विख्यात लेखक सलमान रुश्दी जिन कारणों से भारत नहीं आ सके वे भारत को दुनियाभर में शर्मिदा करने वाले हैं। एक सहिष्णु, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र का भारत का दर्जा बुरी तरह प्रभावित हुआ है और इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है केंद्रीय सत्ता। केंद्र सरकार ने अपनी अकर्मण्यता से अपने मुख पर नए सिरे से कालिख मल ली है। उसने उन परिस्थितियों को दूर करने के लिए तनिक भी कोशिश नहीं की जो सलमान रुश्दी के भारत आगमन में बाधक बन रही थीं। इसके बजाय उसने ऐसा प्रदर्शित करने की अतिरिक्त कोशिश की कि यदि रुश्दी भारत आए तो सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो सकता है। उसने राजस्थान के मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से यह कहने की स्वतंत्रता और सुविधा प्रदान की कि रुश्दी को जयपुर साहित्य सम्मेलन में नहीं आना चाहिए। ऐसे मुख्यमंत्री को तो एक दिन के लिए भी अपने पद पर नहीं रहना चाहिए जो किसी को अपनी मातृभूमि आने से रोकने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दे। रुश्दी का भारत न आ पाना लज्जा की बात तो है ही, केंद्रीय सत्ता के कट्टरपंथ के आगे नतमस्तक होने का नया प्रमाण भी है। खेद की बात यह नहीं है कि रुश्दी जयपुर साहित्य सम्मेलन में शिरकत नहीं कर सके, बल्कि यह है कि अपने देश आने के उनके अधिकार पर कट्टरपंथी ताकतों ने कब्जा कर लिया। यह कब्जा इसलिए हुआ, क्योंकि केंद्र सरकार ने खुशी-खुशी उनके समक्ष समर्पण कर दिया। केंद्र सरकार इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकती कि सलमान रुश्दी अपनी विवादास्पद पुस्तक प्रतिबंधित होने के बाद कई बार भारत आ चुके हैं। यही नहीं वह जयपुर साहित्य सम्मेलन में भी शिरकत कर चुके हैं। सारी दुनिया यह जान रही है कि इस बार वह इस सम्मेलन में सिर्फ इसलिए नहीं आ सके, क्योंकि केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व कर रही कांग्रेस विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोट हासिल करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। इसमें दोराय नहीं कि रुश्दी विवादास्पद लेखक हैं और मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका उन्हें पसंद नहीं करता। इस तबके को रुश्दी को नापसंद करने, उनके लेखन को खारिज करने और यहां तक कि उनकी भारत यात्रा के विरोध में धरना-प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उसे भारतीय मूल के इस लेखक को अपने देश आने से रोकने का भी अधिकार मिल गया है। बेहतर होता कि रुश्दी भारत आने का साहस जुटाते और केंद्र सरकार उनकी सुरक्षा के हरसंभव उपाय करती। कांग्रेस यह कहकर देश को गुमराह नहीं कर सकती कि रुश्दी का भारत न आना उनका अपना निर्णय है। वह इस निर्णय पर इसलिए पहुंचे, क्योंकि केंद्र सरकार ने एक बार भी यह कहने की हिम्मत नहीं जुटाई कि वह उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगी। हो सकता है कि कट्टरपंथियों के मन की मुराद पूरी करने से कांग्रेस को कुछ अतिरिक्त वोट मिल जाएं, लेकिन अब उसे यह कहना बिलकुल भी शोभा नहीं देगा कि वह कट्टरपंथियों से मुकाबले को तैयार है। कांग्रेस ने अपनी बदनामी तो कराई ही है, देश की प्रतिष्ठा पर दाग लगाने का भी काम किया है। रुश्दी के भारत न आने से लेखक बिरादरी नाराज है, लेकिन यह खेदजनक है कि सरकार के रवैये पर नाराजगी जताने वाले कलम के सिपाही मुट्ठी भर भी नहीं हैं।साभार:-दैनिक जागरण
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By Vichitra Gupta
– January 22, 2012
ऐन वक्त पर रुश्दी की भारत यात्रा के रद होने को कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण का परिणाम बता रहे हैं एस शंकर
सलमान रुश्दी की सटैनिक वर्सेस 1988 में प्रकाशित हुई थी। 1989 में उसे लेकर ईरानी राष्ट्रपति अयातुल्ला खुमैनी ने रुश्दी को मार डालने का फतवा दिया। इसके बाद नौ वर्ष तक ब्रिटिश सरकार ने रुश्दी को सुरक्षा में रखा। फिर 1998 में ईरान की नई सरकार ने घोषणा की कि वह उस फतवे का अब समर्थन नहीं करती। धीरे-धीरे रुश्दी सार्वजनिक जीवन में भाग लेने लगे। अब तो लंबे समय से दुनिया के मुस्लिम जनमत ने भी उसे बीती बात मान लिया है। ऐसी स्थिति में नए सिरे से सलमान रुश्दी को जयपुर के अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन में भाग लेने से रोकने की दारुल उलूम की मांग कुछ विचित्र है। रुश्दी ने कोई नया अपराध नहीं किया है। 23 वर्ष पूर्व लिखी उस पुस्तक पर वह पहले ही लगभग दस वर्ष तक कैदी-सा जीवन नाहक बिता चुके हैं। अब जब उस प्रसंग को सभी पक्ष अलग-अलग कारणों से अतीत मान चुके हैं, तब यहां उलेमा द्वारा उसे उभारने का क्या अर्थ? पिछले 12 सालों में रुश्दी कई बार भारत आए-गए हैं। उन्होंने विविध मुद्दों पर लेख भी लिखे तथा उनके बयान भी आते रहे हैं। इनमें इस्लाम संबंधी बयान भी है। मसलन उन्होंने लिखा कि इस्लाम और आतंकवाद को पूरी तरह अलग-अलग करके देखने की जिद निरर्थक है। आखिर कोई चीज तो है जो इस्लामी अनुयायियों को आतंकवाद से जोड़ती है। वह क्या है? आदि। इन बातों पर भी मुस्लिम नेताओं ने कहीं हाय-तौबा नहीं मचाई। फिर अभी कौन-सा फितूर सूझा जो रुश्दी को भारत आने से रोकने की मांग की गई और सरकार के दब्बू रवैये के कारण यह मांग पूरी भी हो गई। संभवत: इसका संबंध उत्तर प्रदेश के चुनावी वातावरण से है। मुस्लिम वोटों के ठेकेदार यह समझते हैं कि अभी उनका बाजार भाव बढ़ा हुआ है। तो क्यों न अपनी शक्ति बढ़ाने की कोई जुगत भिड़ाई जाए! इसमें संदेह नहीं कि सार्वजनिक राजनीति में सांकेतिक जीतों का बड़ा महत्व होता है। रुश्दी को वीजा न देने की मांग करने वाले को इतनी भी समझ नहीं कि भारत में जन्मे और इसी मूल के होने के कारण रुश्दी को वीजा लेने की जरूरत ही नहीं। दिल्ली के एक इमाम साहब लंबे समय तक कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद को वह सलमान समझते रहे जिसने सटैनिक वर्सेस लिखी! ऐसे ही मुस्लिम नेताओं के दबाव पर हमारे कर्णधार मुंह चुरा कर उनकी ताकत और बढ़ाते हैं। रुश्दी के बहाने कुछ मुस्लिम नेता अपनी ताकत बढ़ाने में सफल होते दिख रहे हैं। उन्हें मालूम था कि इस चुनावी समय में उनका विरोध करने वाला कोई नहीं। उलटे सभी उन्हें खुश करने में लगे हैं। तब किसी लेखक को कहीं जाने से रोक देना कौन-सी बड़ी बात है! कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने पहले ही संकेत दे दिया था कि सुरक्षा कारणों से रुश्दी को जयपुर जाने से मना किया जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन मामलों पर कट्टरपंथियों को आसानी से फटकारा जा सकता था, वहां भी उनके सामने झुक कर हमारे नेता देश की मिट्टी पलीद करते हैं। अभी सरलता से कहा जा सकता था कि रुश्दी प्रसंग एक पीढ़ी से भी पुरानी बात हो चुकी। अरब विश्व में भी अब उसकी कोई बात नहीं करता। तब उसे उठाकर पुन: सांप्रदायिक वातावरण को बिगाड़ने का प्रयास नहीं होना चाहिए। किंतु ऐसे सरल मामलों में भी हमारे नेता घुटने टेक देते हैं। यह देश की सामाजिक एकता को चोट पहुंचाता है। इसमें सबसे दुखद भूमिका हमारे बुद्धिजीवियों की है। जो लोग हुसैन की गंदी पेंटिंगों, दीपा मेहता की अश्लील फिल्मों, जिस-तिस की हिंदू-विरोधी टिप्पणियों, लेखों आदि के पक्ष में सदैव तत्परता से बयान जारी करते हैं- वे सब सलमान रुश्दी पर मौन साधे बैठे हैं! वे लेखक, पत्रकार भी जो जयुपर सम्मेलन में सह-आमंत्रित हैं। यह प्रकरण फिर दिखाता है कि मुस्लिम कट्टरता पर बोलने से सभी कतराते हैं। यह सोची-समझी चुप्पी पहली बार नहीं देखी गई। इसके पीछे एक सुनिश्चित पैटर्न है। पहले भी तस्लीमा नसरीन, अय्यान हिरसी अली, सलमान तासीर, सुब्रह्ममण्यम स्वामी आदि की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के लिए किसी सेक्युलर-लिबरल की आवाज सुनाई नहीं पड़ी। 22 वर्ष पहले भी केवल एक मुस्लिम नेता की मांग पर रुश्दी की पुस्तक किसी मुस्लिम देश से भी पहले यहां प्रतिबंधित हो गई। उसके लिए नियम-कायदों को भी ताक पर रख दिया गया। तब भी हमारे बुद्धिजीवी मौन थे। इसलिए हमें अपने बुद्धिजीवियों का दोहरापन पहचान लेना चाहिए। वे इस्लामी कट्टरवादियों के आगे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तुरत भुला देते हैं। रुश्दी, तसलीमा, हुसैन, रामानुजन आदि विविध प्रसंगों पर उनका रुख यह देख कर तय होता है कि किस समुदाय की भावना भड़की है? यदि किसी मूढ़ ने गलत समुदाय के नेताओं को क्रुद्ध कर दिया हो, तो वह कितना ही बड़ा लेखक, पत्रकार क्यों न हो- हमारे बुद्धिजीवी उसके लिए कुछ नहीं कर सकते! इस पक्षपाती रवैये से देश में सामाजिक सद्भाव बुरी तरह प्रभावित होता है। ऐसी मुंहदेखी चुप्पी से ही विभाजनकारी तत्वों को मौका मिलता है कि वे मजहब या भावना के नाम पर लोगों को बरगलाएं। हमारा राजनीतिक-बौद्धिक वर्ग दोहरे मानदंड अपनाता है। इसका बार-बार प्रयोग होने से किसी समुदाय में अहंकार तो किसी में भेदभाव झेलने का रोष जमा होता है। दोरंगी दलीलें किसी को संतुष्ट नहीं करतीं। उनसे समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। देश-हित में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक राजनीति पर समान मापदंड अपना कर लिखना, बोलना चाहिए। अन्यथा आज की सुविधाजनक चुप्पी कल स्वयं उनकी अपनी स्वतंत्रता को भी बाधित करेगी। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) साभार:-दैनिक जागरण
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By Vichitra Gupta
– January 22, 2012
आज के सवाल
बहुत समय के बाद आज कुछ लिखने के लिए बैठा हूँ. मन में बहुत सारे सवाल पैदा हो रहे हैं आज के ताज़ा हालत पर.
आप सब से भी मैं ये विनती करूंगा कि इस विषय को गम्भीरता से लें और ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच इसकी चर्चा करें.
REPUBLIC OF INDIA (भारतीय गणतन्त्र ) के संविधान के अनुसार हर भारतीय के लिए कुछ मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है. समानता,स्वतंत्रता,शोषण का विरोध, धार्मिक आजादी,शिक्षा, संस्कृति , संवैधानिक , जीने और व्यक्तिगत आजादी का अधिकार इनमें मुख्य हैं. हम लोग जिसे आजादी का नाम देकर जश्न मानते हैं , क्या बदलाव महसूस करते हो गुलामी और आज की आजादी में. मेरे विचार से कुछ भी तो नहीं बदला है आज में और 62 साल पहले के भारत में ( भारतीयों के मौलिक अधिकारो के संदर्भ में ) .
आम नागरिक के साथ आज भी वही भेदभाव , शोषण हो रहा है , पहले अंग्रेज करते थे अब उनकी विरासत के वारिस काले अंग्रेज करते हैं. धार्मिक आजादी के नाम पर किसी धर्म विशेष का प्रयोग वोट के लिए किया जाता है और किसी को सांप्रदायिकता करार दिया जाता है. धार्मिक उन्माद फैलाकर आपसी भाईचारे को खत्म किया जाता है.
आम नागरिक को सरकारी स्तर पर शिक्षा मुहैया कराने की बात कहाँ तक खरी उतरती है . हर शहर और कस्बे में निजी स्कूलों और कालेजों की दुकानदारी खुलेआम चल रही है. एक बहुत बड़ा माफियाओं का समूह शिक्षा के नाम पर तथाकथित देश के नेताओं से सांठगांठ करके अपनी तिजोरियाँ भरने में लगे हुए हैं .
संस्कृति की तो बात करना ही दकियानूसी और किसी पिछड़ेपन की पहचान लगने लगी है. आजकल का युवा और तथाकथित 21वी सदी के पक्षधर संस्कृति की बात करने वालों को किसी दूसरे ग्रह का प्राणी समझते हैं.
कहने के लिए हर भारतीय को संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं. कानून की देवी की आँखों पर पट्टी बांधकर यह संदेश देने का झूठा प्रचार किया जाता है कि संविधान की नजर में सभी नागरिक समान हैं , जबकि सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है . ‘ समरथ को नहीं दोष गुसाईं ‘ यह बात रामचरितमानस् में गोस्वामी तुलसीदास जी बहुत समय पहले ही वर्णित कर चुके हैं. जब भी कोई घोटाला या षड्यंत्र का भंडाफोड़ होता है तो हरेक शासन करने वाली पार्टी के मंत्री का एक ही बयान होता है ‘ किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा चाहे वो कितने ही बड़े पद पर क्यों न हो.’ C.B.I. जैसी देश की उच्चतम केंद्रीय संस्था का आज तक का इतिहास इस बात का गवाह है ,उपरोक्त बयान कहाँ तक सही है ? देश के आम नागरिक को न्याय पाने के लिए न्यायलयों के चक्कर काटते-काटते अपना पूरा जीवन बीत जाने के बाद भी न्याय नहीं मिलता .
हर भारतीय के जीवन की रक्षा और स्वास्थ्य के लिए शायद किसी दूसरे देश या लोक की ज़िम्मेवारी है . भारतीय नेता तो यही सोचकर बैठे हैं . चाहे आम नागरिक की सुरक्षा का मामला हो या उसकी बीमारियों के लिए उपचार के लिए आधारभूत साधनों का . शासन करने वाले अपनी सुरक्षा के लिए करोड़ों रूपये खर्च कर देतें हैं,परन्तु आम जनता मरती रहे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता . या फिर उच्च और हाई प्रोफ़ाइल लोगों पर हमला होता है तो सरकार तुरन्त हरकत में आ जाती है .मुम्बई ताज होटल का हमला इसका उदाहरण है अगर ये हमला किसी आम जगह पर होता तो शायद इतना शोरशराबा नहीं होता .
लोग अपने स्वास्थ्य के लिए भी निजी और बड़े-बड़े कार्पोरेट सेक्टर के अस्पतालों पर निर्भर हैं. सभी को इस बात का पता है कि इन अस्पतालों में चिकित्सा के नाम पर कितनी बेदर्दी से लोगों का आर्थिक शोषण किया जाता है . इस क्षेत्र में भी बहुत बड़े-बड़े लोग सरकारों के साथ मिलकर सरेआम कानून का मखौल उड़ाते हुए आम लोगों के शरीर और भावनाओं तथा संवेदनाओं को मारने के पाप में संलिप्त हैं .
जहाँ तक हर व्यक्ति के जीने के लिए आधारभूत सुविधाओं की बात है ( बिजली ,पानी, स्वच्छ हवा , सड़क , परिवहन ,आवास ,भोजन ) तो आप देश के किसी भी कोने में चले जाइए हर जगह उपरोक्त सुविधाओं के लिए शासन के खिलाफ लोगों में एक आक्रोश मिलेगा . सरकार ने योजना आयोग बनाकर अपनी ज़िम्मेदारी को निभाने का नाटक रचा रखा है . क्या इनको कोई अनुमान नहीं होता कि आने वाले 20 साल बाद किसी शहर या कस्बे में कितनी बिजली,पानी,सड़क,आवास की आवश्यकता होगी . अगले साल 2010 में देश की राजधानी में कॉमनवेल्थ गेम होंगे . उसके लिए फटाफट योजनाएँ बनकर कम चालू हो जाता है (नये होटलों का निर्माण , बिजलीघरों का निर्माण ,खेल स्टेडियम ) कोई इनसे पूछे इस काम के लिए इनके पास इच्छाशक्ति और धन कहाँ से आ जाता है ? अगर ये गेम ना होते तो ये लोग धन का रोना रोकर या और कोई बहाना बनाकर टाल जाते .
बहुत से शहरों में दूषित जल की आपूर्ति की शिकायतें मिलती रहती हैं . मिलावटी खाद्य वस्तुएं बेचने पर दुकानदारों को दोषी मानकर उनपर कानूनी कार्यवाही की जाती है .उपभोक्ताओं को दैनिक उपयोग की सामग्री सही दुकानदार से खरीदने का विकल्प भी होता है.लेकिन स्थानीय दूषित जलापूर्ति का नागरिकों के लिए कोई विकल्प नहीं होता और दूषित जलापूर्ति के लिए न ही किसी अधिकारी या मंत्री पर कानूनी कार्यवाही होती है .
देश के कई हिस्सों में लोग भूख से मर रहे हैं और कई जगह अनाज सरकारी गोदामों में सड़ रहा है.देश की किसी भाग में सूखे के कारण अकाल होता है तो किसी कोने में अतिवृष्टि से बाढ़ का प्रकोप होता है .जब किसी दूसरे देश से तेल की पाईपलाइन लाई जा सकती है तो क्या एक ही देश के सूखे क्षेत्र में बाढ़ पीड़ित क्षेत्र का पानी नहीं लाया जा सकता . दोनों क्षेत्रों में जो जानमाल और राष्ट्रीय सम्पति का नुकसान होता है उसका उपयोग अन्य बहुत सी योजनाओं को पूरा करने के लिए किया जा सकता है.
आवास के अभाव में ठंड और गर्मी से बहुत से लोग मरते हैं , लाखों की संख्या में मन्दिर और धर्मशालाएँ बनी हुई और अब भी बहुत से तीर्थस्थानों पर बनती ही जा रही हैं . लेकिन इस देश की विडम्बना देखिए धनाड्य और संपन्न वर्ग भी इन भ्रष्ट राजनैतिक पार्टियों को चन्दा देने में नहीं हिचकते ,लेकिन इन सड़क पर जीवन बसर करने वाले असहाय गरीबों को सहारा देने में शर्म आती है .
ऐसा नहीं है कि उपरोक्त सभी समस्याओं का राजनैतिक पार्टियों के पास कोई समाधान ना हो. सभी पार्टियाँ जानबूझ कर इन्हें बनाए रखती हैं ताकि इनके नाम पर अपना वोट का खेल जारी रख सकें .अगर इन सबका हल हो जाए तो फिर ये किस बात पर जनता को गुमराह करेंगी . जिस प्रकार से अंग्रेजों की नीति थी ‘फुट डालो और राज करो ‘ उसी नीति पर आज की राजनैतिक पार्टियाँ कम कर रही हैं. इन्होने अपनी राजनैतिक आकांक्षा पूरी करने के लिए समाज को हद से ज्यादा तोड़ने का काम किया है. हरेक राजनैतिक पार्टी में भ्रष्ट और अपराधिक पृष्ठभूमि की छवि के लोगों की भरमार है. हर पार्टी का नैतिक और चारित्रिक पतन हो चुका है. ऐसे में इन लोगों से कोई भी उम्मीद करना निरर्थक है .
आज समय की जरूरत है कि देश कि जनता में जागरूकता लाई जाए और सही मायने में आजादी को परिभाषित किया जाए.
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By Vichitra Gupta
– February 22, 2009
तनाव प्रबंधन के कुछ सटीक सूत्र
तनाव मनः स्थिति से उपजा विकार है.मनः स्थिति एवं परिस्थिति के बीच असंतुलन एवं असामंजस्य के कारण तनाव उत्पन्न होता है. तनाव एक द्वन्द है, जो मन एवं भावनाओं में गहरी दरार पैदा करता है. तनाव अन्य अनेक मनोविकारों का प्रवेश द्वार है. उससे मन अशान्त,भावना अस्थिर एवं शरीर अस्वस्थता का अनुभव करते हैं.ऐसी स्थिति में हमारी कार्यक्षमता प्रभावित होती है और हमारी शारीरिक व मानसिक विकास यात्रा में व्यवधान आता है. इससे बचने का एकमात्र उपाय है -परिस्थिति के साथ तालमेल रखना , जिससे तनावरूपी मनोविकार को हटाया-मिटाया जा सके.
परिस्थिति को स्वीकार न करने पर तनाव पैदा होता है. यह तनाव कई प्रकार का होता है. पारिवारिक तनाव , आर्थिक तनाव, आफ़िस का तनाव ,रोजगार का तनाव, सामाजिक तनाव. मनोनुकूल परिस्थिति-परिवेश के अभाव में व्यक्ति उद्विग्न ,अशान्त एवं तनावग्रस्त हो उठता है. इसमें केवल एक व्यक्ति प्रभावित होता है, परन्तु यह सीमा जब व्यक्ति को लांघकर परिवार में पहुँच जाती है तो परिवार तनावग्रस्त हो जाता है.पारिवारिक तनाव से परिवार के संवेदनशील रिश्तों में दरार एवं दरकन् पैदा हो जाती है जिससे छोटी-छोटी बातों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर कलह एवं कहासुनी जैसी उलझनें खड़ी कर दी जाती हैं. सुन्दर व सुरम्य पारिवारिक वातावरण व्यंग्य और तानों का दंगल बन जाता है.
वैयक्तिक एवं पारिवारिक स्तर पर संपदा व संपति के सुनियोजन एवं सुव्यवस्था के अभाव में आर्थिक तनाव का जन्म होता है. उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के कारण अपव्यय एवं जीवनशैली की अनियमितता में वृद्धि हुई है,जिससे यह संकट और भी गहरा हुआ है.सामाजिक तनाव समाज के विभिन्न घटकों,समूहों एवं वर्गों के बीच तालमेल के न होने से उत्पन्न होता है.आज का व्यक्ति , परिवार व समाज तनाव के इस विघटन,टूटन एवं दरकन् से ग्रस्त हैं. व्यक्ति हो या समाज,आज ये इस कदर तनावग्रस्त हैं की उन्हें अपना भार भी असह्य लग रहा है. वे अपने ही बोझ से दबे-कुचले किसी तरह अपनी गुजर-बसर कर रहें हैं.
तनाव परिस्थिति से नहीं मनः स्थिति से उपजता है.अगर ऐसा नहीं होता तो विपरीत एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आशा,उत्साह एवं उमंग की परिकल्पना नहीं की जा सकती. जीवट के धनियों एवं मनीषियों ने प्रतिकूलताओं में जीवन की राह खोजी है,अपने गंतव्य,लक्ष्य को प्राप्त किया है.सूरदास,अष्टावक्र,सुकरात आदि मनीषियों ने शारीरिक विकृति को हिनताजन्य तनाव नहीं माना और इसी समाज में उत्कर्ष व सफलता की बुलंदियों को स्पर्श किया.सन्त तुकाराम का पारिवारिक जीवन तनाव के घनघोर कुहाँसों में घिरा हुआ था,परन्तु वे इस कुहासा-हताशा के आवरण को चीरकर भक्ति की भावधारा में सदा सरोबार रहते थे.कबीरदास के जीवन में आर्थिक तनाव सघन घन बनकर बरसा था, परन्तु प्रभु के अलावा किसी के आगे उनने हाथ नहीं पसारे,याचना नहीं की और अलमस्त एवं आन्नदपूर्वक जिंदगी जीकर दिखा दी.सामाजिक निंदा,अपमान एवं तिरस्काररूपी गहन आंधी-तूफान के बीच मीराबाई ने कृष्णभक्ति की ज्योति जलाई. विपरीत परिस्थितियों में इन महामानव ने जितना कर दिखाया,उतना तो सामान्य एवं सहज परिवेश में भी संभव नहीं है. इसका एकमात्र कारण है,मनः स्थिति की सुदृढ़ता-सशक्तता. अतः तनाव परिस्थितियों में नहीं दुर्बल व अशक्त मनः स्थिति में वास करता है. मनीषियों व मनस्वियों को यह स्पर्श नहीं कर पाता है.
तनावजन्य मनोविकारों का आक्रमण केवल दुर्बल व कमजोर मानसिकताओं पर होता है. परिस्थिति तो सबके लिए समान होती है.एक ही परिस्थिति में रहने वालों में से संकल्पवान अपने इच्छित लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है और विकल्प तलाशने वाला केवल विकल्प तलाशते रह जाता है. परिस्थितिजन्य तनाव ही प्रमुख व प्रबल होता तो एवरेस्ट के शिखर पर चढ़ा नहीं जा सकता था . जिसका मन परिस्थिति से तालमेल नहीं बैठा पाता उसी के अन्दर तनावजन्य विकृतियाँ अपना जाल बुनती हैं. ऐसे व्यक्ति का तंत्रिकातंत्र मन के आवेग को संभालने हेतु असमर्थ होता है.कष्ट-कठिनाइयों का हल्का झोंका भी इन्हें तार-तार कर देता है.
तनाव मुख्य रूप से नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है. तनाव से यह तंत्रिकातंत्र अत्यंत सक्रिय हो जाता है. इसकी सक्रियता हृदयगति एवं शर्करा के स्तर को बढ़ाने में सहायक होती है. इससे घबराहट होती है एवं सिर भारी रहता है. ऐसी अवस्था में नकारात्मक विचार उठते हैं और मन में निराशा-हताशा के बादल मंडराने लगते हैं.
तनाव मन में उत्पन्न होता है.अतः तनाव से मन प्रभावित होता है. तनावजन्य नकारात्मक
एवं निषेधात्मक विचारों से शरीर की प्रतिरक्षात्मक प्रणाली पर भी विपरीत असर पड़ता है. तनाव की अवधि
में श्वेत रूधिर कोशिकाओं की सहज सक्रियता कम हो जाती है.ये कोशिकाएँ शरीर की रोगों से रक्षा करती हैं तथा शरीर को स्वस्थ एवं निरोग बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं,परन्तु तनाव इस प्रतिरक्षात्मक
प्रणाली की मुस्तैदी को कम कर रोगों को प्रवेश करने का अवसर प्रदान करता है.
तनाव से मन में कई प्रकार के मनोविकार अपना स्थायी आवास बना लेते हैं. तनाव
से चिड़चिड़ापन पैदा हो जाता है. ऐसे व्यक्तियों का मानसिक संतुलन लगभग गड़बड़ा जाता है,परिणामस्वरूप नींद न आना,
हताशा-निराशा,कल्पनाओं में खोए रहना, डरना आदि मनोरोगों का प्रादुर्भाव होता है. ऐसे लोगों में निर्णय करने की क्षमता नहीं
होती है.
तनाव प्रबन्धन का प्रथम सूत्र है- वैचारिक खुलापन अर्थात आग्रह ,पूर्वाग्रह का अभाव . अच्छे विचारों को स्वीकृति एवं समर्थन देना चाहिए.इसी के आधार पर
सहयोग- सदभाव की भूमि तैयार होती है. सहयोग से स्वार्थवृति मिटती है और सेवा का भाव पनपता है,जिससे अपना विश्वास
प्रगाढ़ होता है. विश्वास ही विकास का मूल मंत्र है,उन्नति - प्रगति का साधन सोपान है. इस स्थिति में आकर ही स्वायत्तता की परिकल्पना की जा सकती है और स्वतंत्र रूप से अपनी योजना को कार्यरूप प्रदान किया जा सकता है.इसी में आंतरिक चेतना के परिष्कार तथा
वाह्या उन्नति की समस्त संभावनाएँ सन्निहित हैं.संभावना जब मूर्तरूप लेती है तो प्रामाणिकता के रूप में अभिव्यक्ति पाती है.
प्रामाणिकता आत्मविश्वास को जन्म देती है, तभी महान कार्य हेतु स्वयं का योगदान सम्भव हो सकता है और दूसरों का सहयोग मिल सकता है.तनाव प्रबंधन के इन सूत्रों में तनाव का समाधान समाहित है.
इसके साथ आवश्यक है सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रति श्रद्धा-आस्था की भावना. ईश्वर सर्वसमर्थ है, वह हमारी सभी समस्याओं का समाधान ,हताशा के कुहासे में ज्योतिर्मय पथ प्रदर्शक है.
वह हमारे तनाव का निवारक भी है. वह हमारे सभी मनोविकारों के सघन जंजाल को काटकर उत्साह,आनंद एवं प्रकाश से भर सकता है.अतः उसकी स्मृति को हृदय में बनाए रखने के लिए
गायत्री मंत्र की एक माला का न्यूनतम जप करना चाहिए.प्रत्येक दिन अपने नये जीवन का आत्मबोध एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव तत्त्वबोध भी तनावमुक्ति
के लिए रामबाण साधन है. यही तनाव का एकमात्र निदान है और उच्चस्तरीय जीवन का पाथेय पथ भी है.
साभार :- अखण्ड ज्योति
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By Vichitra Gupta
– September 13, 2008
हिन्दी भाषा के संरक्षण व विकास से ही राष्ट्रोत्थान संभव
भाषा अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है.यह अभिव्यक्ति आमजन की अस्मिता से लेकर राष्ट्र के आगत भविष्य निर्माण के लिए भी हो सकती है.इसलिए भाषा का प्रश्न केवल भाषा तक ही सीमित नहीं है.यह अपनी पहचान का प्रश्न है.क्या जो हम सोचते हैं , उसे अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्त करते हैं और यह अभिव्यक्ति हमारी पहचान बनाने में कितनी समर्थ हो रही है ? हमने अपनी आजादी की लड़ाई हिन्दी माध्यम से जीती है.हिन्दी की ऊर्जा का एकमात्र स्त्रोत आमजन है. आमजन ही भाषा की राष्ट्रीय गरिमा को प्रतिष्ठित करता एवं इसे कायम रखता है.
भाषा का निर्माण टकसाल में न होकर सड़क पर होता है , चौपाल में होता है , गावं के गलियारों में होता है और उसका शिल्पी देश का आमजन है.भाषा की समृद्धि जन-जन की भाषा के प्रति सजगता , सक्रियता एवं जागरूकता पर निर्भर करती है.भाषा के विनाश एवं विकास में वही एकमात्र ज़िम्मेदार होता है.आज यह ज़िम्मेदारी खतरे में पड़ी नजर आती है.सबसे पहले मुगलों ने हिन्दी के साथ अन्य भाषाओं का संयोग-समन्वय किया.इससे हिन्दी भाषा का विभाजन नहीं हुआ,बल्कि उसकी विविधता में विकास हुआ.हिन्दी में उर्दू और फारसी आदि भाषाओं का सुंदर गठजोड़ हुआ. भाषा कई आयामों में विकसित हुई.विकास के इन मूल कारणों को अंग्रेजों की अंग्रेजी ने चोट मारी और इसे कमजोर कर हिन्दी के स्थान पर अंग्रेजी को प्रतिष्ठित बनाने का कुचक्र रचा गया. बहुत हद तक यह कुचक्र सफल हुआ , जिसका परिणाम हमारे सामने है कि हम हिन्दी से अधिक अंग्रेजी बोलने में गर्व अनुभव करते हैं.
हिन्दी के मूल में अंग्रेजी के कुठाराघात के बाद फिर से एक और प्रहार हो रहा है - भूमण्डलीकरण का . भूमण्डलीकरण के इस दौर में किसी स्वाधीन , संपन्न और आत्मनिर्भर राष्ट्र में दूसरे देश की भाषा विकास का पैमाना बने , यह कैसे स्वीकार्य होगा.यह भी सच है कि विश्व के किसी देश में भाषा की स्वाधीनता और उसकी निजता को इतने व्यापक विस्तार और बारीकी से नहीं लिया गया , जितना हमारे देश में और यह घटना आज भी जारी है. बाज़ारवादी व्यवस्था में हिन्दी की अस्मिता,अस्तित्व और निजता के लिए उत्तरदायी लोगों की अभिरूचि एसे गंभीर और बुनियादी सवालों पर नहीं है. वे इस भाषा को विश्वव्यापी बनाने, वर्तमान समय में अन्य भाषाओं के समान विकसित एवं समृद्ध करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. उन्हें भाषागत स्वाभिमान की बात बेकार और ग़ैरज़रूरी लगती है. बाज़ारवाद तत्कालिक आवश्यकता को सर्वाधिक अहमियत देता है. वह एसी संकर भाषा निर्मित करता है , जिससे केवल उसका हित सध सके. वह अपने लाभ के लिए आज हिन्दी भाषा का , जितना सर्वनाश कर सकता है , कर रहा है और इसके प्रति हमारी घोर उदासीनता ने हमारी पहचान को प्रश्न के घेरे में खड़ा कर दिया है. चांदी के चन्द सिक्कों में हम अपनी पहचान खोने लगे हैं. अगर एसा नहीं है तो क्या कारण है कि हमें अपनी हिन्दी एवं अन्य मातृभाषा बोलने में संकोच होता है.एसा संकोच तो चीनी , रूसी , जर्मन एवं फ्रांस के लोग नहीं करते, वे तो अपनी ही भाषा को प्राथमिकता देते हैं.
आज हिन्दी की नियति एवं परिस्थिति अत्यंत चिंताजनक है. आंकड़ों के आईने में देखें तो हिंदीभाषी देश में अंग्रेजी जानने वालों की संख्या कुल आबादी का तीन प्रतिशत है. लगभग दो सौ वर्ष के अंग्रेज आधिपत्य और 58 साल के चहुंमुखी विकास के बावजूद अंग्रेजी का विकास संभव नहीं हुआ , फिर भी अंग्रेजी मोह नहीं जाता. विचारणीय यह भी है की शेष सतानवे प्रतिशत जनता क्या चाहती है,उसकी अपेक्षाएं क्या है ? निरक्षरता आज की सबसे बड़ी चुनौती है , इसके निराकरण में केवल भारतीय भाषाएं ही सहायता कर सकती हैं.भाषा का निर्माण जनसामान्य करते हैं , अंततः इसकी रक्षा वही करेगें, क्योंकि सरकार,आयोग और आयोजन न भाषा का निर्माण करते हैं और न परिष्कार-परिमार्जन. हिन्दी भाषा का उत्थान भी इन्हीं जनसामान्य के हाथों में है. अतः जनसामान्य की जागरूकता आवश्यक है.
बाज़ारवाद के घोर समर्थक एवं पक्षधर अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार एवं विस्तार में अधिक रूचि दिखाते हैं, क्योंकि इसी में उनका लाभ है. तीन प्रतिशत भारतीयजनों के लिए इतनी सजगता और सतानवे प्रतिशत जनता के लिए इतनी उपेक्षा क्यो ?विदेशी भाषाओं को सीखने , समझने एवं व्यवहार करने में कोई समस्या नहीं है,परंतु इन्हें अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में वरीयता प्रदान करना अत्यंत घातक एवं चिंताजनक है.अंग्रेजी अन्य भारतीय भाषाओं के उत्थान में संवाद की भूमिका निभाए तो स्वीकार है .
हिन्दी साहित्य के शिरोमणि मुंशी प्रेमचंद के शब्द हैं- ‘राष्ट्र की बुनियाद राष्ट्र की भाषा है.भाषा ही वह बन्धन है, जो चिरकाल तक राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे रहती है और इसे बिखरने,विखंडित एवं विभाजित होने से रोकती है.’ राष्ट्रनिर्माण के पुरोधा श्री अरविंद कहते हैं कि किसी राष्ट्र अथवा मानवीय समुदाय की आत्मा के लिए यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि वह अपनी भाषा की रक्षा करे और उसे एक सशक्त और सजीव सांस्कृतिक बना ले.जो राष्ट्र , जाति और जनसमुदाय अपनी भाषा खो देता है, वह अपना संपूर्ण एवं सच्चा जीवन व्यतीत नहीं कर सकता.
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By Vichitra Gupta
– September 11, 2008
रोशनी की कोहनियाँ
छत की ईंटें ही अगर बारूद से मिल जाएंगी,
तो यकीनन घर की नीवे दूर तक हिल जाएंगी .
यूँ ही दीवारें अगर आंगन में अब उठती रही,
देख लेना रोशनी की कोहनियाँ छिल जाएंगी.
चिथड़ा-चिथड़ा हो के बिखरेंगे हमारे जिस्म ही,
आपकी बातें तो कपड़ों की तरह सिल जाएंगी.
दो समान्नतर खीची रेखाएँ मत कहिए हमें,
हम वो आँखें हैं कि जो लड़ते हुए मिल जाएंगी.
ये मेरे ज़ख़्मों की मुरझाई हुई कलियाँ ‘कुअँर ‘
मुस्कराकर कोई छू लेगा तो फिर खिल जाएंगी.
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By Vichitra Gupta
– September 9, 2008
छोटा सा दिल
दर्द हमारे सीने में अब लम्हा-लम्हा होता है,
आँख में आने वाला आँसू सहमा-सहमा होता है.
लाख मिटाओ फर्क मगर ये फर्क कहीं पर मिटता है,
झूठा झूठा होता है और सच्चा सच्चा होता है.
जिस बस्ती में खून ख़राबा,नफरत,हिंसा पलती है,
सहमा-सहमा उस बस्ती का बच्चा-बच्चा होता है.
मन्जिल दूर थके कदमों की आहट कोई नहीं सुनता,
पावों के छालों का चर्चा सहरा-सहरा होता है.
मैं ही तन्हा हूँ इस जग में,एसी कोई बात नहीं,
मेरी तरह तो वो भी अक्सर तन्हा-तन्हा होता है.
नफरत,खौफ,मोहब्बत,लालच,भूख,गरीबी,मजबूरी,
तन्हा इस छोटे से दिल में , जाने क्या-क्या होता है.
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By Vichitra Gupta
– September 9, 2008
इक बहाना
इस जमीं से दूर जाना चाहिए
आसमां को देख आना चाहिए.
इस कदर अच्छा तो है खुद पर य़कीन,
पर कहीं तो मार खाना चाहिए.
आसमां इक चाहिए परवाज़ को,
और जमीं पर आशियाना चाहिए.
दिल मिले चाहे किसी से ना मिले,
हाथ हर इक से मिलना चाहिए.
कुछ तो हो उम्मीद उनके दीद की,
कुछ तो जीने का बहाना चाहिए.
जख्म से उसको हो क्योंकर वास्ता,
तीर को तो बस निशाना चाहिए.
बेसिर-औ-समान दिन तो कट गया,
रात सर पर है ठिकाना चाहिए.
टूटकर गिरना था उसको अर्श से,
मौत को तो इक बहाना चाहिए.
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By Vichitra Gupta
– September 9, 2008
धर्म का माहौल
प्यार की मनुहारों में ले चलो मुझको,
आँखों के इशारों में ले चलो मुझको.
धर्म का ये माहौल रास आया नहीं,
फिर से गुनहगारों में ले चलो मुझको.
यहाँ दिन के उजालों से डर लगता है,
रातों के नज़ारों में ले चलो मुझको.
बिना जूझे साहिल मिले, गंवारा नहीं,
अब उठो,मझधारों में ले चलो मुझको.
बोझा सहारों का ढोया न जाएगा,
अब तो बेसहारों में ले चलो मुझको.
जीवन में दोहरी पहचान से तौबा,
अनजानी क़तारों में ले चलो मुझको.
खुशियों में तो सभी कुछ भूल जाऊँगा,
चलो, गम के मारों में ले चलो मुझको.
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By Vichitra Gupta
– September 9, 2008
तबाही की आग में एसा कोई नीर ढूंढ लाइए,फिर से बसी बस्ती की तस्वीर ढूंढ लाइए.
खून के रंग की शबनम होने लगी अब तो,
एसे में कहीं से नानक और कबीर ढूंढ लाइए.
जलते हुए घरों में धुआँ हो गयी है इंसानियत,
भटकती हुई रूहों के वही शरीर ढूंढ लाइए.
गिरती ही जा रही हैं कटकर गर्दनें किस धार से,
छुपकर चल रही है वो शमशीर ढूंढ लाइए.
जन्मों के रिश्ते छूट गये दिल से मिले दिल बँट गये,
बांध ले फिर से इनको एसी जंजीर ढूंढ लाइए
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By Vichitra Gupta
– September 9, 2008