मिथक और विज्ञान कथाओं मे साम्य की चर्चा को थोडा आगे बढाया जाय .विज्ञान कथाएं हमारे परिचित बिम्बों ,दृश्यों और जाने समझे सामजिक यथार्थों से अलग एक अन्चीन्हे परिदृश्य का सृजन करती हैं क्योंकि उनका विवेच्य अमूमन तौर पर भविष्य होता है -जो हमारे लिए अपरिचित ,अनदेखा रहता है .लेकिन मिथकों के स्वर्ग नरक से भी तो हम परिचित नही होते !जीवित रहते किसने उन्हें देखा है ?अब देखिये न कितने तरह के नरक बताये गए हैं -रौरव नरक ,कुम्भीपाक नरक आदि आदि जिन्हें सुन पढ़ कर भले ही हममे से कितनों की रूह काँप जाती हो मगर हमने उन्हें देखा तो नही है -ऐसे ही विज्ञान कथाओं का रचनाकार निस्सीन ब्रह्माण्ड के अनेक कल्पित ग्रहों उपग्रहों का चित्रण करता है जिन्हें हमने देखा नही है .गरज यह कि दोनों के दृश्य चित्रण से हमारा कोई साबका तो नही है पर यह कितना अद्भुत है कि पुराणकार की लेखनी पर हममे से अधिकांश लोग भरोसा करते हैं ,जबकि बिग्यान कथाकार के समान वर्णनों को अधिकांश सुधी साहित्यिक जन दरकिनार कर जाते है .अर्थात अभी हिन्दी मे बिग्यान कथाओं को विश्वसनीयता हासिल नही है जबकि वे पौराणिक वर्णनों से ज्यादा तर्कसम्मत हैं .हमे उन कारणों को तलाशना होगा कि हिन्दी मानस विज्ञान कथाओं से इतनी दूरी क्यों बनाए हुए है ?पुराणों और विज्ञान कथाओं के कई अन्य समानताओं की चर्चा हम आगे करेंगे -आप धैर्य रखें यह मामला अभी लंबा खिचेगा ….यह सब मैं अपने कर्तव्य बोध के तहत [माफ करें यह लिखना पड़ रहा है ] कर रहा हूँ .यह जान कर खुशी हुयी है कि हिन्दी ब्लॉग जगत के दो शलाका पुरुषों की नजर यहाँ पड़ गयी है आदरणीय रवि रतलामी जी और उन्मुक्त जी जो मेरे लिए कम से कम एक एक हजार पाठकों के समतुल्य हैं ……….पुनश्च……
0 Responses
Stay in touch with the conversation, subscribe to the RSS feed for comments on this post.