एक कहो सो अनेक है दीसत, एक अनेक धरे है सरीरा
आदिहि तौ फिर अंतहु भी मद्ध सोई हरि गहिर गंभीरा
गोप कहो सो अगोप सो देखो, जोतिस्वरूप बिचारत हीरा
कहे सुने बिनु कोई न पावै कहि के सुनावत ‘यारी’ फकीरा
- यारी
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एक कहो सो अनेक है दीसत, एक अनेक धरे है सरीरा
आदिहि तौ फिर अंतहु भी मद्ध सोई हरि गहिर गंभीरा
गोप कहो सो अगोप सो देखो, जोतिस्वरूप बिचारत हीरा
कहे सुने बिनु कोई न पावै कहि के सुनावत ‘यारी’ फकीरा
- यारी
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– May 13, 2009
आप को देखकर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया
उनकी आंखो मे कैसे छलकने लगा
मेरे होंठो पे जो माजरा रह गया
ऐसे बिछड़े सभी राह के मोड़ पर
आखिरी हमसफ़र रास्ता रह गया
सोच कर आओ कू ए तमन्ना है ये
जानेमन जो यहाँ रह गया रह गया
- अज़ीज़ क़ैसी
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– May 13, 2009
आँखी से ती जो भी देखिए, सो तो आलम फानी है
कानो से भी जो सुनिए रे सो तो जैसे कहानी है
इस बोलते को उलटि देखै, सोइ आरिफ़ सोइ ग्यानी है
‘यारी’ कहै, यह बूझि देखा, और सबै नादानी है
- यारी
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– May 13, 2009
लाए उस बुत को इल्तजा करके
कुफ्र टूटा खुदा खुदा करके
फिर निगह लौट कर नाही आई
तुझपे कुर्बान हो गयी होगी
क़ासिद तेरी हड़ताल के कुर्बान जाइये
वो आ गये है खुद मेरे खत के जवाब मे
तमाम कुव्वते दिल सर्फे गम हुई वरना
जमीं, जमी ही न होती न आसमां होता
करीब है यारो रोजे महशर , छूपेगा कुश्तो का खून क्योंकर
जो चुप रहेगी ज़बाने खंजर, लहू पुकारेगा आस्तीन का
ये एक पेड़ है आ इससे मिल के रो ले हम
यहाँ से तेरे मेरे रास्ते बदलते है
दिल वो दरवेश है जो आँख उठाता ही नही
इसके दरवाजे पे सौ अहले करम आते है
मुहब्बत से इनायत से वफ़ा से चोट लगती है
बिखरता फूल हूँ मुझको हवा से चोट लगती है
तुझे खुद अपनी मजबूरी का अंदाज़ा नही शायद
न कर अहदेवफा, अहदेवफा से चोट लगती है
मेरे साथ तुम भी दुआ करो, यूँ किसी के हक़ मे बुरा न हो
कही और हो न यह हादसा, कोई रास्ते मे जुदा न हो
वो फरिश्ते आप तलाश करिए कहानियों की किताब मे
जो बुरा कहें न बुरा सुने कोई शख्स उनसे खफा न हो
शाम के बाद कचहरी का थका सन्नाटा
बेगुनाही को अदालत के हुनर याद आए
वही ताज है वही तख्त है वही जहर है वही जाम है
ये वही खुदा की जमीन है, ये वही बूतों का निज़ाम है
उड़ने दो परिंदो को अभी शोख हवा मे
फिर लौट के बचपन के जमाने नही आते
कोई फ़ैसला इतनी जल्दी न कर
जरा देर की जान पहचान मे
बड़े ताजिरो की सताई हुई
ये दुनिया है दुल्हन जलाई हुई
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– May 13, 2009
जँह मूल न डार न पत है रे, बिन सीचे बाग सहज फूला
बिन डाँडी का फूल है रे, निर्बास के बास भंवर भूला
दरियाव के पार हिंडोलना रे कोउ बिरही बिरला जा झूला
‘यारी’ कहै उस झूलने मे, झूलै कोउ आसिक दोला
- यारी
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– May 13, 2009
उस मोड़ पे हम दोनो कुछ देर बहुत रोए
जिस मोड़ से दुनिया को इक रास्ता जाता है
दोनो से चलो पूछे, उनको कही देखा है
इक काफिला आता है, इक काफिला जाता है
दुनिया मे कही इनकी तालीम नही होती
दो चार किताबों को घर मे पढ़ा जाता है
राहों मे कौन आया गया कुछ पता नही
उसको तलाश करते रहे जो मिला नही
हमको बेकार लिए फिरते हो बाजारों मे
हम न युसुफ है न युसुफ के खरीदारों मे
इंसान अपने आप मे मजबूर है बहुत
कोई नही हा बेवफा अफसोस मत करो
ये देखो फिर से आ गयी फूलों पे तितलियां
इक रोज वो भी आएगा अफसोस मत करो
अब किसे चाहें किसे ढूँढा करे
वो भी आखिर मिल गा अब क्या करें
सवेरे मेरी इन आँखों ने देखा
खुदा चारो तरफ बिखरा पड़ा है
हर जनम मे उसी की चाहत थे
हम किसी और की अमानत थे
मेरी इन आँखों ने अक्सर गम के दोनो पहलू देखे
ठहर गया तो पत्थर आँसू, बह निकला तो दरिया आँसू
न कोई खुशी न मलाल है की सभी का एक सा हाल है
तेरे सुख के दिन भी गुजर गये, मेरी गम की रात भी कट गयी
मैं अपनी राह मे दीवार बन के बैठा हूँ
अगर वो आया तो किस रास्ते से आएगा
रोते क्यों हो दिलवालों की किस्मत ऐसी होती है
सारी रात यूँ ही जागोगे दिन निकले तो सो लेना
सब नजर का फरेब है वरना
कोई होता नही किसी की तरह
चुपचाप उनको बैठ के देखूँ तमाम रात
जागा हुआ भी हो कोई सोया हुआ भी हो
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– May 13, 2009
काम आखिर जज़्बा ए बेइख्तियार आ ही गया
दिल कुछ इस सूरत से तड़पा उनको प्यार आ ही गया
इस तरह खुश हूँ किसी के वादा ए फर्दा पे मैं
दर हक़ीक़त जैसे मुझको एतबार आ ही गया
हाय काफिर दिल की ये काफिर जुनून अंगेजियाँ
तुम को प्यार आए न आए मुझको प्यार आ ही गया
- जिगर
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– May 13, 2009
जब रामनाम कहि गावैगा, तब भेद अभेद सामावैगा
जो सुख हैं या रस के परसे, सो सुख का कहि गावैगा
गुरु परसाद भाई अनुभौ मति, बिस अमृत सम धावैगा
कह रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरही पावैगा
- रैदास
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– May 13, 2009
किस कदर जख्म जख्म चेहरा है
चाँद भी आदमी सा लगता है
जमाना रस्मे वफ़ा का जो कद्रदान होता
हमारा नाम न जाने कहाँ कहाँ होता
तुमने मेरी मज़ार पे आ कर जो मुश्करा दिया
बिजली कड़क के गिर पड़ी सारा कफन जला दिया
सुने जाते न थे तुमसे मेरे दिन रात के शिकवे
कफन सरकाओ मेरी बेजवानी देखते जाओ
तुम कहोगे तो ये पत्थर को खुदा मानेगा
दिल तो कमबख्त है क्या मेरा कहा मानेगा
वो चल चल के रूकना किसी का गजब
वो फिर फिर के अपनी कमर देखना
हर तरफ ऐतराज होता है
मैं अगर रोशनी मे आता हूँ
तेरी जुल्फ एलान फर्मा रही है
बड़ी मूसलाधार बरसात होगी
काबे का एहतराम भी मेरी नजर मे है
सर किस तरफ झुकाऊँ तुझे देखने के बाद
ऐ मौत, बशर की जिंदगी आज
तेरा एहसान हो गयी है
अब तो ये भी नही रहा एहसास
दर्द होता है या नही होता
एहसास मर न जाए तो इंसान के लिए
काफी है एक राह की ठोकर लगी हुई
जब भी निकला हूँ मैं औकात की सरहद के परे
मेरे हमराह चले आए जमाने कितने
‘अमीर’ उस रास्ते से जो गुजरते है वो लुटते है
मुहल्ला है हसीनो का या कज़्ज़ाक़ो की बस्ती है
हो चुका कतए ताल्लुक तो ज़फ़ाएँ क्यों हो
जिनको मतलब नही रहता वो सताते भी नही
मुझे मालूम है उसका ठिकाना फिर कहाँ होगा
परिंदा आसमां छूने मे जब नाकाम हो जाए
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली मे जिंदगी की शाम हो जाए
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– May 13, 2009
‘वसीम’ उसके ही घर और उसपे ही तन्कीद
यही बहुत है की उसने तुम्हे उठा न दिया
खुद चलो तो चलो आसरा कौन दे
भीड़ के दौर मे रास्ता कौन दे
यह जमाना अकेले मुसाफिर का है
इस जमाने को फिर रहनुमा कौन दे
अपने आगे किसी को समझता नही
उसके हाथों मे इक आईना कौन दे
दिल सभी का दुखा है मगर ऐ ‘वसीम’
देखना है उसे बददुआ कौन दे
कुछ इतना खौफ का मारा हुआ भी प्यार ना हो
वो ऐतबार दिलाए और ऐतबार ना हो
क्या दुख है समंदर को बता भी नही सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नही सकता
देखा तो हुस्ने यार तबीयत मचल गयी
आंखो का था कुसूर, छुरी दिल पे चल गयी
कोई कसूरवार नही इनमे दोस्तों
जो कुछ भ है, हुए है खुद अपनी खुशी से हम
कितना है बदनसीब ‘ज़फर’ दफ़्न के लिए
दो गज जमीन भी न मिली कू ए यार मे
अपना ही वहाँ कू ब कू बोला
मैं ये समझा कहीं से तू बोला
खुश्क़ बातों मे कहाँ है शैख कैफे जिंदगी
वह तो पीकर ही मिलेगा जो मजा पीने मे है
खुद किस्सा ए गम अपना कोताह किया मैने
दुनिया ने बहुत चाहा अफसाना बना देना
कोफ़्त से जान लब पे आई है
हमने क्या दिल पे चोट खाई है
हवा चली तो बदन क्यों लरज उठा ‘मिदहत’
मैं इससे पहले तो इतना कभी खतर मे न था
कातिल ने किस सफाई से धोई है आस्तीन
उसको खबर नही की लहू बोलता भी है
बहुत शोर सुनते थे पहलू मे दिल का
जो चीरा तो इक कतरा ए खून न निकला
इस शहर मे दुश्मन तो मेरा कोई नही था
फिर किसने मुझे कत्ल किया सोच रहा हूँ
न दुनिया ने थामा न तूने संभाला
कहाँ आ के मेरे कदम डगमगाये
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– May 13, 2009