February 2010
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जय श्री कृष्ण

 
ॐ जय श्री कृष्णअन्य योगी सन्यमाग्नि में,श्रोत्रादि समस्त इंद्रियों  को हवन करते हैं,दूसरे कई योगी शब्दादि समस्त विषयों को,इंद्रिय रूप अग्नि में हवन करते हैं. अ.4 श्ल. 26और - सर्वानीन्द्रीयकर्मानी प्राणकर्मानी चापरे.आत्मसंयमयोगागनौ जुह्वति ज्ञानदीपिते..श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 27   


जय श्री कृष्ण

 
जय श्री कृष्णहिन्दी अर्थ - दूसरे कई योगीजन,देवता पूजन यज्ञ का,भलीभांति अनुष्ठान करते हैं,और कई परब्रह्म परमात्मा,रूप अग्नि में अभेददर्शन रूप,यज्ञ के द्वारा आत्मरूप यज्ञ,का हवन करते हैं.  अ. 4 श्ल. 25और -श्रोत्रादिनीन्द्रियन्ये संयामागनीषु जुव्हती.शब्दादिन्विश्यान्य इन्द्रियाग्निशु जुव्हती..श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 26