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अच्छा हुआ

आज जी भर के रो लिए अच्छा हुआ
म्वाद-ए-दर्द रिस-रिस के निकला अच्छा हुआ

आज रो लिए जी भर के अच्छा हुआ
मवाद--दर्द रिस-रिस के निकला अच्छा हुआ

हम बुत्तत बनाते रहे शुकून के
हर बुत्तत ने लूटा शुकून अछा हुआ

दुनिया ने इतना दिया गम की अब
कोई गम सताता नहीं अच्छा हुआ

आशियान औरों का रोशान् किया
करते थे जला कार घर अपना

भारी दुनिया मे अब अपना ही
कोई ठिकाना नाही रहा अच्छा हुआ

मजहब सिखाता है मोहब्बत करना
झूठे निकले कलाम अच्छा हुआ

दोस्त रह ना रक़ीब कोई शशांक
आए तन्हा रह गए तन्हा अच्छा हुआ




Posted in Gazalen.



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