Ab baaten aksar hoti hain

बातें……..ये बातें……अब बातें अक्सर होती हैं,

कभी शाम की रुनझुन से,
कभी नींद मे खोई आँखों से,
कभी नन्ही चिड़िया की धड़कन से,
तो कभी अपने ही जज्बातों से,

ये बात और है की बाते करने को…..
अब कोई शख्स नही मिलता,
अब आइनो मे मुझको अपना अक्स नही मिलता,

पर बातें……ये बातें………
अब बातें अक्सर होती हैं,


कभी गुम होती आवाज़ों से,
कभी बेरंग अधूरे ख्वाबों से,
कभी अपनी ही खामोशी से,
कभी आँखों में टूटे मोती से,

ये बात और है की बातों में अब,
वो पहले सा रब्त नही मिलता,

पर बातें………. ये बातें………
अब बातें अक्सर होती हैं,

कभी दिल मे बढ़ती हलचल से,
कभी ख़यालो की उलझन से,
कभी सिसकती हवा से,
तो कभी अपने रूठे खुदा से,

ये बात और है…..
कि लब चुप रहते हैं,
और कहने को कोई शब्द नही मिलता,

पर बातें……ये बातें…..
अब बातें अक्सर होती हैं…….
अब बातें अक्सर होती हैं……………….

———– स्वाति


Barso-ae-Baadal

बरसो-ए-बादल टूटकर कि भीग जाएँ हम,
पलकों को भिगाने से पहले….

सिसकती धड़कनें भी झूम लें,
जी लें, हर बूँद को कुछ देर यूँही,
दिल की हलचल के ठहर जाने से पहले…….

ना जाने कब से उलझे हैं हम,
इन हथेलियों की सिलवटों में,
कुछ यूँ बरसो,
कि धुल जाए हर हक़ीक़त
ख्वाबों को फिर से अधूरा छोड़ जाने से पहले……

क्या पता कैसा हो रास्ता,
अगले मोड़ पर,
कुछ यूँ बरसो,
कि भिगा दो आज मेरा मन,
मौसम के ठहर जाने से पहले……..

बरसो-ए-बादल टूटकर,
कि भीग जाएँ हम पलकों को भिगाने से पहले……..

—- * स्वाति *


Kise maloom hai……..

डूबती खामोश रातों का पता किसे मालूम है,
जहाँ जाकर ठहर जाएँ कदम,
वो रास्ता किसे मालूम है,

यू तो सैकड़ो मांझी खेलते है…
समंदर की गोद में,
पर जिस लहर से खेलकर रूठ जाए ज़िंदगी,
उस लहर के लौटते निशाँ,
किसे मालूम हैं,

यू तो तड़पती है ज़मी इस तपिश के
ज़ख़्म भी कुछ खूब हैं,
पर बरसती बूंदों से मिलकर
उठे जो आह….
उसकी खुशबू मे घुली…
चाहत का पता किसे मालूम है…..

डूबती खामोश रातों का
पता किसे मालूम है……..

—– * स्वाति *


Zara si dhoop pi li hai

सुना है, सूरज की करवट से तूफ़ाँ रुख बदलते हैं,
हमने दिल की हलचल बदलने को,
ज़रा सी धूप पी ली है,

हवाएं भी गुज़रती हैं,
इन पिघली सी आँखों को छूकर,
कुसूर इनका नही,
इस दौर के दिलों की मासूमियत
मे ही कुछ तबदीली है,

ज़रा सी धूप पी ली है,

दिल है की बहा दूँ ये दिल ही
किसी दरिया में,
पर क्या करूँ,
इस दिल में ज़ख़्मों की गांठ
अभी ज़रा गीली है,

ज़रा सी धूप पी ली है,

ना जाने वक़्त क्यों दोहराता है,
बिखरे पलों की खुशबुए…………….

खैर हमने भी अपने जज़्बातों की
सज़ाएं खुद ही जी ली है,

ज़रा सी धूप पी ली है,
ज़रा सी धूप पी ली है…………..

* स्वाति *


Chalak na jaye Zindgi

टूटते तारों के असर की वो अदाएँ याद हैं,

बाहों मे सिमटने वाली वो हवाएं याद हैं,

ख्वाबों के फूलों पर थिरकती थी ख्वाहिशों की बूंदे,
आज प्यासे हैं लब,
फिर भी उनकी तरावट याद है,

ना जाने कितनी मासूम कोशिशें की
हमने पानी पर नाम लिखने की,
पर हर बार बहते अक्षरों की
वो मिटती लकीरे याद हैं,

दिलों के प्याले तंग हैं,
और गम हैं सिरों तक भरे हुए,

कहीं छलक ना जाए ज़िंदगी,
अब बस यही दुआएँ याद हैं,

टूटते तारों के असर की वो अदाएँ याद हैं………….

——* स्वाति *


chupke-chupke….chip-chip kar……..

जब मौसम का मिज़ाज़ बदला, और उलझा हसरतों का कारवाँ,

तब मीठी मुस्कान के पीछे हमने,
दर्द डुबोना सीख लिया,

चुपके-चुपके…..छिप-छिपकर
हमने रोना सीख लिया,

जब डर था कहीं भीड़ मे साँसे,
साँसे बन जाएँ ना सिसकियाँ,
तो फिर काग़ज़ के पन्नो पर ही,
हमने जीना सीख लिया,

चुपके-चुपके….छिप-छिपकर
हमने रोना सीख लिया,

जब रोज़ रात को ख्वाबों के,
आने पर कुछ अरमान जगें,
फिर पल मे भर आएँ आसूँ,
और ख्वाब भी केवल ख्वाब लगें,

तो फिर जागती रातो मे,
हमने करवट लेना सीख लिया,

चुपके-चुपके…..छिप-छिपकर
हमने रोना सीख लिया,

जब दिल मे बढ़ी हलचल,
और आँखों मे जज़्बात बढ़े,
और जब नाज़ुक सी पलको पर,
अरमानो के पंख जले,

तो फिर ख्वाहिशों के आँचल को,
हमने भिगोना सीख लिया,

चुपके-चुपके……छिप-छिपकर,
हमने रोना सीख लिया…………………………….

———— * स्वाति *———————


Meri gali ka chaand…….

बड़ी जुस्तजू से आँखों मे दरिया बाँध रखा है,

इन्हे अब इल्म है कि ख्वाबों का शहर छूट जाएगा,

मेरी गली का चाँद आज ढल जाएगा,

ये बेबाक अल्हड़ हवाए भी रूठ कर बैठी हैं,
कोई समझाए इन्हे कि मेरी आंखो मे ये अश्क़ नहीं,
बस यादो के मोती हैं,
ले जाओ बिखेर दो इन्हे किसी सहरा में,
शायद मेरा गम ही किसी प्यासी ज़मी के काम आएगा,

मेरी गली का चाँद आज ढल जाएगा,

गर कुछ था हमारे पास तो बस थी मुस्कान चेहरे पर,
अब और मुस्कुराने कि गुज़ारिश ना करो हमसे,
इस मुस्कान कि तपिश से ये दिल पिघल जाएगा,

मेरी गली का चाँद आज ढल जाएगा,

ठीक से संभाल भी ना सके खुद को ठोकरे खाकर,
हमे क्या था पता कि,
आज तूफ़ाँ एक भवर भी साथ लाएगा,

मेरी गली का चाँद आज ढल जाएगा,

दो पल ज़रा सो लेने दो इस रेत कि चादर में,
कल फिर यहाँ कोई अपनी ही आरज़ू मे तड़प कर आसूँ बहायेगा,

मेरी गली का चाँद आज ढल जाएगा………

—- * स्वाति *


” Jiya jale “

आसमां की पलकों पर ठहर कुछ बूंदे गिरीं,

इस ज़मीं के आँचल तले,
इतना खूबसूरत दर्द है,
तो कैसे ना…….

ये जिया जले,

खामोश फूलों को हँसाने की कोशिश में,
देखो ना कोई गीत गुनगुनाते हैं
भँवरे अपने ‘रूँधे गले’,
तो कैसे ना……..

ये जिया जले,

मासूम मोहब्बत की ‘बारिश’ में,
इक बार भीगकर तो देखिए,
जब समझ आ जाए पीहू की तड़प,
तो कैसे ना……..

ये जिया जले,

जब एक ज़रा सी बात पर बढ़ जाएँ,
दिलो के फ़ासले,
ठहर जाए लबों पर बारिशें,
और उनसे बाते करने को दिल मे तड़प पल - पल बढ़े,
तो कैसे ना………

ये जिया जले,
तो कैसे ना ये जिया जले……………..

- * स्वाति *


Kinare

इस नदी मे आज किनारे उतर आए हैं,

डूब रही थी लहरें इसके दिल मे,
और उनको थामने कुछ सहारे उतर आए हैं,

इस नदी मे आज किनारे उतर आए हैं,

झूम रहे थे हम जुगनुओं के साथ,
और आसमां ने सोचा कि उसके सितारे उतर आए हैं,

इस नदी मे आज किनारे उतर आए हैं,

इन आँखों को तुम कोरा आईना ना समझो,
इनमे कुदरत के तमाम नज़ारे उतर आए हैं,

इस नदी मे आज किनारे उतर आए हैं,

इतने नाजुक दिल तो ‘उसकी’ ज़मी पर भी अब बनते नहीं,
लगता है कि,
किसी फरिश्ते के अशक़ों मे कुछ अल्फाज़ उभर आए हैं,

इस नदी मे आज किनारे उतर आए हैं………..

This poem is dedicated to a very good friend of mine……..a ton of thanx for being my inspiration………thanks a lot.

Swati….


Kaarwan

गुनगुनी धूप मे कुछ ख्याल पिघलते रहे,

कारवाँ बढ़ता गया और साथ छूटते रहे,

उस धूल की कीमत तो बस ये ज़मीं हि जानती है,
मुसाफिर तो बस कदमों के निशान छोड़ते रहे,

कारवाँ बढ़ता गया और साथ छूटते रहे,

जिनके तज़ुर्बे मे थी कुछ पुरानी धड़कने,
हमारी धड़कनों मे वो अपने जज़्बात ढूंढते रहे,

कारवाँ बढ़ता रहा और साथ छूटते रहे,

जिन यादों को संजोकर रखा था दिल में,
आँखों से छलककर वो होंठों पर ठहरते रहे,

कारवाँ बढ़ता गया और साथ छूटते रहे,

देखो ज़रा इस रात मे आज चाँदनी सी एक धुन्ध है,
दिल है कि हवाओ की गोद में सारी रात हम यूँही बैठे रहें,

पर कारवाँ बढ़ता गया और साथ छूटते रहे……………

——— * स्वाति *

( English )

Gunguni dhoop me kuch khyal pighalte rahe,

kaarwaan badhta gaya aur saath chootte rahe,

us dhool ki kimat bas ye zameen hi janti hai,

musafir to bas kadmo k nishan chodte rahe,

kaarwaan badhta gaya aur saath chootte gaye,

jinke tajurbe me thi purani dhadkane,

humari dhadkano me vo apne jazbaat dhundhte rahe,

kaarwaan badhta gaya aur saath chootte rahe,

jin yaado ko sanjo ko rakha tha dil me,

haantho se chalakkar vo hontho par thaharte rahe,

kaarwaan badhta gaya aur saath chootte rahe,

dekho zara is raat me aaj chandni si ek dhundh hai,

dil hai ki hawao ki god me saari raat hum yu hi baite rahe,

kaarwaan badhta gaya aur saath chootte rahe…….

—-* Swati *