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स्वपन झरे बूँद बूँद

स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम


हम आसमां से बरसते 
बूंदों को देखते रहे
जिनको जल समझा बूँद बूँद अंगार निकले
झुलस गयेजिसमे  भीग जाए मन
वो बूँद अब बरसी हैं रुनझुन रुनझुन
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

अभी पलकें अधखुली ही हैं
और दीं गुजर गये
सहर देखी नाही पूनम की सांझ भी
और  गई अमावस की रात घिर घिर
ज़िंदगी सितार बन सकी ना
मेरे देह श्रींसरिंगार बिखर गये क्षीण क्षीण
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

हम चलना अभी सीखे
और ज़िंदगी दौड़ के निकल गई
जब दौड़ में आए
सांस फूल गये ज़िंदगी ठहर गई
ईक्षाएं अतृप्त रहीं कुछ तो मृत रही
क्या खोया क्या पाया हिसाब नहीं
मंझधार से निकल आए
और डूब गये किनारे पर अरमाणो के तृण तृण
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

मृग मरीचिका अपनी बना ली
अपने अहसासों की गर्मी से
ज़िंदगी की हरियाली मिटा ली
जल भरे जीवन को अकलग्रस्त बना दिया
अपने ही मन के मत्स्य को बिन पानी तरसा दिया
कुच्छ बिखरी यादें हैं
कुच्छ छिपा रक्खे हैं मुट्ठी मे चुन चुन
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

पते पते गिर गये,
ठूंठ को दीमक लग गये
मेरे गीत करून नाद बन गयेअश्रु
पलकों की कोरों मे ही जाम गए

साथी सभी छूट गये
कुच्छ पिचछाद गये कुच्छ आगे निकल गये
मा-पित्रभाई बंधु भी साथ नहीं
जीवन संगिनी साथ हो आस नहीं
दिए जलाए जीतने खुशियों के
तेल से भरे रहे  
gard कुच्छ समेटे रहे
और बाती जल गयी रह गया धुआँ धुआँ
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

रीत बदलते सुनते रहे
रूट बदलते देखते रहे
उमर मे उतार चढ़ाव और उतार आते रहे
हम खड़े रहे 
दुनिया की बहार देखते रहे
और ज़िंदगी निकल गई 
सांसो में खुमार लिए हम
रह गये कुछ लम्हे ज़िंदगी से उधर लिए
कुछ तरंगे कुलाचें भारती रही सारी उमर
हमने कहा नहीं किसी से 
वो मीट गयी घुट घुट
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम


हर तरफ बहार देखी,
सब में चाहत बेसुमार देखी
वो आँख तलासाते रहे
जो देख  aur पुकार उठे
कितने आँखों मे झाँका हमने
एक ने पुकारा भी हमें
वक़्त की रह मे हम पीस गये
वो हाथहाथ मे आया भी नहीं
और हम रह गये च्हुते च्हुते
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

हर बाग मे मेरा नाम रहा
हर फूल को हुमसे प्यार रहा
उधर मिली नज़र और
इधर झुकी नज़र
सर पर आसमां तान के सीना सवार रहा
एक दीं मगर ऐसी चली ब्यार
खुशियाँ सारी समेत कार 
ले उड़ी हवा
जमीन से जड़ें कुरेद कार
ज़िंदगी नाम नाही हारने का
हम लड़ पड़े नियति से
मिला कुच्छ नाही 
नियति से लड़ने में
ज़िंदगी निकल गई
रह गए हम पीते पीते और लूटे लूटे
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलों को चूम चूम


उमंगे थी इतनी की
एक हाथ उठे तो दुनिया सवांर दूँ
होत अगर खुले तो खुशियों को पुकार दूँ
प्यार इतना के सबकी मन्नत मे चढ़ा दूँ
और साँसों मे खुमारी इतने की
सबको नशे मे झूमा दूँ
हो सका ना कुच्छ ऐसा
अकेला रह गया मैं कैसा
बाढ़ आई कहाँ की
उठी लहर कहाँ की
ढह गए किले पहर
नयन नीर भरे
ढाँक मुख कफन, se, 
औंधे पड़े रहे डरे डरे
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

ढोलक कहीं बज उठे मृदंग कहीं
सब कह उठे  रही दुल्हन कोई
माँग भर सवांर कार 
डोली में बैठ स्ज़ कार
लोग-बाग बहक उठे
हम भी तरंगित हो उठे
प्राकृत ठुमक उठी
तहाप पर वक़्त के
कुच्छ हर्षित कुच्छ सहम उठीं
खुशियाँ मातम बन गई
ये मृदंग था तांडव का
हमारी हार का
ज़िंदगी की जीत का
चाँद से शोले बरस गये
हम जहाँ थे वोहिं रह गये
अमर्त्या बोल मेरे दफ़न गये सहम सहम
स्वपन झरे बूँद बूँद
दर्द बहे कपोलो को चूम चूम

Posted in Poetry.



One Response

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  1. Srivastava Kumar says

    Hum chalna abhi seekhe aur zindgi daud ke aage nikal gayi…………………bahut sundar kavita hai shashank bhai………….