मतदान करना है और क्यों ? इस क्यों में था, प्रदेश में धर्म निरपेक्ष सरकार बनाया जाना भी. मेरी पत्नी को यह सब असहज लग रहा था, क्योंकि वह मंदिर में मिले फूल और प्रसाद को,  जब तक, एक बार घर के पूजा स्थल पर अर्पित न करदे, तब-तक घर वालों से भी बात-चित करना, उसकी आदत में शुमार नहीं है. वह अपने को अधिक देर तक रोक नही पायी उसने चुनावी टोली के मुखिया को तल्ख़ लहजे में फटकार लगाते हुए कहा, आप शायद कभी मंदिर नहीं गये हैं, और गये हैं तो उन जय-जय घोषों को ध्यान से नहीं सुना है, जो पूजा के बाद भक्त अंतर्मन से उदघोषित करते हैं. वो हैं हमारी धर्म-निरपेक्षता की जड़े, जहाँ मानव, मानव ही नहीं सभी प्राणियों में सदभावना क़ी बात होती है, विश्व के कल्याण क़ी अनुगूँज होती है और हिन्दू शब्द का प्रयोग किए बिना धर्म मात्र क़ी जय-जय कार् करायी जाती है और आप कह रहे हैं, धर्म निरपेक्ष सरकार लाना है, धर्म निरपेक्षता हमारी संस्कृति क़ी जड़ों में है आप जिस धर्म निरपेक्षता क़ी बात कर रहे हैं, वो तो हमें शर्मिंदा कर रहीं हैं, भारत में धर्म-निरपेक्षता क़ी बात करने वाले लोग कभी मंदिर नहीं जाते, अगर जाते तो उन्हे इस शब्द का प्रयोग करते हुए शर्म आती. पत्नी ने सारी बातें एक सांस में कह दीं और सॅट-पट घर के अंदर चल दी. चुनावी टोली को तो मानो “सांप सूंघ गया था”, मैने वातावरण को सहज बनाने के लिए पूछा कि आप लोग पानी लेँगे क्या ?
             पत्नी को मैने कभी भी राजनीति पर रुचि लेते हुए, इसके पहले नहीं देखा था, यहाँ तक क़ी वो राजनीति के समाचार पढ़ने से भी गुरेज करती है, यद्दपि वह स्वयं राजनीति में एम.ए. है. घर के अंदर जा-कर मैने उसे कह डाला कि अब, तुम राजनीति में भाग ले सकती हो, तुम में भाषण देने का दम है. पर वह अभी भी गंभीर थी, उसकी नाराज़गी अभी-भी दूर नहीं हुई थी. वह फिर कहने लगी कि तुम बताओ, मैं काली की अनन्य उपासक हूँ, तुम साई-बाबा के, हमने एकदूसरे को ये कभी नही कहा कि  हमें किस इष्ट को मानना है. मैं काली मंदिर जाती हूँ, आपने ये कभी नहीं कहा कि मैं नहीं जा-उंगा, ठीक उसी तरह जब आप साई-बाबा के मंदिर जाते हैं, मैं बिना बोले तैयार हो जाती हूँ. मेरे माँ-बाप, भाई-बहन, दादा-दादी ने भी मुझे ये कभी नहीं कहा कि किस मंदिर में जाना है और किसमें नहीं. यहाँ तक कि मैं काली माँ की उपासक अपनी मर्जी से हूँ, और तुम, तुम्हारे परिवार में तो, तुम को छोड़ कर कोई साई-बाबा का न तो पहले भक्त था न अब. हमने अपने इच्छा से इष्ट चुने हैं. मुझे बताओ, तुम लोग बहुत सेमिनार और गोष्ठियाँ करते हो, क्या इससे अधिक धर्म को मानने और न मानने की आजादी किसी धर्म में हैं. हमारे संस्कारों में एक बच्चे को माँ रोज मंदिर लेकर भलेही जाए, पर बड़ा होकर, वो बालक रोज माता द्वारा बताए गये देव के मंदिर ही जाए ये जरूरी नहीं, वह अपनी मर्जी से इष्ट का चुनाव कर लेता है, जैसे तुमने किया, मैने किया. फिर इस देश में क्यों होती है धर्म-निरपेक्षता की बाते? धर्म हमारे संस्कारों का वाहक है जो हमारी रगो में रचा-बसा है. जो लोग इसे नहीं जानते वो मंदिरों में जाकर सीखले जहाँ प्राणी मात्र में सदभावना की जय-जय कार होती है. 


             मैने उसके दिल से निकली बातों का खुलकर हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, आज तुम में “गार्गी” की आत्मा का प्रवेश हो गया है. मेरी सहमति से अब उसके मन का गुब्बार खत्म हो गया था.  पर सोंचे, क्या ये गुब्बार आप में भी नहीं छुपा है? हमारे संस्कारों के साथ हम क्यों खिलवाड़ करने दे रहे हैं, राजनीतिज्ञो को? हम जाति, क्षेत्रीयता इत्यादि के नाम पर एक हो जाते हैं, फिर धर्म के मर्म पर एक क्यों नही होते? और हमारे  धर्म का मर्म तो यही सिखाता है, तुम्हे जो पूजना है पूजो, मुझे जो पूजना है वो मैं पूजूँगा, दूसरा कोई हमे ये न सिखाए कि हमे क्या पूजना है, क्या मानना है ?

हमारी मान्यता गंवारू और वो…….

October 1st, 2011
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“राजन, तुमने सपने में अपनी अधोगति को देखा, सपना सच नहीं झूठा है. पर राजन, तुम अपने को चक्रवर्ती सम्राट समझ रहे हो, यह भी झूठ है. एक झूठ को तुम भोग रहे हो और दूसरे झूठ सपने से तुम विचलित हो. सत्य इससे परे है…. (जनक और अष्टावक्र के मध्य संवाद).” भागवत कथा के ऐसे ही प्रसंगों के बीच उसका समापन था. अवसर था, एक मित्र के नये घर के गृह प्रवेश का. पर ये क्या ? कथा के समापन पर, बहस छिड़ गयी, इस बात को लेकर कि नये घर में फेंग सुई कि मान्यताओं के आधार पर लटकने वाली घंटी, लाफिंग बुद्ध, कछुआ आदि-आदि कहाँ और किस दिशा में रखे जाएंगे ? विषय को उठाने वाला भी और कोई नही, घर क़ी डिजाइन और सुपर विजन करने वाला इंजीनियर था.
                     घर के बुजुर्गों का इससे इत्तेफाक नहीं था. उनका मानना था, ये व्यर्थ का खर्च है. तुलसी का पौधा और बहुत हुआ तो दरवाजे के ठीक मध्य में नींबू और मिर्च लटका दिया जाएगा. कुछ ने उनकी हाँ में हाँ मिलकर बात को और आगे बढ़ाया और तर्क रखा, जब घर में भागवत कथा हो गई, जो कलयुग में स्वयं नारायण का रूप है और पूजा का नारियल भी तो घर मैं लाल कपड़े से बांध दिया गया है, जो सब अनिष्ट की काट है. और यही नही, तुलसी के पौधे के पास मिट्टी में वास्तु दोष निवारक चीजों को मंत्रोचारण के साथ स्थापित करदिया गया है. तो फिर अब डर किस बात का रह गया ?
                     मैं इस बात पर गौर कर रहा था कि पढ़ा-लिखा हमारी हम उम्र के लोगों का झुकाव फेंग-सुई की तरकीबों पर अधिकाधिक था और नींबू मिर्च जैसी चीजों को वे अंधविश्वास की श्रेणी मैं रखने से भी नही चूक रहे थे. बहस में मैं भी अपने आप को अधिक देर तक चुप नहीं रख पाया. मैने तर्क रखा, “फेंग सुई” की चीजें इस देश में कब से आई हैं ? क्या, इससे पहले इस देश के घरों में सुख-चैन नहीं था ? हमने बुद्ध को उसकी शिक्षाओं के साथ कोई 2000 साल पहले चीन भेजा था, मानव के सच्चे सुख, यानी निर्वाण के लिए. और अब वही चीन हमें बुद्ध को लाफिंग बुद्ध (तथाकथित एक लांबा) के रूप में बेचकर अपना भौतिक सुख बढ़ा रहा है. चीन ने हमारी धार्मिक मान्यताओं में सेंधमारी की है, उसने आम भारतीय के मन में बैठी शुभ-अशुभ की धारणाओ की मार्केटिंग जमकर की है.
                   ईंजीनियर दोस्त को मेरी बातों पर ऐतराज था. उसने मुझसे सवाल किया कि क्या आपने इन चीजों का उपयोग कर इसके प्रभाव को परखा है ? मैने कहा नही ? मेरे घर में तुलसी का पौधा है, जिसकी रोज पूजा होती है और उसी पर मेरी भी आस्था है. उसने कहा फिर आप नींबू-मिर्ची भी आपके घर में क्यों नहीं टांगते ? क्योंकि स्वयं आप इसे गंवारू समझते हैं. इस पर एक बुजुर्ग ने हस्तक्षेप किया. उसने कहा, नींबू-मिर्च गंवारू पन नही है. वो हमारे स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है. घर में जब इन्हे लटकाया जाता है, तो ताज़गी महसूस होती है कोई गंवारू पन नही. वैसे भी अब शहरों में हरियाली खत्म हो गई है, ये चीजें (नींबू-मिर्च) हमें कम से कम ताज़गी तो महसूस कराती है. नींबू और मिर्च रोज दरवाजे पर, हमारी सब्जी बेचने वाली लेकर आती है, जिस स्नेह और दुलार से वह इन चीजों को देकर जाती है वह दुलार तुम्हारे फेंग-सुई बेचने वाले थोड़े ही देते हैं. तुम लोग पढ़े-लिखे हो, इस बात पर भी गौर करो, जो नींबू-मिर्च आता है, वह गाँव के गरीब किसान के खेत से आता है. जिस पर किसान का पेट तो पलता ही है, मजदूर किसान के खेत पर श्रम कर  और सब्जी वाली भी सब्जी बेचकर गुजर बसर का जुगाड़ कर लेती है. तुम्हारी फेंग सुई की चीजों से, जिसे तुम शहरी कहते हो, वह कहाँ से आती हैं, किस-किस का भला होता है इससे ? मैं तो नही जानता.  तुम लोग मुझसे अधिक जानते हो, पढ़े-लिखे जो हो. 


                  बुजुर्ग की ये बातें (तुम लोग पढ़े-लिखे जो हो–) मेरे दिल में नस्तर की तरह रह-रह कर चुभ रही थी. वास्तव में वो चीन जो हमारे देश की सुरक्षा पर सबसे बड़ा खतरा है, जिसने 1962 में बुद्ध के पंचशील सिद्धांतों को कुचलकर हमारे बड़े भू-भाग पर कब्जा कर रखा है और रह-रहकर अरुणाचल प्रदेश पर भी हमें आँखें दिखाता है. क्या, उसका लाफिंग बुद्ध हमारे घर की सुख-शांति के लिए हो सकता है ? चीन ने हमारे बाजार पर कब्जा कर, जिस तरह से हानिप्रद रसायनो से निर्मित सस्ती वस्तुओं से बाजार पाट दिया है, वह अब चिंतनीय ही नहीं, खौफनाक भी है. हमारी अर्थव्यवस्था को वह धीरे-धीरे लील रहा है और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी कर रहा है.  हमारे घर-आंगन और किचन तक में चीनी वस्तुओं का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है.  और यहाँ तक कि चीन हमारी श्रद्धा की प्रतीक तुलसी को हमारे घर-आंगन से हटाने मे कामयाब हो रहा है.  वो तुलसी जो हमारी धार्मिक ही नही स्वास्थ्य की भी कुंजी है और पुरखों की थाती है. बड़े घरों की शान फेंग-शुई वाले क्या हमारी श्रद्धा को अंधविश्वास/ढकोसला/गंवारू पन मानकर यों ही देश का धन चीन को लूटाते रहेंगे ? शायद हम पढ़े-लिखे जो हैं यानि हमारी श्रद्धा गंवारू और वो——-

प्रभु के ये लोग

October 1st, 2011
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सच हमारे सामने खड़ा था, उसे हम आरपार देख पा रहे थे. जिसे हम धार्मिक और नैतिक पुस्तकों के आख्यानों में बार-बार पढ़ते रहे, आज उसे साक्षात महसूस कर रहे थे, एकदम सच्चे इंसानों के साथ, जो हम खड़े थे.  इंसानो की इस बस्ती में महावीर का अपरिग्रह{सांसारिक वस्तुओ को आवश्यकता से अधिक इकट्ठा ना करना} का सिद्दांत लजाता सा महसूस हो रहा था, आचरण में नैतिकता
की सारी परिभाषाएं यहाँ साक्षात रूप में अवतरित हैं और बाल-सुलभ सी निश्छलता हर एक की बानगी है.  यों कह लें ये तो प्रभु लोग हैं तो कहना और ठीक होगा. लेकिन, हम इन्हे पिछड़ा कहते हैं, शायद इसलिए कि इनके तन पर कपड़ा और सिर पर माकूल छत भी नही है. इन्हे हम सभ्यता का पाठ पढ़ाते हैं, साक्षर बनाने की कोशिश कुछ-कुछ ठीक वैसे ही है जैसे कि कभी भारत के लोगो को क्रिश्चयन बनाने क़ी वकालत इसलिए की गई कि यहाँ के लोग असभ्य हैं जब तक कि शिकागो सम्मेलन में { सितंबर 1893} स्वामी विवेकानंद ने इस असत्य को तार-तार नही कर दिया. 

              ये उस गाँव की बानगी है, जो छत्तीसगड के कवर्धा जिले की पंडरिया तहसील का धुर जंगलो के बीच पहाड़ी पर बसा है. तेलियापानी-लेदरा है इस गाँव का नाम. जहाँ पूरी आबादी आदिवासियों की है. हम जब इस गाँव में पहुँचे तो वे अनुभव भी किसी बड़े रोमांच से क़म नहीं हैं. गहरी घाटियों और एक चूक से प्राण गवां देने वाले रास्तों को पार कर जब हम इस गाँव पहुँचे तो मानो हमें देखने सारा गाँव ही इकट्ठा हो गया. गाँव के जिस टोले {आदिवासी गाँव के छोटे-छोटे मोहल्ले जो पहाड़ियों पर बसे होते हैं}  में भी हम गये देखा, किसी घर भी घर में दरवाज़ों पर पल्ले नही, कोई खाट नहीं, ओढ़ने बिछाने की बात तो दूर, तन ढकने के लिए भी ठीक से कपड़े नहीं है. जीविका में सुवर पालन, शिकार, लकड़ी बेचना और कंद-मूल ही साधन हैं. लेकिन लोग एकदम साफ दिल के मानो ईश्वर के अवतार हों. इसी बात से समझा जा सकता है कि आज इस गाँव में पटवारी उनके खेतों को चिन्हकित करने आया था, हमने देखा कि वो एक खेत पर खड़ा होता और मजाक में वह बड़े भू-भाग को कहता कि तुम्हारा खेत दोएकड़ लिख दूँ, वे कहते आप जाने, आप गलत थोड़े करेंगे. हमने पटवारी से पूछा कि आप कितना लिखते हैं, उसने कहा गाँव में 10 एकड़ से क़म किसी परिवार के पास जमीन  नही है, हमने पूछा जब आपके पास इसका रिकार्ड है तो फिर ये क्या कर रहे हैं ?  उसने बताया कि इनके गाँव अन-सरवेद है, हर साल लिख कर ले जाना पड़ता है, इनका रिकार्ड.  जहाँ जमीन के  एक-एक कतरे पर लोगो के कत्ल हो रहे हैं वहीं इन्हे तो मानो वीतराग सा है. हमने उनसे बातचीत में जो सच्चाई पायी उसे शब्दो में पिरोना मुश्किल है. सहजता, बनावटीपन से कोसों दूर, गाँव का आपसी भाईचारा इतना मजबूत कि आजतक वहाँ पुलिस नहीं पहुँची है, प्रकृति के इतने नज़दीक कि मानो वो उनमें साक्षात समाई हुई-सी है. शिकार के साधन दिखाने के हमारे आग्रह पर जरूर वे सकुचाए. पर बाद में हमसे अपनत्व समझकर धनुष और तीर को लेकर हमें उसकी एक-एक बारीकी समझने लगे. जब हम तीर के नुकीले भाग को छूने लगे तो उन्होने तत्काल हमारा हाथ पकड़ लिया. उन्होने कहा कि यह जहर है और ऐसा करने से आपकी मौत हो सकती है. हमने पूछा कि ये क्या चीज है तो बस उन्हे यही ग्यान है कि वे इसे शहर से लाते हैं. जब नमक लेने जाते हैं, यानी बहुत क़म जाना होता है उनका शहर.
                     हमे यह जानकार आश्चर्य हुआ कि बैगा बाहुल्य वाले इस गाँव में एक दंपत्ति को एक से अधिक संतान नही है. कारण पूछा तो उन्हे नही मालूम (मुझे भी नही मालूम क्यों ?). पूछने पर पता चला कि आसपास के बैगा परिवारों के गावों में भी यही स्थिति है. एक रोचक तथ्य जानकार हम अत्यधिक रोमांचित हुए कि जब घर का पुरुष लकड़ी काटने या बीनने जाएगा तो दूसरे दिन उस घर की महिला लकड़ी काटने या बीनने जाएगी. तब घर का खाना और बच्चे को खिलाने का काम पुरुष के ज़िम्मे रहता है (शायद आप इसे पिछड़ापन तो नही कहेंगे ना ?).  इसी तरह गावों में \महिलाओं का गोदना भी एक अद्भुत अनुभूति थी. ढेर सारी बातों के बीच सबकुछ इस आलेख में समेत पाना मुश्किल जान पड़ रहा है. फिर भी हमारे मन में एक प्रश्न बार-बार खड़ा हो रहा था कि प्रभु के ये लोग सभ्य हैं या इस सभ्य दुनिया के चमचमाती विकास की धारा में शामिल हम लोग ? वास्तव में पर्यटन की इस यात्रा में जो सुकून और अनुभव इस आदिवासी गाँव की विरासत से मिला उसे स्मृति के पन्नो से भुला पाना नामुमकिन रहेगा.

संस्कारों का पालना

October 1st, 2011
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(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.)


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हम उस पावन और पवित्र धरा के संसर्ग से, पुलकित और रोमांचित थे. जहाँ पर कभी कालकूत विष के दारूणिक दुख से निजात पाने के लिए भगवान शिव ने ध्यान लगाया था. समुद्र मंथन से निकले विष को, विश्वकल्याण के लिए शिव बाबा ने कंठ में धारण किया, पर इस विष की पीड़ा के शमन के लिए, पूरे विश्व में उन्हें यही स्थल शकुन देने वाला मिला, जी हाँ मैं अमरकंटक (मध्यप्रदेश) की बात कर रहा हूँ. यहीं पर ध्यान लगाया, भगवान शंकर ने, ध्यानस्थ अवस्था में उनके कंठ से पसीने की धार निकली, विष का शमन हुआ और यही पसीने की धार, पवित्र नर्मदा नदी को जन्म देती है. ठीक नर्मदा के उदगम कुंड के नजदीक तट पर हम बैठे थे. पवित्र जल, आसमान में उड़ते बादल मानो कुंड में डुबकी लगाने के आतुर हों.  दूर्-दूर् तक हरियाली की चादर, निष्णांत पहाड़ और श्रद्धालुओं का तांता, मौन श्रद्धा भाव से नतमस्तक होता. सब कुछ रमणीय ही नही, दिल की गहराई में उतर सा रहा था. शांत-शांत—- और शांत होता हुआ चित, इस बात को इंगित कर रहा था कि भगवान शंकर ने यों ही नही चुना तपस्या के लिए इस स्थल को. हम सबके बीच व्याप्त अदृश्य मौन को एक दोस्त ने तोड़ा, चलो अब माई की बगिया चलते हैं.                                                                                

                  माई की बगिया नर्मदा नदी के उदगम के पास कोई 1 कि.मी. दूर् है. ऐसा माना जाता है कि यहाँ “नर्मदा” का बाल्यकाल गुजरा था. यहीं “गुलबकावली” जो एक औषधीय पौधा का जन्म स्थल भी है. आँखों के लिए इसका अर्क रामबाण माना जाता है. हर दुकान में आपको ये रखा नजर जाएगा. इसी स्थल से कोई 2 कि.मी.आगे एक ओर मनोरम स्थल है, सोन नदी का उदगम स्थल. यहाँ जाते वक्त बीच में शंकराचार्य का आश्रम पुराने अवशेषों में, बरबस ध्यानाकृष्ट करता है. आदि शंकराचार्य के इसी स्थल पर अपने गुरु का सामीप्य मिला था. यों कहलें हमारी संस्कृति के महान पुरोधा आदि शंकराचार्य को, यहीं मिली थी गुरुवाणी, भारत की एकता के लिए चार दिशाओं में चार मठ (बद्रीनाथ, पुरी, द्वारिका और श्रिन्गेरि पीठ) की स्थापना. नर्मदा उदगम से, उसके प्रवाह की दिशा में, ठीक 6 कि.मी.दूर् है, कपिल धारा. नर्मदा नदी का पहला और सुंदर जलप्रपात. नीचे जाकर निहारेंगे तो लगेगा मानो श्वेत रूई कई टुकड़ों में बिखर रही है. यहीं पर है कपिल आश्रम.        
           कपिल आश्रम एक छोटा सा स्थल. जहाँ कपिल मुनि ध्यानस्थ रहा करते थे और उनकी इस साधना ने “सांख्य योग” के रूप में मूर्त रूप लिया. षटदर्शनों में एक है सांख्य दर्शन. जो हमारी संस्कृति की एक बड़ी पूंजी है. जीवन के गूढ सूत्रों की व्याख्या, इस अरण्य क्षेत्र में हज़ारों साल पहले हुई. पर ऐसी ही हमारी ये पूंजियों का हमें कोई ज्ञान आज की पीढ़ी को नही. ये पूंजियाँ धर्मनिरपेक्षता के संकीर्ण आईने की भेंट चढ़ गई. अमेरिका के एक विश्व-विद्यालय में गीता को एक अनिवार्य विषय बना दिया गया.  आज क्या ऐसी बात हम इस देश में सोच सकते हैं ?  अमेरिका ने एक राह दिखाई है कि हमारा पुराना साहित्य जो प्रकृति की कोख में बैठकर रचा गया है, वह मानवता की असली सीढ़ी है, वह मानव मात्र की पूंजी है. उसके पढ़ने से कोई धर्म भ्रष्ट नहीं होगा. किसी धर्म-निरपेक्षता पर खतरा नहीं आएगा. प्रकृति के पेड़-पौधे, जल, पहाड़, हवा आदि सब एक समान सबके लिए उपयोगी है. इनके सानिध्य में लिखा भारत का पुरातन ज्ञान भंडार भी सबके लिए समान रूप से उपयोगी है. पर भारत में ही ये अब मात्र पुस्तकालयों का हिस्सा बनकर रह गया है.
                 कपिल धारा के पास ही है दुर्वासा ऋषि का तपस्या स्थल, जालेश्वर महादेव आदि-आदि कई पौराणिक एवं प्राकृतिक मनोरम दृश्य है अमरकंटक में. यहाँ पर जाकर लगा कि चर्म चक्षुओं से नही, यहाँ का सौंदर्य मन की आँखों से आत्मानुभूति को अधिक आनंद विभोर करने वाला है. योग की हमारी अनोखी विद्या और कई ऋषियों का ये तपस्या स्थल हमारे संस्कारों का पालना सा लगता है. जितना झूलेंगे उतना आनंद आएगा…. 
                अमरकंटक बिल्कुल छत्तीसगड़ की सीमा से सटा हुआ है. छत्तीसगड़ के एक बड़े शहर, बिलासपुर से सड़क मार्ग से कोई 115 कि.मी. दूर पड़ता है. बीच का रास्ता अद्भुत रमणीय है. साल घाटी के नाम से जाना जाता है. बिलासपुर से निकलकर हमने एक रात अचानकमार अभयारण्य में गुजारी. यहाँ 17 शेर हैं ऐसा माना जाता है. इसी लालच में हम जंगल के बीच स्थित एक रेस्ट हाउस, “लमनी” में रुके. एकदम भोर में उठे. जंगल में घनघोर सन्नाटे के बीच चाँद की, चाँदनी की मादकता से मानो पूरा वातावरण मदमस्त सा लग रहा था. बीच-बीच में किसी किसी जानवर की आवाज़ इस सन्नाटे को विदीर्ण करती हुई सी जान पड़ रही थी. सुबह 5.30 बजे हम घने वनों के बीच जंगल में वन्यप्राणियों की छटा देखने निकल पड़े गाड़ी से. बीच- बीच में हिरण, चिंकारा, खरगोस, मोर, तितर नाना प्रकार के वन्यप्राणियों को प्रकृति की गोद में कुलाचें भरते देखा. वो हमें देखते और फिर सहम कर भाग जाते. शेर नही दिखा. मायूसी जरूर हुई, पर प्रकृति का इतना सुंदर सामीप्य, एक यादगार ताज़गी, स्मृति के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज कर गया. 
                   हमारे गाइड कन्हैया ने बताया कि पहले वन्यप्राणी गावों के नजदीक ही दिख जाया करते थे. अब वो बात नही रही. गावों में रेडियो, माइक, टी.व्ही. आदि की आवाजों से वे डरते हैं. सैलानियों की आवाजाही भी अधिक हो गई है. हम कन्हैया के मन को पढ़ रहे थे. वह इससे खुश नही था. एक गाइड होते हुए भी, वह जंगल की खूबसूरती को अधिक तवज्जो दे रहा था, न कि अधिक से अधिक सैलानी यहाँ आएँ. हमने भी इस चीज को महसूस किया कि आसपास के गावों में सुबह से ही माइक जोर-जोर से बज रहा था. फिर हमें वन्यप्राणी देखकर जिस तरह बिदक रहे थे, उससे साफ है कि वे हमे (इंसानो) अपने इलाक़े में पसंद नही करते. फिर, इस दिशा में सोचा जाना चाहिए कि क्या वनों, अभयारण्यों एवं नेशनल पार्कों में सैलानियों की संख्या बढ़ाना जरूरी है ? जबकि वे (वन्यप्राणी) हमें पसंद नही करते. फिर भी क्या सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा ?  कहीं खो न जाएँ ये …

लोक संस्कृति का अनूठा पर्व छेर-छेरा…

October 1st, 2011
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(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.)

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सबेरा हुआ ही था, एक साथ बच्चों का एक बड़ा झुंड, दरवाजे पर एक स्वर से “छेर-छेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा….” की राग छेड़ रहे थे. मेरे घर पधारे मेहमानों ने मुझे आवाज़ दी, उन्हें ताज़्ज़ूब हो रहा था, एक साथ इतने बच्चे माँगने निकले हैं. मैंने मेहमानो को मुस्कराते हुए समझाया, उनका अनुमान गलत है, ये माँगने वाले बच्चे नही हैं, ये बच्चे तो छत्तीसगढ़ की उस सांस्कृतिक परंपरा के अगुआ हैं, जो इन्हें पुरखों से विरासत में मिली है. ये बच्चे खुशियाँ बांटने निकले हैं. आज पौष पूर्णिमा (11 जनवरी 2009) है, जिसे छत्तीसगढ़ में ‘छेर-छेरा’ पर्व के नाम से मनाया जाता है. छत्तीसगढ़ के किसान धान की कटाई एवं मिसाई के बाद जब धान को घर की कोठी (माई कोठी) में सुरक्षित रख देते हैं, तो गाँव की गलियों में नई फसल का जश्न मस्ती और उल्लास के साथ मनाया जाता है. गाँव के बच्चे-बच्चियाँ हर घर के दरवाजे पर टोलियाँ बनाकर धान माँगने पहुँचते हैं. किसान उन्हें श्रद्धा से अतिशुभ का आगमन मानकर धान भेंट करते हैं. हर किसान आतुर होता है कि उसे आज छेर-छेरा का धान देना है.


             छत्तीसगढ़ की लोक -सांस्कृतिक परंपरा का ये एक बेजोड़ त्योहार है, जिसमें नई फसल का उल्लास तो है ही, पर मिलजुल रहने की सामाजिक संभावना का एक बड़ा संदेश भी देता है. इसमे गाँव के हर वर्ग का व्यक्ति भाग लेता है, अमीर हो चाहे गरीब, मज़दूर को या किसान, सब एक साथ भाग लेते हैं. छेर-छेरा की परंपरा ने इस देश को एक बड़ी सौगात भी दी है. विश्व चावल अनुसंधान केंद्र मनीला (फिलीपींस) को छोड़कर धान की सर्वाधिक 24000 से अधिक प्रजातियाँ, छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय मे ही सुरक्षित है. इन सुरक्षित प्रजातियों का 85% संग्रहण एक एकलौते कृषि वैज्ञानिक डाक्टर आर.एच.रिछारिया ने 1971 से 1976 के बीच छत्तीसगढ़ में घूम-घूमकर गाँव मे गाँव से प्राप्त कर उसे वैज्ञानिक स्वरूप दिया है. धान के प्लाज़ा के रूप मे. डाक्टर रिछारिया इतनी सारी प्रजातियों के पाए जाने पर यह तर्क रखते हैं कि छत्तीसगढ़ के किसान छेर-छेरा पर धान की अदला-बदली पीढ़ियों से करते आ रहे हैं. इस धान की अदला बदली से प्राप्त धान को वो खेतों में बोते रहे, अलग-अलग धनों के साथ मिलने पर, नई-नई धान की प्रजातियाँ अनचाहे मे ही जन्म लेती रही. ” जिनमें कुछ तो ऐसी हैं जो आधुनिक अनुसंधानों को भी लजाती सी जान पड़ रही हैं. धान की इन उत्कृष्ट प्रजातियों के चलते ही विश्व की कई बहू-राष्ट्रीय कंपनियों ने इन प्रजातियों को साम-दाम-दंड-भेद से हासिल करने की जीतोड़ मेहनत की है. जिसमे कृषि बीजों की उत्पादक सबसे बड़ी कंपनी सीजेंटा का भी नाम शामिल है.
                    छेर-छेरा (पौष पूर्णिमा) पर किसानो और मजदूरों के बीच नया अनुबंध भी होता है. मजदूरों के लिए तय किया जाता है कि अगले साल भर के लिए उसका पैकेज कितना होगा. ठीक उसी तरह जिस तरह आज कल बड़ी कंपनियाँ अपने मातहतों के लिए सालाना पैकेज निर्धारित करती है. इस दिन सब मजदूर स्वतंत्र हो कर छुट्टी मानते हैं और अपने लिए नया किसान तय करने की परंपरा रही है. अब इस प्रथा में बदलाव आ गया है. गाँव-गाँव में रोजगार के नये अवसर आ चुके हैं. पहले किसानों के यहॉं पीढ़ियाँ-दर पीढ़ियाँ मजदूर परिवार सहित सेवा करते रहे. दोनो के बीच सहचर्य की भावना थी. किसान को खेत, खलिहान और पशुओं के लिए मजदूरों की जरूरत होती थी, बदले में वह पूरे मजदूर परिवार को संरक्षण देता था, जीविका का. इसलिए भुखमरी की समस्या इन परिवारों को नही भोगनी पड़ती थी. खेतों एवं खलिहोंनो पर काम न होने पर भी मजदूरों को हर माह किसान धान देते रहते थे. बाद में कई स्थानों पर कुटिल किसानों ने इस शानदार परंपरा को कलंकित किया. यही प्रथा धीरे-धीरे बंधुआ मजदूरों के रूप में सामने आई, एक शोषक व्यवस्था के रूप में. पर ये इस त्योहार की बुराई नही थी बल्कि मानव के दानव मन की उपज थी.
             मेरे मेहमानों ने उत्सुकता जाहिर की कि छेर-छेरा में धान दिए जाते हैं, तो आपने इन्हे चावल क्यों दिलवाए. उनका सवाल सही था. शहरों में इन बच्चों को छेर-छेरा की खुशी के बदले चावल अथवा पैसे ही मिलते हैं, पर इन बच्चों के जरिए छेर-छेरा की खुशबू घर की चौखटों तक पहुँचतीं रहती है, ये क्या कम बड़ी बात है ? वैसे आधुनिकीकरण की दौड़ मे गाँव मे भी इस त्यौहार के जश्न में फीकापन आया है. वैसे भी लोक संस्कृति का अब शहरीकरण हो गया है. सरकार उसे संरक्षण देने के नाम पर नया जामा पहना रही हैं, जिसमे आधुनिक ढंग का मनोरंजन और पर्यटकों को लुभाने की दृष्टि से उसे सजाया-सँवारा जा रहा है, यानी संस्कृति का बाजारूकरण किया जा रहा है. जहाँ हर माल लाभ की दृष्टि से पेश किया जाता है चाहे उसमें मिलावट कितनी ही क्यों न की जाए ? तमाम मिलावटों के बावजूद छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का छेर-छेरा पर्व हमें भाईचारे से रहने और समाज को एकजुट रहने का संदेश आज भी प्रतिध्वनित करता है कि आओ मिलजुलकर कामयाबी की खुशियाँ मनाएँ.

मुंडेर,दाने और परम्परा…..

October 1st, 2011
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मुंडेर पर, कलरव चिड़ियों का,


है प्रतीक, उषा काल का,
जागृत रोज, मुझे वो करतीं
उठो, लाओ दाना हमारा
सुवासित मंद समीर, छत पर
अर्घ रवि को अर्पित कर
तुलसी को शीश नवाओ.
      
                                          क्यों रोज चुगाता, इनको दाना
                                          पहले माता चुगाती थी, इन्हे
                                          बताती, तेरे दादा, परदादाओ
                                          की है, ये पुरातन परम्परा
                                          पर तूँ भी करना ऐसा ही
                                          कभी तो कहा नहीं उसने
                                          बस देखा, सीखा और
                                          ये अविरल  सिलसिला बन गया

अब रोज मुंडेर पर दाना बिखेरता
चिड़िया हक जतातीं हैं इनपर,
कुछ को चुगती, कुछ बिखराती
चहक-चहक कर,बिखरे दानो को
फिर-फिर चुगती, ऐसे इठलाती
मानो सबकुछ है, इनका

                                               ये दाने, छत, आसमां.. कहाँ से आये
                                               कौन बनाता दाना, कौन है लाता
                                               क्यों जानें ये, क्या मैने ऐसा जाना
                                               जब मैं ये कहता, ये घर है मेरा
                                               क्या मिट्टी, गारा, पानी…….
                                               मेरे हैं? बनाया है, मैने..?
                                               तो ये सच है,ये छत,
                                               आसमां, दाना ,सबकुछ है इनका….

{रोज की इस दिन-चर्या में आज ये भाव बरबस ही मन में आये और सोचा कुछ कविता सी कर ली जाय. ये कविता-सी रचना मेरे उस दोस्त को समर्पित है, जो दिल से बच्चों सा है और समझ में नीर-क्षीर-सा विवेकी. वो जीवन के 16 पवित्र संस्कारों में सबसे महत्वपूर्ण परिणय संस्कार से पोषित हुआ है. उसके सुखद और मंगल भविष्य की कामना के साथ…}

मुंबई पर हमला,और कितना शर्मशार होंगे

October 1st, 2011
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कितना कड़वा सच है,  दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर, चंद मुठ्ठी भर लोग, जब चाहें बता-बता कर उसकी मर्यादा का मानमर्दन करें, लोगो के खून से होली खेले और ऐसे खूनी भेड़ियों की गर्दन सिर्फ हम इसलिए बचाएं क्योंकि जम्मू-कश्मीर में सत्ता को नुकसान हो जाएगा, कुछ को बिहार में, कुछ को यू.पी. में और कुछ को लोकसभा के चुनावों में. इसलिए अफज़ल जैसे मौत के सौदागर को फांसी नहीं देना है, बाटला हाउस के लिए सुरक्षा बलों को चीख-चीख कर बदनाम करना है, सिम्मी की वकालत करना है और सेना के कर्तव्यनिष्ठ अफसरों को एक नार्को टेस्ट की आड़ में पूरी सेना को कटघरे में खड़ा करना आदि-आदि की परिणिती क्या है?  कराहती मुंबई है, इसका जवाब. कहाँ है मुलायम?  कहाँ हैं लालू?  मुंबई वाले आज पूछ रहें हैं?  ये मौत के सौदागर क्या सिर्फ 26 नवंबर 2008 को मुंबई आए और उन्हे पूरी मुंबई की पहचान हो गयी ?  इस पहचान में मदद करता है, सिम्मी, ये बात देश की ख़ुफ़िया एजेन्सी के प्रमुख कहते हैं. जब इनकी बात पर गौर नही करोगे तो देश को, गृह मंत्री ये बताकर क्या साबित करना चाहते हैं कि आतंकवादियों के पास जैविक और रासायनिक हथियार भी हैं. जनाब,  आप देश को ये बताएँ कि इस देश में कबसे आतंकवादी हमले में अब और कोई बेगुनाह की जान नहीं जाएगी .क्या आपमें वो हिम्मत जब अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने देश के लोगो को 11 सितंबर के हमले के बाद आश्वस्त किया था कि वो अब अमेरिका पर और कोई आतंकवादी हमला नहीं होने देंगे. उन्होने जो कहा वो कर के दिखाया. क्या आप ऐसा कर पाएंगे?  एक रेल दुर्घटना पर मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने वाले लालबहादुर शास्त्री क्या अब सत्ता के आदर्श प्रतिबिंब नही रहे ?
           जयपुर, अहमदाबाद, बंगलोर, दिल्ली और अब मुंबई. वो मुंबई जिस पर पिछले एक साल से हमले की बात आतंकवादी कर रहे थे, आखिरकार वो इस पर अमल करने में कैसे कामयाब रहे?  मुंबई ही नहीं पूरा देश इसको जानना चाहता है.  देश जानना चाहता है कि आतंकवादियों के इतने हमलों के बाद भी क्या हम हमलों को अंजाम देने वालों को नही पहचान पाए?  इन हमलों में देश के भीतर और बाहर किन-किन का हाथ है ?  इन हाथो पर अब तक प्रहार नही किया गया है तो कब तक किया जाएगा ?  ये नही कर पाए हो तो लोगो क़ी सुरक्षा क़ी गारंटी कौन देगा?  देश क़ी इज्जत मट्टी पलित हो रही है पूरी दुनिया में. यहाँ तक कि इंग्लेंड की क्रिकेट टीम भारत का दौरा रद्द कर स्वदेश लौटना चाहती है, क्या अब भी कोई शर्मशार होने वाली घटना का इंतजार किया जा रहा है ? आतंकवाद रोकने वाले कानून पोटा को धर्म विशेष के लोगो से जोड़ कर, क्या देश को गर्त में धकेलना ठीक है ?  कठोर कानून आतंकवादियों के लिए है तो फिर ये किसी धर्म विशेष \के खिलाफ कैसे हो गया? मान लिया जाय है भी, तो क्या देश से बड़ा धर्म है?  देश की रक्षा के लिए तो हमारे देवी- देवताओं ने भी अस्त्र-शस्त्र उठाए हैं,  और दुष्टों का दमन किया है.  आज के इन दुष्टों पर आप काबू नही पा सकते तो फिर आम आदमी जानना चाहता है कि आप सत्ता में क्यों रहे?  आखिर आम आदमी ने ही तो अपनी सरकार बनाकर आपको देश की और अपनी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी है?   जब ये दोनो आपके हाथों सुरक्षित नही तो आप उसकी {आम आदमी} सत्ता पर काबिज नही रह सकते. मुंबई का दर्द बड़ा पीड़ा दायक है. आप बैठके न करे,  जनता समाधान चाहती है.  सता के लिए आतंकवाद पर नर्म नहीं आरपार की इच्छा शक्ति शब्दों में नहीं धरातल पर नजर आनी चाहिए.  अब तुष्टिकरण नहीं जनता की सुरक्षा की पुष्टि कीजिए, वरना जनता की सत्ता छोड़ दीजिए.
            मानवता के दरिंदों के हमलों में मुंबई में हताहत हुतात्माओं को विनम्र श्रद्धांजलि  …………………………….

क्या मुंबई का जलजला जवाबदेह प्रशासन का पैग़ाम साबित होगा?

October 1st, 2011
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(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.)

http://datastore.rediff.com/h5000-w5000/thumb/6858606E665A6A667263/6ibta5nde4mdsv7h.D.0.Kim6.JPG

हाँ, ये एक जलजला है, जो हरेक के ज़हन से उठ रहा है, राष्ट्रीयता का. ये हिलोरें ले रहा है, देश के हर एक चौक-चौराहे पर. कुछ-कुछ वैसा ही है, जब फ्रांस में व्यवस्था के खिलाफ लोगों के जज़्बे ने बास्तिल दुर्ग को ध्वस्त कर 14 जुलाई 1789 को अपने अधीन कर लिया. घोषित किया, एक नया फ्रांस, एक लोकतांत्रिक फ्रांस और एक मजबूत फ्रांस. पुरानी राजव्यवस्था का नामोनिशान मिट गया. ये बात दीगर है कि उनके सपनों पर कुछ समय के लिए नेपोलियन का निरंकुश तंत्र स्थापित हुआ. पर, उसमे भी एक मजबूत फ्रांस ने जन्म लिया. जो आज सीना ताने खड़ा है, दुनिया के सामने— अपनी सभ्यता पर नाज़ करता है और विकास की आसमानी बुलंदियों पर है एक विकसित राष्ट्र के रूप में जाना जाता है.                   मुंबई की घटना, 26 नवंबर 2008, बुधवार की काली रात, किसी भी भारतीय को भूले नही भुला रही है. 3 दिसंबर 2008 की शाम देर रात मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया पर लाखों की संख्या में उपस्थित नागरिकों के साथ, मानो पूरा देश शामिल था. सब ओर एक ही आवाज़, बस अब बहुत हुआ. अब व्यवस्था का ये ढर्रा नही चाहिए, नही चाहिए तामझाम करती अफसरशाही और इन नेताओं की सूरत और शीरत तो नक़वी और केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानंद के चेहरों से समझी जा सकती हैं. इन नेताओं को मालूम है कि इस देश में हमेशा से ये होते आया है, जब-जब जनता लामबंद हुई, उसका दावानल हमेशा समय की राख में दफ़न हो गया. अब भी होगा. तभी तो वो ये बातें कर लेते हैं.


              पर ये नेता जिन्हे हम लोकतंत्र में अपना प्रतिनिधि कहते हैं, क्या वास्तव में हमारा प्रतिनिधित्व करते हैं ? क्या,  इनमे राजसी ठाठ बाट और शानो-शौकत नही आ गई है ?  इसके लिए कौन ज़िम्मेदार हैं ? इस पर मुझे बचपन में बड़े लोगों से सुनी वो कथा याद आ गयी कि “एक बच्चा, लड़कपन में चोरी कर चीजें घर लाता था और माँ उसे अनदेखी करती. एक दिन वो बड़ा चोर बना और यहाँ तक कि डकैती कर हत्या की. उसे फाँसी की सजा हुई. फाँसी के पहले उसे अन्तिम इच्छा पूछी गयी. तो उसने माँ से मिलने की इच्छा जाहिर की. माँ आई और चोर ने उसका कान काट खाया. लोगों को ताज्जुब हुआ, मरते-मरते भी क्या कर गया तू ? तो चोर ने कहा मैं बचपन में चोरी कर जब घर आता, तो माँ के इन कानो ने चोरी की बात सुनकर भी अनसुना किया.  इसलिए मैं जो आज कुछ हूँ, माँ की अनदेखी के कारण है. ठीक यही स्थिति क्या हमारी नही है ?


              इस लोकतंत्र का माँ-बाप सबकुछ आम जनता है और जनप्रतिनिधि इसकी जायज संतान.हमने साठ सालों तक इस संतान (जनप्रतिनिधि) को बिगड़ने दिया है. पूरी व्यवस्था नेता-मुखी हो गयी है, हर एक छोटे-मोटे काम से लेकर नौकरी पाने तक के लिए हम इनकी शरण में जाते हैं.  ऐसी स्थिति में जब मुंबई की घटना से पूरे देश मे एक ही आवाज़ उठ रही है कि “सब कुछ बदलना चाहिए” तो ये आखिर करेगा कौन ?  क्या कुछ लोग, कुछ संस्थाएं ?  तो फिर जंग लगी नौकरशाही, क्या नयी आइलिंग के साथ काम कर पाएगी ? इसका उत्तर तो शायद भविष्य के गर्भ में ही छुपा है ? पर, ये जलजला अकारण व्यर्थ नहीं जाना चाहिए. जो विरोध मुंबई की घटना पर हुआ है, वह हमारी आदत का विषय होना चाहिए. जिन्हे हम चुने, वो हमारे पास आए, वे हमारे रहमो-करम पर हैं, हम नहीं. घर की नाली की सफाई की व्यवस्था भी नही हो रही है, तो वो आएँ, ज़िम्मेदार वो हैं. हमने तो व्यवस्था की चाबी और नौकरशाहों के नाक में नकेल डालने की ज़िम्मेदारी उन्हे जो दे रखी है. फिर हमे क्यों परेशान होना पड़े ? हम आएँ तो सिर्फ सड़क पर. ये आदत का विषय न हुआ तो मुंबई की घटना सिर्फ एक हादसा मात्र हो कर, इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी. इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़ा जान आंदोलन बहुत लंबे समय तक खिंच नहीं पाता है, वह दम तोड़ ही देता है. आइए, ऐसा हो इसके पहले हम सब मिलकर एक नये भारत के लिए. “जबाबदेह शासन” का, जवाब माँगने का जज़्बा अपनी आदत में शुमार करें, ये राष्ट्रीय चरित्र बन जाए. फिर, हमारी लोकतांत्रिक औलादे (जनप्रतिनिधि) खुद-बखुद अपने पालकों (आम-जनता) के लिए चिंतित होगी. क्या मुंबई का जलजला जवाबदेह प्रशासन का पैग़ाम साबित होगा —– ?