लोग कहते हैं उन्हे कोई समझ नहीं पाया,
एक मैं हूँ जो खुद में उलझ बैठी हूँ.
सोचा शुरुआत से शुरू करके देखूँ,
ज़ज्बात का ताना बाना था.
सिरा पकड़ा कि,
सब कुछ उलझ गया.
Broadcasting my thoughts
लोग कहते हैं उन्हे कोई समझ नहीं पाया,
एक मैं हूँ जो खुद में उलझ बैठी हूँ.
सोचा शुरुआत से शुरू करके देखूँ,
ज़ज्बात का ताना बाना था.
सिरा पकड़ा कि,
सब कुछ उलझ गया.
Posted in Poetry.
– April 1, 2009
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ARE NEHA JI AAPKI BAAT SUN KAR TO MAIN BHI ULAJH GAYA ! AAPNE SIR KYON PAKDA ?