dear friends, aaj achanak hi meri vo kavitain haath me aa gayin
jo 2007 me delhi press ki patrikaon me prakashit ho chuki hain
unhi me se ek kavita aaj post kar rahi hun…
अगर
मंज़िल का रास्ता मिल जाता
गर दीपक कोई जलाते तुम.
ये खाली लम्हे भर जाते
गर खुद को ज़रा छलकाते तुम.
न यूँ टूटती ये दिल की दीवारें
लफ्ज़ होंठों से गिर कर
यूँ न काग़ज़ पर आते
अगर खामोश जुबां सुन पाते तुम..
कश्मकश मे फॅसी ये उम्मीदें
तड़प कर यूँ न हमे तड़पातीं ,
मेरे इस इंतज़ार का
गर कोई सिला दे पाते तुम..
जो मिले ही न थे कभी
उनके खो जाने का सदमा क्यों!!!!!
उलझी हुई इन सीराओं को
आके कभी सुलझाते तुम.
-2s