सांस्कृतिक परंपराओं की विरासत—— बस्तर दशहरा
(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.) (29 सितंबर 2008 से इस वर्ष के बस्तर दशहरा की काछिन गादि रस्म की शुरूवात हुई है. आप सबको बस्तर आने का सादर आमंत्रण है.) नवरात्रि की शुभकामनाएँ———-
हमारी संस्कृति में, हमारे संस्कारों का कैसे बीजारोपण हुआ है, इसकी मिसाल हैं, हमारे तीज-त्यौहार. यकिनन हम सबको इसका अहसास है. एक-एक त्यौहार क़ी, हर एक परम्परा में, कहीं न कही सामाजिक मूल्यों का बोध होता जान पड़ता है. बस्तर के दशहरे को ही ले लीजिए, जो एक पिछड़े कहे जाने वाले, धूर जंगली इलाक़े में ठेठ भारतीय अंदाज में, पुरखो से मनाया जा रहा. लेकिन, इसके हर तौर तरिके में वो संदेश अभिव्यक्त हैं, जिस पर हम सब गर्व कर सकते हैं. अमूमन बस्तर के दशहरे के संबंध में, यही अधिकतर लोग जानते हैं कि यह भगवान राम क़ी रावण पर विजय के उपलक्ष्य में नही, अपितु माँ दंतेश्वरी{बस्तर अंचल के लोगो क़ी आराध्य देवी जो दुर्गा का ही एक रूप है }क़ी आराधना को समर्पित एक पर्व है, जो 10 दिन नहीं पूरे 75 दिन तक चलता है. पर बस्तर के दशहरे क़ी जानकारी इससे अधिक का मायने रखती है, एक-एक रस्म, हमारे संस्कृतिक मुल्यो क़ी, महान परंपराओं क़ी संदेश वाहक हैं.
काछिन गादि को ही लीजिए,ये रस्म है, दशहरे के, मुख्य समारोह के शुरू होने क़ी पहचान.{वैसे यह दशहरा शुरू होता है,श्रावण मास क़ी अमावश्या से, रथ बनानेवाली लकड़ी पूजा से और चलता है अश्विन मास के शुक्ल पक्ष क़ी त्रयोदशी तक} दिन होता है भाद्र मास क़ी अमावश्या. इस दिन माँ दंतेश्वरी से मुख्य समारोह शुरू करने क़ी अनुमति ली जाती है, जो विराजित रहती हैं काछिनगादि पर. यह एक कांटो क़ी सेज होती है,जिस पर एक बाल कन्या माँ दंतेश्वरी के रूप में लेटती है. यह कन्या होती है एक अनुसूचित जाति {एस.सी.} क़ी और उससे समारोह क़ी अनुमति लेता है, बस्तर के राजपरिवार का व्यक्ति. वह हाथ जोड़कर बालिका क़ी पूजा करता है और उससे बदले में फूल भेंट पाने पर, देवी क़ी अनुमति समझा जाता है. इस रस्म का अद्भुत पहलू देखिए, बस्तर आदिवासी बाहुल्य वाला इलाका है और जब बस्तर का दशहरा 15 वीं शताब्दी में चालू हुआ उस समय भी यह क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य वाला था. वैसी स्थिति में एक दलित वर्ग{आदिवासी नहीं] क़ी कन्या को, इतना सम्मान कि स्वयं राजा, उसकी पूजा करे और उससे किसी समारोह क़ी शुरूवात की याचना करे, यह सम्मान तो आज के वोट के राजा भी नहीं देते.
समारोह की परंपरा में फिर होती है, जोगी बिठाई. जिसमें एक हलबा अनुसूचित जनजाति [ एस.टी.] का व्यक्ति माँ दंतेश्वरी की लगातार 9 दिन तक उपवास रख कर, एक ही स्थान पर आराधना करते रहता है. जोगी बिठाई से प्रतिदिन मांझी, मुंडा, नाईक इत्यादि विभिन्न आदिवासी समुदाय के लोग रथ को रोज शाम को सात दिन तक राजमहल के सिह द्वार तक खींचते हैं. जोगी उठाई के बाद भीतर रैनी (विजया दशमी) और बाहर रैनी (रथ खींचने की परंपरा कासमापन) में सभी समुदाय के लोग मिलजुलकर हिस्सा लेते हैं. आश्विन शुक्ल की बारहवी को लगता है मुरिया (इसी आदिवासी जाति का घोटुल विश्व प्रसिद्ध है) दरबार. जिसमे आम जनता के साथ राज परिवार के लोग बैठकर विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर बातचीत करते हैं. और अंत में अश्विन शुक्ल 13 वी को होता है ओहाडी पर्व. जो मावली माई के सम्मान में होता है. और सब लोग इस दिन मिल जुलकर भोजन ग्रहण करते हैं.
बस्तर दशहरे के इन रस्मों में सामाजिक समरसता और भाईचारे का जो संदेश पग-पग पर दिखाई देता है वह आज के इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजसी ठाठबाट पा रहे उन राजनेताओ के लिए एक सीख है कि सत्ता प्राप्ति के लिए समाज को बांटने की जरूरत नहीं बल्कि इस देश की माटी ने सत्ता को ज़िम्मेदारी का बोध कराया है. जातपात के नाम पर हायतौबा करने वाले उन लोगों को काछिन गादि की परंपरा से कुछ सीख तो जरूर लेनी चाहिए कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में समरसता पुरखों से है. उसे रैलियों, भाषनो और नारों की आवश्यकता नहीं. वे इसे न समझ सके तो आकर बस्तर दशहरा से सीख सकते हैं.