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“मुझे ज़िंदगी मेरी”


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मुझे ज़िंदगी मेरी, महर नहीं होती,
कई रातों से जैसे, सहर नहीं होती…

सूनी राहों पे यूँ , चले जा रहे हैं कि,
अपने साये कि भी, ख़बर नहीं होती….

जिसे भूलना था, उसी में ही खो गये,
मेरी फ़ितरतों जैसी, बसर नहीं होती..

ये कैसी शराब है जो, पिए जा रहे हैं,
ज़हर भी मिलाया तो, ज़हर नहीं होती… 

खुदाया नमाज़ी को, मिला ये सिला है,
दुआ कोई भी दे तो, असर नहीं होती…

इक ऐसी जगह ‘शlन’, लाई है बेखुदी,
किसी कि जहाँ हम पे, नज़र नहीं होती…



                                                                  -  ”शlन”

Posted in My Writing.



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