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ho gaye hum fir gulaam

भाषा से तहज़ीब से,शर्म का आँचल फेक कर
हो गये हम फिर गुलाम
फिर भी हे एह देश महान.

जनता को लूट कर,
सरकार अपनी जेबें भरकर
धरम पर एक दूजे को लड़ा कर
नेताओं का हे बस यही काम
फिर भी हे एह देश महान.

हर शख्स की ज़ुबान पर ताले हे,
जहाँ देखो वहाँ घोटाले हे
कानून को वो पाले हे
जनता की हालत से हे वो अनजान
फिर भी हे एह देश महान.

एह समझने की हे बात,
लाना होगा फिर गांधीवाद
भगत, बोस और आज़ाद
जो हुए थे हंस कर कुर्बान
तब हुआ था एह देश महान.

आओ हम भी बन जाएँ इन जेसे,
फिर ना होंगे नेता एसे
इन मच्छरों को मार भगाओ
शर्मोहाया का आँचल लाओ
भारतीय तहजीब को रखो बना
अपनी बोली अपनी जुबान
फिर होगा एह देश महान.

(सीमा)

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Hansi

तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे
जिसे जानते हे लोग एक दह्सत के नाम से,
ना जाने वो शख्स अब किस ज़मीन का हे
तुम हंस दिए एह्कौं सा मौका हंसी का हे.

बोझ किताबों का ढो तो लेते वो नन्हे कंधे,
दर्द तो हांथो मे पड़े चालों का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.

हर रोज लूट रही अब इंसानियत की आबरू,
एह काम किसी इंसान का नही आदमी का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.

दोस्ती वफ़ा के नाम पर जो नासूर बन गये,
मरहम जो करीब हे वो किसी बेवफा का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.

दिन रात बिक रहीं अब मासूम ज़िंदगियाँ,
मसला तो भूख से बेहाल ज़िंदगी का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.

सीमा मे बंध गये गम इस बात का नही,
गम दो दिलों मे बढ़ते फ़ासलों का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.

(एक और आज़ादी का साल आप सभी को मुबारक हो)
( सीमा)

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chaman

नई ज़मीन नया आसमान बनाना हे,
उजड़े चमन मे रौनक ए बहार लाना हे.

फूलो की बात करते थकती ना थी ज़ुबान,
काँटों के रास्तों पर अब मेरा आना जाना ह.

यूँ तो सारे आसमान मे सुराख हे,
तुम कहो तो कहाँ कयसे पयबंद लगाना हे.

समंदर की लहरों पर फिसलने वाली,
उस बहती हुई रेत पर एक घर बनाना हे.

हो गया लहू अब जिसका पानी पानी,
उस बेजान बूत को अब इंसान बनाना हे.

उजड़ गई कई बस्तियाँ नफरत की आँधियों मे,
इन आँधियों मे प्यार का एक शहर बसाना हे.

डर जाते थे जो पायल की छुन छुन से,ए ‘सीमा’
‘आहन और संग’ से अब उनका याराना हे.

नई ज़मीन नया आसमान बनाना हे,
उजड़े चमन मे रौनक एबहार लाना हे.

[ सीमा ]

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aakhir kiyon

आखिर क्यों ?सच बोलने वालों को सजा मिलती हे ?
वरुण गांधी ने किसी जाति विशेष के लिए तो कुछ
नही कहा उसने जो कहा आतंकवादियों के लिए कहा
‘की जो हमारे देश के बेगुनाह लोगों को मारेगें उनके हाँथ
एह वरुण गांधी कटेगा’ सच भी हे हम कब तक अपनी जेलों
मे इन दरिंदो को पालते रहेंगे.कसाब,अबू.जेसे ना जाने कितने
देश द्रोहियों को पालकर एह नेता इस देश की बेगुनाह जनता की
जान की बली देते रहेंगे,हम सबूत देते रहेंगे और हमारे पड़ोसी
उन सबूतों को बड़े प्यार से फाड़कर फेकते रहेंगे,
सबूत देने की जरूरत भी क्या हे जो भी आतंकवादी पकड़ा जाए
उसे तत्काल सजा ए मौत दे दी जाए.मौत भी आयसी की अगला गुनाह
करने से पहले अगला दस बार सोचे. पाकिस्तान का
कोई भी नेता भारत के खिलाफ कुछ भी कह सकता हे,’मगर’वाह
रे इस देश का प्रजातन्त्र. अगर कोई आतंक के खिलाफ भी बोले तो
उसको जेल.आज जो इस देश की दुर्गति हुई हे वो इन कुर्सी के लालची
नेताओं की वजह से हुई हे.मे समझती हूँ की वरुण जयसे युवा नेता
इस देश मे और होने चाहिए.आज अगर संजय गांधी ज़िंदा होते
तो शायद इस देश मे इतनी दह्सत भी नही होती,
अगर हम अपन देश से प्यार हे तो वरुण जयसे युवा नेताओं
का साथ देना होगा तभी इस देश की हालत सुधरेगी वरना नही.
जय हिन्द……………………….
[ सीमा ]

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zudaai

अपने ही घर मे आस्तीन के सांप पलते रहे,क्या
बताएँ हम किस किस तरह से चलते रहे.

दुश्मनों की खास शक्ल होती नही
वो दोस्त बनकर ही दगा देते रहे.

मुहोब्बत की राह मे चलते हुए,
नफरतों पर हम फ़ना होते रहे.

क्या करें जो रूठ गई हमसे बहार,
हम तो गुल ए तर पर फिदा होते रहे.

काँटों की क्या बात करें ए जनाब ,
हम तो कलियों से घायल होते रहे.

‘सीमा’ मे बांधकर हर मुहोब्बत,हर नज़र,
दिल से दिल अक्सर ज़ुदा होते रहे.
[ सीमा ]

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raushni

अंधेरों से निकल कर,हम आए थे रौशनी की चाह मे ,
मग़र एह क्या ?
रौशनी के नाम पर मिली हमें
धधकति हुई आतंक की ज्वाला,
जो की हर दिल मे जल रही थी.
हाँ हमे रौशनी के नाम पर मिले,
कई जलते हुए मकान जो की अंदर से बंद थे,
और उनके अंदर बंद कई ज़िंदगियाँ,
सिसक सिसक कर दम तोड़ रहीं थी.
हाँ हमे रौशनी के नाम पर मिले,
ज़िंदा लोगों के जले हुए ज़िस्म,
जो की इसी रौशनी ने खाक कर दिए थे.
हाँ, अब मेरी ज़िंदगी मे रौशनी ही रौशनी थी,
और उस रौशनी मे खाक होती कई ज़िंदगियाँ थी.
अब मे सोचने को मजबूर थी,
क्योंकि अब मे रौशनी और अंधेरों मे,
फर्क समझने की कोशिश जो कर र्ही थी.
[सीमा]

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talaash

एक ज़िंदगी को एक ज़िंदगी की तलाश हे,
दरिया मे फॅसी किसती को साहिल की तलाश हे,

इंतेज़ार मे किसी के धुधली हुई नज़र,
उस धुंधली नज़र को किसी अपने की तलाश हे.

दरवाजे की ओट मे छिपी एक दुल्हन सी,
उन रुकी हुई साँसों को किसी आहत की तलाश हे.

खुद को मिटाकर सँवारी ज़िंदगी जिनकी,
आज उन्हीं के पत्थर को मेरी तलाश हे.

अपनों पर था यकीन,था गेरों पर यकीन,
आज उस यकीन को किसी धोखे की तलाश हे.

ना ज़िकर हो बेवफ़ाई का तो अब केसी मुहोब्बत,
बेवफाओं की भीड़ मे अब वफ़ा की तलाश हे.

हुमसफ़र बनने वाले हुमसफ़र नहीं होते,
साथ चले जो उमर भर उस दुश्मन की तलाश हे.

खुदा खेर करे उन ज़ुलम करने वालों पर,
बेबसी के जख्म को अब मरहम की तलाश हे

[सीमा]

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siskiyan

कोई आंधी कोई तूफान ना मिला होता,
तो मेरी आनहों को भी सहारा मिल गया होता.

दर्द की राहों मे दर्द ही मिला करता हे,
खुशियों की महफिल मे कोई गम्खुअर नही होता.

लगा तो लेते हें लोग गेरों को भी अपने सीने से,
बेगानों की बस्ती मे उनका घरबार नहीं होता.

जला दिए जाते हें लोग नफरत आग मे,
उन बुझते हुए चरागोन से किसी को सरोकार नही होता.

सिसकियों मे गुजर जाती हे बहोटों की ज़िंदगी,
उन सिसकी भरे पलों का कोई हिसाब नही होता.

[सीमा]

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khuaab

खुश रहने की दुआ तो करते रहेंगे,
हम रहें या ना रहें एह और बात हे.

मुफ़लिसी मे गुजरती हे जिनकी उम्र सारी,
रईसों मे उनका सुमार हो एह और बात हे.

हे हौसला आसमां को छू लेने का,
कतर दे कोई पर एह और बात हे.

माना की कटती नही तन्हां ज़िंदगी,
तन्हां कोई छोड़ दे एह और बात हे

कपड़ों मे लगे फकत पयबंद देखकर,
अपने भी साथ छोड़ दे एह और बात हे.

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dahsat

{Dahsat}

                  

                                  Un pyari baton me,

                                  Dil ke zazbaton me,

                                  Haseen lamhaton me,

Nafrat ka khanjar dhans raha he.

 

                                  Ek tukda zameen ke liye ,

                                  Thode se asmaan ke liye,

Apno ka lahoo bah raha he.

 

                               Kahin par mandir ka diya,

                               Kahin par maszid ki namaaz,

Aur khuda ro raha he.

 

                                 Hawa ka rukh badla,

                                 Paani ka bahawo badla,

                                 Do aankho me samandar tayr raha he.

 

                                Ek vakat ki roti ke liye,

                                Tan par ek lagonti ke liye,

Vakat se insaan lad raha he.

 

                                 Ab nahi koi rahnuma ,

                                 Ab nahi koi farista,

Har ghar me darinda pal raha he .

 

                               Kahin par he bam gira ,

                               Aur kahin par chali goliyan,

Insaan me insaan mar raha he.

 

                                                                                    {seema solanki}

                                                                                   

 

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