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KUTTE KI DOOM

September 21st, 2007

आज यहाँ मेरी स्थिति कुत्ते की दूम जैसी है
लंबी, टेढ़ी, रोएँ दार
दूम सीधी कर चलने पर
पागल क़रार दिया जाता हूँ
दूम टेढ़ी कर चलने पर
अभिमानी………..!
कुत्ते भी कुत्ते की दूम देखकर हीं
रंग बदलते हैं !
खेलते हैं……….कूदते हैं आपस में……….
लड़ते और झगड़ते हैं !
एक रोटी का टुकड़ा देखकर
दाँत दिखा-दिखाकर
गुररात्ता हूँ……दूम टेढ़ी व सीधीकर…….
जानता हूँ……… इससे ना मेरा पेट भरेगा
ना मेरे प्रतिद्वंद्वी का हीं
इससे क्या……….
यह तो मेरी आदत है !
देखनेवाले ताली पीट-पीटकर हँसते हैं
मैं एक तमाशा बन गया हूँ
इस चौराहे पर………….
मैं आकड़ कर दूम कड़ी कर लेता हूँ
मेरा प्रतिद्वंद्वी दूम अपनी टांगों के बीच
छिपा लेता है
मैं जानता हूँ…………. यह हार का सिग्नल है
परंतु मैं उसे दबोच लेता हूँ
और वह भाग जाता है !
रोटी का टुकड़ा…………सामने पड़ा है
मैं उसे सूंघ रहा हूँ
तभी मोटी-मोटी दूम वाला झ बरा आ जाता है
गुररात्ता है……….मैं अपनी खिशैन निपोर देता हूँ
दूम को अकड़ा ना ठीक नहीं समझता
‘ बड़ा ख़ूँख़ार है!’
उसे अपने पिछले पैरों के बीच
छिपा लेता हूँ
लोग मुझे गाली देने लगते हैं
‘ बड़ा अकड़ता था बेटा
अब कहाँ गयी तुम्हारी शेख़ी ‘
मैं लौट चलता हूँ
जैसे मुझे रोटी से दरकार नहीं
ललचाई नज़र घुमाकर देखता हूँ
मेरा प्रतिद्वंद्वी अब भी गुररा रहा है
और रोटी खाए जा रहा है
पूछता तक नहीं………..
उसे तरस कहाँ ?
जैसे दया नाम की चीज़ हीं नहीं
मेरी दूम फिर टेढ़ी हो जाती है !
……………….कु. संतोष…………..

c@sant

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