हमारे पुराणों मे एक अद्भुत प्रसंग रामराज्य की संकल्पना का है ,जब मैंने आल्दुअस हक्सले की द ब्रेव न्यू वर्ल्ड पढी तो ऐसा लगा कि यह तो मात्र हमारे रामराज्य की संकल्पना का ही विस्तार मात्र है -यद्यपि विज्ञान कथाकारों ने उसे डिस्तोपिया की श्रेणी मे रखा है ,यानी यूटोपिया के ठीक उलट .ब्रेव न्यू वर्ल्ड मे परखनली शिशुओं की दुनिया का अद्भुत वर्णन है जहाँ लोग हर कीमत पर सुखानुभूति चाहते हैं -वहाँ मृत्यु एक आनंदानुभूति है -लोग सोमा नामक बटी खा खा कर दुनियावी परेशानियों से दूर हो सतत आनंद की दुनिया मे गोते लगाते है .वह एक थके हारे समाज के पलायनवादी गत्विधियों का लेखा जोखा है .ये मिथकीय संकल्पनाएँ ऐसी हैं जो विज्ञान कथाओं की प्रकृति और प्रवृति के सर्वथा अनुरूप हैं .जबकि रामराज्य मे सुखानुभूति सहज है सभी स्वतः संतुष्ट हैं आनंदित है -किसी को भी ‘दैहिक दैविक , भौतिक ‘ किसी किस्म का कोई दुःख नही है -सब कुछ सहज सामान्य है .आप रामचरित मानस मे रामराज्य प्रसंग और ब्रेव न्यू वर्ल्ड ख़ुद पढ़ कर देंखे कि चिंतन के स्तर पर कैसे दोनों कृतियों मे अद्भुत साम्य है .एक दूसरा मामला ब्रह्मांड चिंतन का है जिसमे हमारी ऋषि प्रज्ञा आज के विज्ञान कथाकारों के चिंतन से कही भी कम नही लगती .कोई काकभुसुन्डी के भगवान राम के मुहँ मे प्रवेश के पश्चात ब्रह्मांड दर्शन का प्रसंग ध्यान से पढ़ तो ले -यह एक अद्भुत रूपक ही भारतीय वान्ग्मयों की चिंतन की विराटता को विश्व फलक पर स्थापित कर देने मे पूर्णतया क्षम है .यह तो देखिये कि उक्त रूपक मे प्रति ब्रह्मांड तक की चर्चा है -अनगिनत ब्रह्माण्ड तो खैर है हीं .और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के प्राणी भी किसिम किसिम के हैं पर भगवान् राम हर जगहं समान हैं उनमे कोई फर्क नही है .कुछ और दृशटान्त आगे भी ……
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