Skip to content


YE DIL

भीड़ से डरता है तन्हाई में घबराता है दिल,
आजकल तो खुद से भी मिलने से कतराता है दिल.

अपने जिस्म का है बस टूटी हवेली सा वजूद,
आईने में झांकते ही खुद से घबराता है दिल.

इस जमाने ने सिवाए तोहमतों के क्या दिया,
दरअसल अब तो मुहब्बत करके पछताता है दिल.

इस कदर कुछ हादसों ने तोड़ डाला है कि अब,
बेसबब हर बात पर बस यूँ ही भर आता है दिल.

एक जमाना हो गया अब तो उन्हें देखे हुए,
हर घड़ी हर पल उन्हें मिलने को ललचाता है दिल.

सब्र कर ! थी वक्त की साजिश जो सब कुछ लुट गया,
मुझको तन्हा देखकर अक्सर ये समझाता है दिल.

Posted in Poetry.

12 comments



PARIVAR

पश्चिमी वातावरण का दुष्प्रभाव हमारे संस्कारों पर हो रहा है,जिसके परिणाम स्वरूप हमारी परिवारिक एकता टूटती जा रही है.हर कोई अपनी स्वतंत्रता चाहता है. पुत्र सोलह वर्ष का होने पर उसके पिताजी उसे कुछ कह नहीं सकते. पिताजी बीमार होने पर भी पुत्र उनकी शुश्रूषा नहीं करता. हमारी संस्कृति करूणा से भरी है. किसी को भी दुख होने पर हम व्यथित हो जाते हैं, किन्तु पश्चिमी संस्कृति के ज्वार में हमारी यह भावना नष्ट होती जा रही है.एसे हालात में भी सत्संगी का परिवार एक आदर्श परिवार होना चाहिए.                                  विग्यान ने बहुत विकास किया. लाईट मिली,अभिनव रास्तों का निर्माण हुआ. विग्यान ने मनुष्य को चंद्रमा पर भेजा,इंटरनेट और टी.वी. दिया,किन्तु उसमें अश्लीलता , मारामारी , चोरी इन सभी में लड़कों का आकर्षण होता है.टी.वी. को तो माता पिता भी इकट्ठा होकर देखते हैं. उसमें विवेक कैसा रहता ?
                                    सत्संग से,शास्त्रों के पठन से विवेक उदय होता है.अच्छी वस्तु ग्रहण करके बुरी वस्तुओं का त्याग करना वह हमें शास्त्र सिखाते हैं. अश्लील पुस्तक पढ़ने से जीवन बर्बाद होता है.
                                      आज टी.वी. प्रत्येक घर में बैठ गया है,और सभी आनंद लूटते हैं माता-पिता,बेटा-बेटी,बहू,छोटे बालक सभी टी.वी. के सामने बैठ जाएँ फिर बालकों को बुजुर्गों के प्रति आदरभाव कैसे रहेगा ? परिवार में वृद्धों के लिए हमेशा आदर होना चाहिए और, बड़ों को भी एसा वर्तन रखना चाहिए कि यह मेरा परिवार है, उसे ऊपर उठाना है. लड़कों को पहले से ग्यान देना चाहिए. बालक को बचपन से ही हमारे संस्कार घरमंदिर से मिलने लगते हैं.
                          टी.वी. देखकर बालक क्या सीखेगा? छीनाझपटी, कलह,चोरी-डकैती,मद्यपान,जुआ खेलना इत्यादि,यह जानते हुए भी टी.वी.के मोहवश मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा ,धन,समृद्धि ,खानदान,सब गवां देते हैं. हमारे संस्कार लुप्त होते गये.
                           हम अपने घर को मंदिर बनाएँ. प्रतिदिन शाम को घरसत्संग करें. गीता-भागवत,वचनामृत इत्यादि का पठन करें. हम बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए प्रबंध करते हैं,ठीक वैसे अच्छे संस्कार के लिए भी घरसत्संग का प्रबंध करें. भौतिक शिक्षा से जीवन-निर्माण नहीं होता,वह अध्यात्म संस्कारों से होता है. आज घर-घर में कलह, अशांति और दुख देखने को मिलता है.उसका कारण है कि ,धर्म से,अध्यात्म से, हमने मुख मोड़ लिया है. आध्यात्मिकता से जीवन में शांति मिलेगी.
               जितना भौतिकवाद बढ़ेगा,उतनी संपति बढ़ेगी,और मनुष्य में दुर्गुण भी उतने ही बढ़ेगें. अतः घर में पहले से संतानों पर ध्यान दीजिए. संतानों को धमकाएँ मत, प्रेम से बात करें. प्रेम और वात्सल्य से की गयी बात इनके दिमाग में बैठेगी. बालकों की बात,चित्त देकर सुनें और उनको समझने का प्रयत्न करें,तो आपस में आत्मीयता बढ़ेगी और शांति मिलेगी.
         टी.वी.की तरह अश्लील सामयिक भी हमारे संस्कारों कि धुलाई करते हैं,अतः अच्छा पढ़े. अच्छा पढ़ने से विचार भी अच्छे आते हैं,जो जीवन निर्माण करते हैं.अच्छे ग्रंथ घर में बसाएँ.भावी पीढ़ी को उनसे संस्कार प्राप्त होंगे.
                                       गृहस्थाश्रम की वजह से धन की आवश्यकता होगी ही,और नौकरी,व्यवसाय सब करना होगा.किन्तु उसमें भी समय निकालकर सांयकाल एक-आध घंटा बच्चों के साथ व्यतीत करें.उनके साथ आनंद-प्रमोद करें,खेल करें,बैठकर थोड़ी बातें करें,इससे आत्मीयता बढ़ेगी,और बच्चे हमारी रूचि के अनुसार वर्तन करेंगे.
                       प्रतिदिन एक   समय का भोजन साथ में बैठकर लिया करें. इससे भी बच्चों से हमारी आत्मीयता बढ़ेगी.सह्भोजन करने वाले के मन भी साथ में एक बनकर रहतें हैं.
                                       हमारे कुटुम्ब सुधरेगा तो समाज सुधरेगा और समाज सुधरेगा तो राष्ट्र सुधरेगा. अतः सत्संगी के घर में मनमुटाव कभी नहीं होना चाहिए. घर स्वच्छ,पवित्र रहना चाहिए.उसमें प्रवेश करते ही मन शांत हो जाए. प्रतिदिन भगवान की मूर्ति के समक्ष बैठकर मौन धारण करें. अंतस्थ हो,भगवान की धुन-प्रार्थना करें. सबसे ऊँची प्रेम सगाई.चाहे जैसा भी व्यक्ति हो उसको भी प्रेम से जीता जा सकता है. एक व्यक्ति का परिवर्तन होगा तो पूरा कुटुम्ब का परिवर्तन होगा.फिर समाज एवं देश तथा ब्रह्मांड का परिवर्तन होगा.

साभार :- स्वामीनारायण प्रकाश

Posted in Writing.

7 comments



GHAR - SATSANG

मनुष्य को सुखी बनाने में साइंस का बहुत योगदान है,किन्तु इससे मनुष्य सुखी हुआ है क्या ? बाह्य भौतिक सुख ऊपर से अच्छे लगते हैं,किन्तु उनके भीतर झांकिए, तो पता लगता है कि बिना अध्यात्म के यह भौतिक सुख,दुख का कारण बन गया है. आज के समय में दुनिया में लगभग 2000 लोग प्रतिदिन आत्महत्या कर लेते हैं. एक सर्वे द्वारा मालूम हुआ है कि 10000 दुखी लोगों में से 1000 लोग मरने की बातें सोचते हैं.उनमें से सौ लोग मरने का दृढ़ निश्चय करते हैं,जिनमें से मात्र 10 लोग मरने के लिए निकल पड़ते हैं.उनमें से 9 व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से बच निकलते हैं और मात्र एक ही व्यक्ति मृत्यु को गले लगाने में सफल होता है ! आत्महत्या में सफल होने वाले 2000 की संख्या देखकर निश्चित हो जाता है कि प्रतिदिन दो करोड़ लोगों के मन में मरने का विचार उत्पन्न होता है,जिसका मुख्य कारण मानसिक तनाव है ! जो किसी बाहरी उपचार से नहीं दूर होता.       व्यक्ति को चाहिए कि वह, एसे पारिबलों से दूर रहे,जो उसके मन को बिगाड़ने में सफल रहतें हैं.इसके पश्चात भगवान की ओर अपनी मानसिकता को मोड़ लेना चाहिए. रामायण और महाभारत का युद्ध मन के विकार का परिणाम था. एक ही व्यक्ति का बिगड़ा हुआ मन ,समग्र विश्व का विनाश कर सकता है. भौतिक सुविधाओं के कारण , आज के मनुष्य का बिगड़ा हुआ मन सुधर नहीं सकता,यह काम तो अध्यात्म का है. भारत में 20 करोड़ मनुष्य एसे हैं,जिन्हें किसी प्रकार से मात्र एक समय का ही भोजन प्राप्त होता है.किन्तु भूख के कारण वे आत्महत्या नहीं करते.भिखारी कभी आत्महत्या नहीं करता ; आत्महत्या यो बड़े-बड़े डॉक्टर,इंजीनियर अथवा बुद्धिजीवी वर्ग के सदस्य करते हैं.इनके जीवन में कुछ रिक्तता अनुभव होती है ,वह है - अध्यात्म ! इस अध्यात्म को घरसत्संग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है.
हाँ, आपको स्मरण है -
अपने दादा का खपरैल का घर और लिपा हुआ आंगन ?
दूर-दूर तक फैली हुई गावं की हरियाली ?
रात की शीतल -मंद हवाएं,टिमटिमाते हुए तारों की अमृतवर्षा ?
और दादाजी की चारपाई के चारों ओर घेरे हुए नन्हें-नन्हें बाल -गोपालों का किल्लोल-कलरव ?

                          आज से लगभग चालीस-पचास वर्ष पूर्व के वे गावं और गावं में घर के सामने छोटे से चौक में हरा-भरा स्नेहिल वात्सल्य……वे दादा और दादीमाँ तुम्हारे साथ कैसा उत्सव करते थे ? अभिमन्यु के शौर्य और भीम के पराक्रमों की बातें ! पंचतंत्र के हिरण की प्रमाणिकता और अर्जुन के गांडीव -टंकार की महिमा !राम-लक्ष्मण के असाधारण त्याग और श्रवण की पितृभक्ति ! उन घरों की मिट्टी के संस्कारों की और परम्परागत चले आ रहे परिवारिक मूल्यों की तथा धर्म की नीवं पर निर्मित खानदान की सुगन्ध की यादें हैं ?उन घरों में बालकों को पालने में ही संस्कृति की घूंटी पिलाई जाती थी ….किन्तु आज हम परिवर्तन के उस मोड़ पर खड़े हैं,जहाँ पूर्व का स्वर्ण भूलता जा रहा है और पश्चिमी रेत के कणों ने हमारी आखों को ढक दिया है.
                 ‘घर का फर्नीचर या सुशोभन घर की शोभा नहीं है.धर्म,संस्कार,शांति ही घर की शोभा है.घर एसा होना चाहिए कि जिसमें प्रवेश करने के साथ ही अंतर्मन में शांति हो जाए.किन्तु एसा कब बन सकता है ? इसका उपाय है, घरसत्संग.’
                                                                                                                                              
                                                                                                                                                              -प्रमुखस्वामी महाराज

साभार :-स्वामीनारायण प्रकाश

Posted in Writing.

6 comments



MAUN

मन की एक आदर्श अवस्था - मौन
             मौन मन की आदर्श अवस्था है. मौन का अर्थ है मन का निस्पंद होना . मन की चंचलता समाप्त होते ही मौन की दिव्य अनुभूति होने लगती है. मौन मन का अलंकार है,जो इसके स्थिर होते ही सहजता से प्राप्त किया जा सकता है .मौन से मानसिक ऊर्जा का क्षरण रोककर इसे मानसिक शक्त्तियों के विकास एवं वर्द्धन में नियोजित किया जाना सम्भव है. मौन मन को उर्ध्व मुखी बनाता है तथा इसकी गति को दिशा विशेष में तीव्र कर देता है . अतः साधना के पथ पर बढ़ने वालों के लिए मौन एक अनिवार्य स्थिति है. जप - साधना करने वालों के लिए तो यह एक अपरिहार्य शर्त है.
                                 मौन - चुप-या-शांत रहना नहीं है बल्कि अनावश्यक विचारों के उधेड़बुन से मुक्ति पाना है . चुप रहने को यदि मौन   मानते हैं , तो समझना चाहिए की इसके मर्म एवं तथ्य से हम बहुत दूर हैं .  सामान्यतः व्यक्ति बोलकर जितना मानसिक ऊर्जा की बर्बादी करता है , उससे कहीं ज्यादा विवशतावश चुप रहकर करता है. एसी अवस्था में विचारों की आड़ी- टेढ़ी लकीरें आपस में टकराने लगती हैं और अपने को अभिव्यक्त करने के लिए मन का संधान करती हैं . चुप रहते हैं और मन की इस व्यथा को भी सहते हैं. बोलना चाहते हैं और बोलते भी नहीं . इस कशमकश से तो अच्छा है कि बोलकर अपने को हल्का कर लिया जाए . इसके अभाव में मानसिक शक्तियाँ कुंठित हो जाती हैं. उनमें गाँठें पड़ जाती हैं और अंततः ये गाँठें हमारे अचेतन मन को ज़ख़्मों से छलनी कर देती हैं . एसा मौन अत्यन्त संघातक होता है.
                                  विवशता की चुपी ठीक नहीं है , तो मन को उच्छृंखल- उन्मुक्त होने देना भी अच्छा नहीं है. मन जब भी सीमाएँ लांघता है, वाणी वाचाल हो जाती है. क्योंकि वाणी और मन का सम्बन्ध अग्नि और तपन के समान है. चंचल मन वाणी के प्रवाह को नियंत्रित नहीं कर सकता है और अनियंत्रित वाणी के दुष्प्रभाव से भला कौन परिचित नहीं है.
                                                   मौन में मन शांत, सहज एवं उर्वर होता है और सृजनशील विचारों को ग्रहण कर पाता है. अतः मौन-चुप रहने की अवस्था नहीं है. मौन से वाणी पर अंकुश लगाया जा सकता है. मौन का अभ्यास करके निरर्थक एवं बेलगाम प्रलाप
से निजात पाया जा सकता है. इससे मन स्थिर एवं प्रशांत होता है. प्रशांत मन समस्त मानसिक शक्तियों का द्वार
होता है. मौन की शक्ति असीमित और अनन्त है . मौन मनुष्य की ही नहीं संपूर्ण प्रकृति की अमोघशक्ति है.
                                         सप्ताह में किसी दिन या किसी दिन में कुछ घण्टे मौन का अभ्यास किया जा सकता है. निरन्तर अभ्यास से मौन जीवन का अंग बन सकता है.
व्यक्तित्व को गढ़ने एवं परिष्कृत करने के लिए मौन अपरिहार्य है. अतः इसके लिए हम सबको सचेष्ट प्रयास करना चाहिए.

साभार:- अखण्ड ज्योति
                                           
                                         

Posted in Writing.

8 comments



AAJ KA SWAROOP

काश ! अध्यात्म का हमने मर्म जाना होता

आज का स्वरूप : एक लेखा- जोखा
अध्यात्म -धर्मतंत्र आज इक्कीसवीं सदी मे एक बदले कलेवर के रूप में दिखाई देता है.अरबों की पूंजी उसमें नियोजित दिखाई देती है.उपभोक्तावाद -भोगवाद जितना अधिक बढ़ा है,संयम की कमी से जितना व्यक्ति खोखला हुआ है तथा जितनी तेजी से समाज की दृष्टि बहिर्मुखी हुई है,उतनी ही तेजी से यह वर्ग धर्मक्षेत्र की ओर भागता भी दिखाई देता है. लगता है,सरा जमाना एक साथ भोगवादी एवं आस्तिक भी हुआ जा रहा है. तकनीकी प्रगति के इस युग में आप कुछ विरोधाभास , जिसे कबीर की उलटवांसी कह सकते हैं,एक साथ देख सकते हैं.
आपको लाखों व्यक्ति कथाओं में कथा सुनते-नाचते-गाते दिखाई दे सकते हैं.वे ही आपको शाम को माल, प्लाज़ा व मल्टीप्लेक्स में भी मौज मानते दिखाई दे सकते हैं.लगता है,धर्म का उपयोग गम गलत करने के लिए, भोग से पायी निरसता से उबरने के लिए किया जाने लगा है.एक ओर वैरागी वस्त्र पहने सन्त-महात्मा दिखाई देते हैं,दूसरी ओर उनके गले में कई तोलो की सोने की कई चेन,उनके अट्टालिकाओं जैसे आश्रम ,चेले-चेलियों का वैभव भरा संसार नजर आता है. थोड़ा- बहुत परहित का कार्य भी ये कुछ विकलांगों को साइकिल देकर,धर्मार्थ औषधालय चलाकर, संस्कृत विध्यालय चलाकर कर लेते हैं,पर इनमें उनके कुल बजट का एक प्रतिशत से अधिक नहीं लगता. कहीं अन्न क्षेत्र खुले हैं,जिनमें समाज के लिए ज्यादा कुछ न करने वाले भोजन करते रहते हैं एवं दूसरी ओर लाखों- करोड़ों गरीब एक दिन की एक समय की रोटी के लिए तरसते रहते हैं.
क्या यही है धर्म-अध्यात्म
क्या यही है धर्म- अध्यात्म? यही वह धर्मतंत्र है, जिसके माध्यम से हमने भारत को जगदगुरु बनाने का सपना देखा था ? उत्तर से दक्षिण तक,पूरब से पश्चिम तक भारत में धार्मिक संस्थाएं-संगठन छाए हुए हैं.बहुत बड़े जनसमुदाय पर इनका प्रभाव भी है. एक युवा वर्ग है, जो इनसे कन्नी काटता है; विशेषरूप से दिखाने वाले कर्मकांडी धर्मप्रधान स्वरूप से, पर संपन्न कहे जाने वाले एवं मध्यम वर्ग के बहुत से व्यक्ति बिना अध्यात्म कस मर्म जाने इनसे जुड़े हैं.कई संस्थाएं बहुत अच्छे कार्य कर भी रही हैं,ढेर सारे संगठन समाज-निर्माण की कुछ प्रवृत्तियाँ भी चला रहे हैं; जो शायद शासन नहीं चला पता. धर्मतंत्र से चली योग की आंधी ने बहुत बड़े वर्ग को लपेट में ले लिया है. इतना प्रभावशाली माध्यम,इतने बड़े वर्ग पर उसका असर,फिर जीवनमूल्यों में अन्तर आता क्यों नहीं दिखाई देता ? क्यों नहीं लोगों की सोच बदलती है ? नागरिक कर्त्तव्यों की बात हो या राष्ट्रीय हित की, उनके किर्याकलापों में कहीं अनुशासन व समर्पण क्यों नहीं दिखाई देता ? वह प्रभाव क्यों नहीं पड़ता दिखाई देता,जो इतने सारे धर्मवेत्ता विभिन्ना टी.वी.चैनल्स द्वारा तथा नित्य अगणित स्थानों पर हो रहे अपने प्रवचनों में कह रहे हैं.
‘वाक द टाक ‘
लगता है, कोई ‘रोल मॉडल’ नहीं बन पाया. लगता है, जो कह रहे हैं, उनके आचरण में नहीं उतर पाया,इसलिए प्रभावी नहीं बन सका. एक शब्द आता है ‘वाक द टाक ‘जो कहें , उस पर चलिए . न चल सकें तो मत कहिए. उपदेशों की ढेरों दुकानें लगी हैं, पर परिवर्तन उस वर्ग में क्यों नहीं दिखाई दे रहा,जो इन्हें सुन रहा है ? कांवर यात्रा के नाम पर मन्नत पूरी करने ढेरों पहुँचते हैं , पर क्या वे सही अर्थों में धार्मिक हैं ? क्यों गांजा,सुलाफा,चरस से लेकर कई गलत क्रियाकलाप अपनाते ,राष्ट्र विरोधी तोड़-फोड़ की गतिविधियाँ अपनाते, वे देखे जाते हैं ?क्या यही असली धर्म है ? या कहीं एसा तो नहीं, असली के नाम पर नकली ही हमारे समक्ष दिखाई पड़ रहा है ?
काश ! सभी मर्म समझ सकें !
अध्यात्मतत्त्व और विधि - विधान के नाम पर आज जो विडंबनाएँ छा गयी हैं , उनका निराकरण होना चाहिए . अध्यात्म के लिए वेश -विन्यास या आडंबर - धारण की नकल बनाने की आवश्यकता नहीं है. जब प्राचीनकाल के आदर्शों और क्रियाकलापों को विस्मृत - उपक्षित कर दिया गया है तो उस प्रकार की विडंबना रचने से क्या लाभ ! दुकान में जो माल नहीं है , उसकी बिक्री का साइनबोर्ड क्यों लगाया जाए ! हमें अध्यात्मतत्त्व को उपहासास्पद आडंबर न बनाकर इस परम्परा को नये सिरे से पुनर्जीवित करना चाहिए . अध्यात्म और साइंस का समन्वय कर उसे प्रगतिशील , व्यावहारिक एवं विधेयात्मकता का पर्याय बनाकर जन-जन के लिए उसे प्रचलित कर देना चाहिए . काश !यह हो सके ,तो मानव जाति का बहुत कुछ हित साधा जा सकता है. अध्यात्म का मर्म यदि हमने समझ लिया, समझा दिया तो माना जाना चाहिए की हमने इस युग की सर्वोपरि साधना कर ली .

:-

Posted in Writing.

8 comments



SAB KUCHH PAYA,KHOYA APNAPAN

आज भौगोलिक दूरियाँ कम हुई हैं. साधन सुविधा बहुत ज्यादा हो गये हैं.साधनों के इस अम्बार में कुछ खोया है तो वह है- भावना, संवेदना तथा इन्सानी रिश्ते.आज सुदूर देश का कोई कोना हमारी पहुँच से परे नहीं है,लेकिन एक ही मन्जिल पर रहने वाले दो पड़ोसी आपस में एकदम अनजान और अजनबी हैं. साधन और सुविधाओं ने मनुष्य को एक मशीन बनाकर रख दिया है.संचार के इस युग में दूरियाँ मिट गयी हैं.कनाडा में रहने वाले व्यक्ति से एसे बातें होती हैं, जैसे वह हमारे पड़ोसी हों.लेकिन ठीक इसके विपरीत हमारे पड़ोसी की दूरियाँ भी उतनी ही बढ़ गयी हैं.यान्त्रिक साधनों ने सुविधाएं तो दी हैं, परंतु इसमें भावनात्मक विलगाव और अलगाव बहुत हुआ है.हम एक यन्त्र बनकर रह गये हैं.हमारे अंदर की संवेदना ,भावना सूख गयी है.
बेशक आज हमारे पास पहले जैसा अभाव नहीं है और न ही पहले जैसी कठिनाइयाँ ही हैं.आज हम अत्याधुनिक युग में रहते हैं, परंतु जो चीज खो गयी हैं,वे हैं हमारे मधुर संबंध, संवेदनशील रिश्ते और इन रिश्तों की महक. आज हम सुविधा-साधनों के शिखर पर पहुँच कर भी आन्तरिक दरिद्रता से ग्रस्त हैं.हमारे पास सब कुछ है,खाने और रहने के लिए तरह-तरह की भोजन- सामग्री,फ़ाइव स्टार होटल आदि , आवागमन के लिए गाड़ियाँ,तमाम प्रकार के उपकरण , अकूत धन- संपदा, परन्तु इन सबके बीच हमसे खोया है तो आपसी विश्वास,सौहार्द्र,सहयोग-सहकार एवं बेहद अपनापन.साधनों के ढेर में हम अनजाने - अजनबी बनकर जाने क्या तलाश रहे हैं.यह ठीक है कि साधन- सुविधाओं की जरूरत पड़ती है,परंतु यही सब कुछ नहीं है,इसके अलावा भी कुछ चाहिए,जो दे सके दिल को सुकून और एक मुट्ठी अपनापन.इसी का अभाव हमें सता रहा है.हम अब इसकी खोज में बेहताश भाग रहें हैं,पर सही जगह तलाश नहीं रहें हैं,इसलिए यह मिल भी नहीं रहा है.
हम भौतिक विकास की कितनी ही बुलंदियों को क्यों न छू लें , आंतरिक विकास के अभाव में ये अधूरी ,अपंग एवं चुभन भरी ही रहेंगी . भौतिक जीवन के लिए भौतिक उपलब्धियों की जितनी महत्ता है, उतनी ही आवश्यकता आंतरिक विकास की है.
                                                  अगर ‘ गलोबल विलेज ‘के रूप में दूरियाँ कम हो रही हैं तो भावनात्मक दूरियाँ भी मिटनी चाहिएं; अन्यथा एकांगी विकास की इस दौड़ में उपजी हताशा-निराशा एवं अनेक भावनात्मक एवं मानसिक विकारों से इन्सान अपना बहुमूल्य जीवन गवां सकता है. समस्त मनोविकार दबी-कुचली भावनाओं के परिणाम हैं. आधुनिक युग की इस दौड़ में बहुत आगे निकल जाने वाले इन्सान की समस्या यही है. अतः उसे भौतिक उपलब्धियों के साथ भावनात्मक पोषण की भी आवश्यकता है, जो सहकार, सहयोग, सेवा, अपनापन आदि से ही पाया जा सकता है. इससे सभी प्रकार की दूरियाँ मिट सकती हैं और सर्वांगीण विकास सम्भव हो सकता है. यही है आज का समाधान.
साभार :- अखण्ड ज्योति

Posted in Writing.

8 comments



REGARDING FONT PROLEM

IF  YOU   FACE   FONT  PROBLEM  TO  READ  THE  BLOGS. KINDLY  FOLLOW  THE INSTRUCTIONS   BELOW:-

1.RIGHT  CLICK  THE  MOUSE ON  THE  BLOGS.

2.GO  TO  THE  ENCODING .

3. CHOOSE  UNICODE(UTF-8).

4. YOU  CAN  READ  THE  BLOGS.

Posted in Technical.

8 comments



RAKHWALA

तेरे नैना क्यूँ भर आये, तेरे नैना क्यूँ भर आये,
वो है सबका र'वाला तू , काहे को बराये .

ये आसूँ "र ये ु' सारे , ले ा प्रभु के ्वारे ,

वो ह टूट आस बंधाए, बि?ड़े का संवारे ,

्वार से उसके कोई 'ाल , हाथ ना वापस ाए,

वन क ये धूप ये  छाँव ,सब है 'ेल तमाशा,

मन सं? आँ' मिचौल 'ेले , आशा "र निराशा,

आ है ु' तो कल सु' हो?ा , काहे नर बहाये.

Posted in Poetry.

19 comments



A N U R A D H A’ S K A L A K R I T I

अनुराधा के द्वारा रचित कलाकृति
ये कलाकृति हमारी अनुराधा के द्वारा चित्रित की गयी है. अनुराधा आज हमारे बीच में नहीं है. आज से एक साल पहले 07-07-2007 के दिन अनुराधा 16 साल की अवस्था में ही ईश्वर के चरणों में चली गयी इस नाशवान जगत से हमेशा के लिये . अनुराधा ने अपने नेत्रदान के द्वारा एक पुण्य सेवाकर्म भी किया. ये चित्र अनुराधा ने बिना किसी मार्गदर्शन के अपनी प्रतिभा से ही बनाया है.

यह चित्र अधूरा था इसे अनुराधा ने कुछ ही समय पहले पूरा किया था. मैने इस चित्र के बारे में 13-06-2008 को भी लिखा है.
( categories:- personal) ( my best posts:- ANURADHA’S PAINTING).

I have received only two comments on the 13th june post and I am not satisfy with this. It is a unique painting which was created by ANURADHA . I am repeat this post .please read this post and 13th june post also and send your valuable comments on this and appriciate.

Posted in Poetry.

62 comments



Untitled

पंखों पे अपने क्यों तुम्हें विश्वास ही नही
आकाश का तुमको जरा अहसास ही नहीं


दीवारों दर से भी न कहें किससे हम कहें

सुनने को हाल और कोई पास ही नहीं


इस जिंदगी की राह में हैं हर तरह के पेड़

इसमें बबूल भी हैं अमलतास ही नहीं

अपने गमों के दौर की लम्बी है दास्तान

अपनी खुशी का कुछ मगर इतिहास ही नहीं

तुम हो कि कोई और हो इससे नहीं गरज

अब तो किसी का साथ हमें रास ही नहीं

अपने महीने हैं सभी रमजान की तरह

रोजे हमारे रोज हैं कुछ खास ही नहीं

Posted in Poetry.

152 comments