गुनगुनी धूप मे कुछ ख्याल पिघलते रहे,कारवाँ बढ़ता गया और साथ छूटते रहे,उस धूल की कीमत तो बस ये ज़मीं हि जानती है,मुसाफिर तो बस कदमों के निशान छोड़ते रहे,कारवाँ बढ़ता गया और साथ छूटते रहे,जिनके तज़ुर्बे मे थी कुछ पुरानी धड़कने,हमारी धड़कनों मे वो अपने जज़्बात ढूंढते रहे,कारवाँ बढ़ता रहा और साथ छूटते रहे,जिन [...]
