जिसे कोई आरक्षण नहीं घूमते-घूमते घिस गये
कितने चरण पादुकाएं
पर!
मिली ना कोई चाकरी
नौकरी कौन कहे ?
मैं ! गरीब ! बदनसीब !
बी. ए. पास
लेकिन !
सिफारिस के बिना
जो है बराबर घास !
सोचता हूँ वह जो कभी
हो नहीं पाता……..
सोचा था पढ़-लिखकर करूंगा नौकरी
दाने-दाने का मोहताज़ तो नहीं रहूँगा
लेकिन
पद गये लाले दाने के
लोग पुकारने लगे खॅमोचे वाले
लोग कहते हैं “एये खॅमोचेवाले !
गोलगप्पे खिलाओ”
खाने के बाद कहते हैं ” भाग जाओ”
जबकि भागना उन्हैं होता है
सिपाही दिखता है अपना डंडा
नेता और गुंडा अपना हथकंडा
दुख और अफसोस दोनों है मुझे
बदनसीबी ने मारा है मुझे
मैं हूँ जग का एक बेसहारा
इस दुनिया मे अपना नहीं कोई प्यारा
दिन - रात एक करता हूँ सुख के लिए
पर विधाता ने बनाया है दुख के लिए
दुख से तड़पती निकलती आह
सुख से न चलेगी जीवन की राह
दुख की आंधी ऐसी चली
खिल ना सकी जीवन की कली
सही सिद्ध हुआ कोई दीनदयाल नहीं
गरीबों से किसी का हृदय विशाल नहीं!!!!!!
कु@संत
गुड गाँव
GARIB KI AAH !
October 26th, 2009 10 comments »PREM - YUDHA
October 14th, 2009 10 comments »किसी प्रेम युद्ध में
विजय प्रेमिका को मिलती है
मुक्ति प्रेमी को
और राज़ प्राप्त होता है पतियों को
और सत्यवादी प्रेमी को
मिलता है……….
प्यार से भरे कुछ वाक्य
प्रेम-प्रतीक्षा !
विरह में तड़पन !
कुछ पुरानी यादें !
और जब ये युद्ध
सचमुच किसी को
हराने के लिए हीं
किया गया हो
तब तो समझिए
कल्याण है उस “…..” का
जो अपनी भावनाओं को
यूँ हीं व्यर्थ करता रहा
किसी के दिल को
कोरा काग़ज़ समझकर
उसे क्या पता
वो कागज कोरा ना था
वो तो पहले से हीं भरा पड़ा था
जिसका कोई औचित्य हीं ना था
ऐसे प्रेम पुजारी को
और
साचे प्रेमी को
मिलता है
कुच्छ पलों की यादें !
अनिद्रा, बेचैनी, भूख का ना लगना
हर वक़्त की सोचावतें
और अंत मे कोई भयानक रोग
जैसे
“………………………”
” समझकर अन्जान बनना तो कोई उनसे सीखे……..
क्या हुआ अगर हम रातभर उनकी याद में तड़पते हैं!!!!
कु@संत
गुड गाँव
MAA!
September 18th, 2009 11 comments »माँ! टटोलती थी !मेरी सारी जेबों को ….
खंगालती थी
मेरी किताबों को……
अगर, उसने कभी
मुझे उदास देखा तो
की कहीं कोई पत्र
तो नहीं……..
किसी लड़की का
कोई फोटो तो नहीं
जिसकी दगाबाज़ी से
उदास हूँ मैं !
कहीं जहर या
नींद की गोलियाँ तो
नहीं हैं मेरी जेबों मे
जो बेरोज़गारी की मार से
उदास हूँ मैं !
आज ! मैं
फिर उदास हूँ !
पर मेरी जन्मदात्री
मेरी माँ…. !
आज नहीं हैं
मेरी जेबों को
टटोलने के लिए…..
मेरी किताबों को
खंगालने के लिए…….
वो जो गुजरा है आज
एक बेरोज़गार पर
तुमपर गुजरे वहीं तो
डर जाओगे तुम!!!!!!!!!!!!!
कु@संत
गुड गाँव
ABHI TU DUNIYA KA DEKHALA E BACHA!
September 4th, 2009 7 comments »ए बाचा एतना उतान काहे भइल बाड़, आगी मे मुतल त तहरे बुझाई !
अहीरा के लाठी लेखा फाटता जोश तहार ,
काल्हु गोइले बन जईब मूली के भाई !
रोव के आँख आरू लोर तहरा मिली ना,
भींजल बिलारी के हाल होय जाइ !
अचके मे कबहुं तू चुछुनर पकड़ लेब,
सांप लेखा फॅन काढल तोहरे बुझाई !
अभी का अभी त खून तहार गरम बा,
चसकल चमार लेखा जईब ठंधाई!
अभी तू दुनिया का देखल ए बाचा,
धुरी मे जोर बरल तोहरे बुझाई !
कु@संत
गुड गाँव
HINDI RUPANTARAN FOR AADAMI TABAH BA!
August 24th, 2009 8 comments »क्या कहना ये गुनाह है कि आदमी ( तबाह) परेशान है ?कपड़ा पुराना है
खाने का ना ठिकाना है
अकड़ नहीं जा रही पता नहीं किस चीज़ का घमंड है ?
शान है ना मान है
आदमी बेईमान है
आदमी का आदमी से छूटा खानपान है
झूठ का हीं बोल बाला (एलान) है
सच का कहीं पहचान हीं नहीं है
चोरी छीनाझपटि और ज़बरदस्ती मे हीं खानदान लगा हुआ है
कहीं जान पहचान नहीं है
सब कोई आजकल घमंड मे चूर है
किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है
आवाज़ नहीं निकल रही है मुह से
तड़प- रहे है लोग भूख से और बेकारी से
इज़्ज़त का कोई मुल्य हीं नहीं समझ रहा आज
उनके जीवन मे स्वार्थता क़ी ही प्रधानता है !
फ्रेंड्स आपलोगों के कहने से मैने हिन्दी मे रूपांतरण कर दिया है बट तुक नहीं मिला पाया हूँ समय का अभाव है लेकिन जितने भी मेरे भोजपुरी
वाले फ्रेंड हैं उनको भोजपुरी वाली कविता रियली तुक बंदी क़ी लगेगी!
AADMI TABAH BAA!
August 22nd, 2009 7 comments »का~ कहल ई गुनाह बा कि आदमी तबाह बा ! लुगरि पुरान बा
ना खाए के ठेकान बा
ठेस नइखे छूटत जाने केथी के गुमान बा !
शान बा नू मान बा
आदमी बेईमान बा
आदमी के आदमी से छूटल खान पान बा !
झूठ के एलान बा
ना सच के पहचान बा
चोरी सीनाजोरी मे बाझल खानदान बा !
जान बा नू पहचान बा
सबे केहू उतान बा
आपन - आपन खंजडी बा आपन-आपन तान बा !
घुटत जुबान बा
छ छ नत पराण बा
इज़्ज़त के मोल नइखे स्वार्थ परधान बा !
का~ कहल ई गुनाह बा कि आदमी तबाह बा !
कु@संत
गुड गाँव
BIRTHDAY!
August 15th, 2009 12 comments »HAPPY INDEPENDENCE DAY TO ALL OF MY ILANDER FRIENDS.
AND TODAY IS ALSO MY BIRTHDAY.
MANAV !!
August 7th, 2009 7 comments »मानव ! भूल तू जा मानव को तभी याद आएगा मानव
निभा चुके तुम खूब शत्रुता
उलट-पुलटकर मानवता को
अभी दूर है तेरी मंजिल
इधर नहीं रे ! उधर को !
दुख की उड़ी उड़ी चिंगारी
तुमने कहा - “मूर्ख का सार” !
दुनिया क्या है ? - एक झमेला
एक झमेला का व्यापार !
एक अकेला बनकर जग में
माने पूर्ण स्वयं को !
देखीं हीं आँखें बनीं पहचान
ग्यान-अग्यान निरालेपन को !!
रहना तूने सीख ना पाया
हातभागे इस जग में !
जलती हुई चिता को देखी
पर रहे ना तू अपने में !
संयम, सरल, स्निग्ध शोर्य का
मान बुद्धि भंडार !
डर, कठोरता, कायर, कलही
निष्ठुर, क्रूर, दगादार !
मन भाए हर उगे सितारे
जल बुझते क्षण-क्षण को !
मानव ! भूल तू जा मानव को !
मानव ! भूल तू जा मानव को !
- राज किशोर सिंह (मेरे पिताजी)
बिहार
ये मेरे पापाजी की लिखी कविता है
MAIN DOSHI NAHIN HUN !!
July 25th, 2009 7 comments »‘ मिलन बाला’ के बीच
मैं बैठा हूँ !
अपनों को खोकर
उसके सतरंगी झीने आँचल मे
झांक-झांक कर देखता हूँ :
नवयौवना मुस्कुरा उठती है
उसकी मुस्कानों मे अपनी
मुस्कानों को मिलाने की कोशिश करता हूँ
एक उन्माद की लहर उठती है
और मैं खो जाता हूँ !
चुंबनातुर; आलिंगन व्याकुल
मेरे होठ उसके पराग से सने लबों की ओर
और कर उसकी गदराई कंचन मई शरीर की ओर
बढ़ते हैं
तबतक वह धरा चूम लेती है
सुरज़ की किरणे मुझे डंस देती है
मैं उसकी मज़ार पर बैठा रहता हूँ
प्रतीक्षा मे ! इंतेज़ार में !
प्रभाती गान के बाद वह फिर आती है
मैं प्रतीक्षा करता हूँ कि
अब उसे छूने कि कोशिश नहीं करूंगा !
मैं उसे देख-देखकर मुस्कुराता रहता हूँ
सुरज़ कि किरणे उसे चुंबन करती हैं
उसके कपोल गुलाबी हो उठते हैं
और
मैं गुस्से में हो जाता हूँ !
तभी वह किरणों के साथ
थिरकने लगती है
मैं हर्षविभोर हो उठता हूँ कि
वह ‘मिलन’ अदृश्य हो जाती है
मैं गिरकर छटपटाने लगता हूँ
और सुरज़ कि किरणे मुझे डंस देती है
मैं चिल्ला उठता हूँ
” मैं दोषी नहीं हूँ |”
‘ तुम हीं दोषी हो…………….
तुम्हीं ने उसे कहीं छिपा रखा है |’
तभी एक कौवा कांव कांव करता …
मेरे उपर से गुजर जाता है !!!!
कु@संत
गुड गाँव
NADI ME CHANDANI NAHANE LAGI !!
July 1st, 2009 13 comments »नदी की नीलिमा
चाँद को चूम-चूमकर अघा गयी
मेरा मात्र एक कंकड़
चाँद के हज़ारों टुकड़े कर गया
या, नदी का दिल तोड़ गया
हज़ारों हज़ार टुकड़ों में
स्तब्ध रात को
एक छपाक मात्र
हलचल मचा हिलोर दी
लहर कछार से सिर धुन-धुनकर
लौट गयी
बुलबुले बनकर विलीन हो गये
नदी के प्रवाह मे
नीलिमा शांत हो गयी
नदी में चाँदनी नहाने लगी !!
Dear friends,
ek lambe arse baad vapash lauta hun achanak mujhey home town jana pada aur kuchh likh nahin paya!! sorry to all my good friends! but ab vapash laut aaya hun ek poem ke sath!!
Santosh Neel
Gurgaon