तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे
जिसे जानते हे लोग एक दह्सत के नाम से,
ना जाने वो शख्स अब किस ज़मीन का हे
तुम हंस दिए एह्कौं सा मौका हंसी का हे.
बोझ किताबों का ढो तो लेते वो नन्हे कंधे,
दर्द तो हांथो मे पड़े चालों का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.
हर रोज लूट रही अब इंसानियत की आबरू,
एह काम किसी इंसान का नही आदमी का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.
दोस्ती वफ़ा के नाम पर जो नासूर बन गये,
मरहम जो करीब हे वो किसी बेवफा का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.
दिन रात बिक रहीं अब मासूम ज़िंदगियाँ,
मसला तो भूख से बेहाल ज़िंदगी का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.
सीमा मे बंध गये गम इस बात का नही,
गम दो दिलों मे बढ़ते फ़ासलों का हे
तुम हंस दिए एह कौन सा मौका हंसी का हे.
(एक और आज़ादी का साल आप सभी को मुबारक हो)
( सीमा)
Utho Seema aur badal do yeh haalat. Tum bahut achha likhti ho
Jeeti Raho
bahut sunder…..very beautiful lines….thanx 2 u..
concept is good…magar kuchh adhoori si hai….baat poori nikal kar nahi aayi!!
well written
bahut sahi baat farmayi aapne…….बोझ कितबों का ढो तो लेते वो नन्हे कंधे,
दर्द तो हानथो मे पड़े चालों का हे………………. keep up