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जय श्री कृष्ण

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जय
 श्री कृष्ण

कई पुरुष द्रव्यसंबंधी यज्ञ करें,
कितने तपस्या रूप यज्ञ करें,
कई योग रूप यज्ञ करते,
कितने अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों
से युक्त यत्नशील पुरुष,
स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करते हैं 4 श्ल 28

और भी -

अपाने जुव्हति प्राणं प्राणेपानं तथापरे.
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः..

 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 29


जय श्री कृष्ण



जय श्री कृष्ण

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हिन्दी अनुवाद -

दूसरे योगीजन इंद्रियों,
तथा प्राणों की क्रियाओं को देखते हैं,
फिर
ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयम योगरूप,
अग्नि में हवन कर देते हैं.

आगे -

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे,
स्वाध्यायज्ञानयज्ञयाश्च यतयः संशितव्रताः.


जय श्री कृष्ण

 


 

जय श्री कृष्ण
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अन्य योगी सन्यमाग्नि में,
श्रोत्रादि समस्त इंद्रियों  को हवन करते हैं,
दूसरे कई योगी शब्दादि समस्त विषयों को,
इंद्रिय रूप अग्नि में हवन करते हैं. .4 श्ल. 26

और - 

सर्वानीन्द्रीयकर्मानी प्राणकर्मानी चापरे.
आत्मसंयमयोगागनौ जुह्वति ज्ञानदीपिते..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 27

   


जय श्री कृष्ण

 


जय श्री कृष्ण
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हिन्दी अर्थ -

दूसरे कई योगीजन,
देवता पूजन यज्ञ का,
भलीभांति अनुष्ठान करते हैं,
और कई परब्रह्म परमात्मा,
रूप अग्नि में अभेददर्शन रूप,
यज्ञ के द्वारा आत्मरूप यज्ञ,
का हवन करते हैं. 4 श्ल. 25

और -

श्रोत्रादिनीन्द्रियन्ये संयामागनीषु जुव्हती.
शब्दादिन्विश्यान्य इन्द्रियाग्निशु जुव्हती..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 26


जय श्री कृष्ण

जय श्री कृष्ण
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हिन्दी अनुवाद -

जिस
 यज्ञ में अर्पण ब्रह्म है,
हवन किया द्रव्य ब्रह्म है,
और ब्रह्म कर्ता द्वारा,
ब्रह्म रूप अग्नि में,
आहुति भी ब्रह्म है,
उस ब्रह्म कर्म में,
प्राप्त फल भी ब्रह्म है. .4 श्ल. 24

और -


दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते.
ब्रह्मग्नावपरे यज्ञं यग्नेनैवोपजुव्हति..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 25


जय श्री कृष्ण



जय श्री कृष्ण
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हिन्दी अर्थ -

जिसकी आसक्ति नष्ट हुई है,
जिसमें देहाभिमान नहीं,
जो ममता से रहित है,
जो सदैव परमात्मा में स्थित है,
ऐसे यज्ञ संपादन हेतु कर्मी के,
सारे कर्म विलीन हो जाते हैं. .4 श्ल. 23


और -

ब्रह्मार्पणम ब्रह्म हविर्ब्रह्मग्नौ ब्रह्मणा हुतम्.
ब्रह्म्नैव तेन गंतव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 24


जय श्री कृष्ण

 जय श्री कृष्ण
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हिन्दी अर्थ -

जो रहे संतुष्ट स्वप्राप्त वस्तु से,
जो रहे ईर्ष्या हर्ष शोक से दूर,
ऐसा सिद्धि असिद्दि में सम,
कर्म करते भी मुक्त रहे.

श्री मद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 22

और 

गतसन्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः.
यज्ञायाचरतः कर्म स्मग्रम प्रविलीयते..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 23


जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण

हिन्दी अनुवाद -

अंदर बाहर वश में जिसके,
इन्द्रियाँ भी हैं जीती जिसने,
भोगों को त्याग दिया है जिसने,
आशा रहित ऐसा व्यक्ति,
शरीर निर्वाह कर्म करते भी,
नहीं पाप का भागी जगमें.

आगे -

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः.
समः सिद्धावसिद्धौ च कृतवापि न निबध्यते..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 22


जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण

हिन्दी अनुवाद -

व्यक्ति जो कर्मों और उनके फलों में आसक्ति से,
संसारी आसरे से रहित रहे,
परमात्मा में तृप्त हुआ सर्व कर्मों को करते भी,
कुच्छ नहीं करे. अ. 4 श्ल. 20

आगे -

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यॅक्तसर्वपारिग्रहः.
शारीरम् केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 21.


जय श्री कृष्ण


जय श्री कृष्ण

हिन्दी अनुवाद -

संपूर्ण कर्म जिसके,
कामसंकल्प रहित जाने,
ज्ञानाग्नि में भस्म,
ज्ञानी भी उसे पंडित माने. अ. 4 श्ल.19

आगे -

त्यक्त्वा कर्मफलासंगम नित्यत्रुप्तो निराश्रयः.
कर्मन्यभिप्रव्रुतो$पि नैव किन्चित्करोति सः..

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 20