हमारे संस्कारों की धरोहर
(On Rediff iLand, the previous version of Rediff Blogs, we used to have a very popular writer-blogger amongst us who wrote in the name of Kim Agrawal. He wrote his blogs in beautiful Hindi and all his posts carried the fragrance of our earth and colors of Mother Nature. After Rediff iLand migrated to Rediff Blogs, unfortunately his blog http://rypcg.rediffiland.com/ was lost due to some technical error. I happened to find some of his posts saved on my computer and I am posting these 10 posts on my blog, with my love and regards to Kim and waiting for his return to blogging.) हर साल,हम महाशिवरात्रि पर राजिम (छत्तीसगढ़ की राजधानी से कोई 50कि.मी. दूर) जाते हैं ? रायपुर से रवाना हुए, तो एक दोस्त ने ये सवाल उठाया था ?लगभग इसी सवाल को, आज (23फ़रवरी 2009) हमने राजिम कुंभ पर जूना अखाड़े से पधारे एक पूजनीय संत के सामने रखा ? महाराज,लाखो-लाख लोग एक ही दिन में पवित्र स्थलों पर पहुँचते हैं, ऐसा क्यों ? पहले वे मुस्कुराए फिर बोले, तुम लोग पढ़े-लिखे योग्य लोग हो, तर्क-वितर्क के लिए पूछ रहे हो, तो मेरे पास उत्तर नही है, श्रद्धाभाव से पूछ रहे हो तो मैं कुछ कह सकता हूँ. हमने जिज्ञासा जाहिर की. वे कहने लगे “शब्द” या “नाम” का महत्व तुम लोग जानते हो ? हमने कहा नही. संतश्री ने कहा, तो बताओ तुम्हे कोई गाली दे, कोई प्रशंसा करे या कोई डराए तो अलग-अलग प्रतिक्रिया व्यक्त करते हो ? इसका मूल कारण है कि तुम इस शब्द के भाव से जुड़ जाते हो. तुम्हारा स्थूल शरीर और मन के भाव प्रतिक्रिया देते हैं. अध्यात्म में नाम का भी यही महत्व है. “सीताराम” हो या और कोई जप, सब से सूक्ष्म भाव पैदा होता है, आत्मा पवित्र होती है. ठीक नाम जप की तरह, पवित्र धार्मिक स्थलों का महत्व है, खास दिनों मे ये महत्व कई गुना बढ़ता है. इन स्थलों पर जितने अधिक लोग श्रद्धा से आते हैं, वे सब पवित्र आत्माएँ हैं. जो ईश्वर का अंश है. संख्या जितनी अधिक होगी, श्रद्धा का घनीभूत रूप उतना ही अधिक होता है. सदियों से, इन स्थलों पर एक दिन विशेष पर कई ऋषियों, संतो, और पुण्यात्माओं का आगमन हुआ है, उनका आगमन इन स्थलों पर प्रभाव की ऊर्जा छोड़ता है, जो जितने श्रद्धाभाव से आएगा, उसे उसकी उतनी ही अधिक अच्छी अनुभूति होगी. ठीक उसी तरह, जिस तरह तुम्हारे हाथों में मोबाइल सेट का नेटवर्क सेट की क्वालिटी पर निर्भर है.
राजिम छत्तीसगढ़ का प्रयागराज कहलाता है. और यहाँ महानदी के त्रिवेणी संगम पर, हर वर्ष कुंभ का आयोजन होता है. महाशिवरात्रि पर इस कुंभ का समापन होता है जिसमें देश के कोने-कोने से हज़ारों पूजनीय साधु,संतों, महामंडलेश्वरों, आचार्यों और वंदनीय शंकराचार्यों का आगमन होता है. राजिम का महत्व पौराणिक समय से रहा है. जगन्नाथपुरी (उड़ीसा) के दर्शन तब तक अधूरे माने जाते हैं जब तक वहाँ (पूरी) से दर्शन कर भगवान राजीव लोचन (राजिम) के दर्शन न कर लें. इसी मान्यता के चलते वैष्णव संप्रदाय के महाप्रभु वल्लभाचार्य के माता-पिता जब पूरी दर्शन कर राजीव लोचन धाम, राजिम पधार रहे थे, तब राजिम के पास चंपारण में उनका (वल्लभाचार्य) जन्म हुआ था. राजिम में त्रिवेणी संगम पर माता सीता द्वारा स्थापित शिवलिंग है, जिसे कुलेश्वर महादेव कहा जाता है. महाशिवरात्रि पर संगम में स्नान कर, कुलेश्वर महादेव के दर्शन की ललक हर व्यक्ति की रहती है. संगम पर महानदी लोमश ऋषि के आश्रम को स्पर्श करती है. इस नदी का उद्गम भी श्रिन्गी ऋषि के तपोस्थल (सिहावा पर्वत) से हुआ है. वो ऋषि (श्रिन्गी) जिसके कारण भागवतगीता (परीक्षित को अभिशाप) का उद्गम हुआ. जो सनातन धर्म में गोमाता की महिमा गाथा के सबसे प्रकाण्ड ऋषि माने जाते हैं. यह भी मान्यता है कि राजिम के त्रिवेणी संगम पर ही, ऐरावत (हाथी) को मगरमच्छ द्वारा अपने चंगुल में लिए जाने पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ को खंडित कर ऐरावत का उद्धार किया था. मान्यता यह भी है कि एक भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं विष्णु भगवान राजीव लोचन मंदिर में मूर्ति रूप में विराजित हैं. इसीलिए मंदिर को पूरी के दर्शन के साथ जोड़ा गया माना जाता है.
आज महाशिवरात्रि पर राजिम कुंभ का अन्तिम शाही स्नान हो रहा है. कई अखाड़ों से पधारे, आचार्य और महामंडलेश्वरों के नेतृत्व में, त्रिवेणी संगम में, हज़ारों साधु-संतों ने डुबकी लगाई. जय-जय घोष के साथ. चारों ओर जन सैलाब इस कदर है कि नदी का कोई तट इंच मात्र को भी खाली नही है. स्त्री-पुरुष एक साथ, एक भाव से डुबकी लगा रहे हैं. जहाँ मन का फेर नही होता, वहाँ तन की पहचान खो जाती है. कम से कम मनोहारी पुण्य स्नान में आपको ये अनुभूति अंतर्मन से अवश्य प्रतिध्वनित होगी. सबका एक ही लक्ष्य है, भावनाओं की हिलोरों को पुण्य भाव से सराबोर करने की.
पुण्य की डुबकी के साथ कुंभ स्थल पर एक यज्ञकुंड सबकी श्रद्धा का केंद्र बिंदु बना हुआ था. संतश्री बालक दास महाराज के इस स्थल पर चौबीसों घंटों “नाम” जप को हम यज्ञ की शान कह सकते हैं तो गौमाता के साथ गौशाला की उपस्थिति यज्ञ की जान कह सकते हैं. व्यस्त क्षणो में महाराज श्री (बालक दास जी) से दुर्लभ मुलाकात हमारे किए आत्मविभोर होने वाला क्षण था. उन्होने अपने श्रीमुख से कहा कि यज्ञ की आहुति हमारे मन, शरीर और बुद्धि को पावन करती है. शक्ति देती है. मन का पुण्य ऊर्जा से शक्तिवान होना ” शक्ति ” प्राप्ति है, यही शिवत्व की प्राप्ति है. शिव यानि तपोनिष्ट जीवन का प्रतीक स्वरूप जो आत्ममंथन में लीन रहता है, पर हमेशा दूसरे का कल्याण करता है. जो नाश करता है हमारे मन के दर्प को और नाश करता है उस अहम को जो पद, प्रतिष्ठा, बल, बुद्धि, रूप, शरीर या धन के कारण पैदा होता है. यही अहम “रात्रि” के प्रतीक हैं, महाशिवरात्रि की आराधना इन्हें दमन के लिए ही है.
कई घंटों के सुखद अनुभूतियों के बाद वापसी में भी हम देख रहे थे, लोगों का रैला का रैला. कोई पैदल, कोई बैलगाड़ी, कोई ट्रेक्टर आदि में संगम की ओर बढ़ रहा था. जिसमें दूधमुहे बच्चे से लेकर, कृशकाय जीवन के आखिरी पड़ाव को देखते वृद्धजन भी शामिल हैं. अब उत्तर था हमारे पास, हम राजिम क्यों जाते है ? सदियों से हमारी आस्थाओं के तार संस्कारों में इस तरह पिरोते आए हैं कि हम अव्यक्त को व्यक्त होते वहाँ देख पाते हैं. यही तो हमारे संस्कारों की धरोहर हैं. नाज़ है हमे इन पर……..