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जय श्री कृष्णकई पुरुष द्रव्यसंबंधी यज्ञ करें,कितने तपस्या रूप यज्ञ करें,कई योग रूप यज्ञ करते,कितने अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतोंसे युक्त यत्नशील पुरुष,स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करते हैं. अ 4 श्ल 28और भी -अपाने जुव्हति प्राणं प्राणेपानं तथापरे.प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः.. श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 29
जय श्री कृष्णहिन्दी अनुवाद -जिस यज्ञ में अर्पण ब्रह्म है,हवन किया द्रव्य ब्रह्म है,और ब्रह्म कर्ता द्वारा,ब्रह्म रूप अग्नि में,आहुति भी ब्रह्म है,उस ब्रह्म कर्म में,प्राप्त फल भी ब्रह्म है. अ.4 श्ल. 24और -
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते.ब्रह्मग्नावपरे यज्ञं यग्नेनैवोपजुव्हति..श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 25
ॐजय श्री कृष्णहिन्दी अर्थ -जिसकी आसक्ति नष्ट हुई है,जिसमें देहाभिमान नहीं,जो ममता से रहित है,जो सदैव परमात्मा में स्थित है,ऐसे यज्ञ संपादन हेतु कर्मी के,सारे कर्म विलीन हो जाते हैं. स.4 श्ल. 23
और -ब्रह्मार्पणम ब्रह्म हविर्ब्रह्मग्नौ ब्रह्मणा हुतम्.ब्रह्म्नैव तेन गंतव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना..श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 24
जय श्री कृष्णहिन्दी अर्थ -जो रहे संतुष्ट स्वप्राप्त वस्तु से,जो रहे ईर्ष्या हर्ष शोक से दूर,ऐसा सिद्धि असिद्दि में सम,कर्म करते भी मुक्त रहे. श्री मद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 22और गतसन्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः.यज्ञायाचरतः कर्म स्मग्रम प्रविलीयते..श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 23
ॐजय श्री कृष्ण
हिन्दी अनुवाद -
अंदर बाहर वश में जिसके,इन्द्रियाँ भी हैं जीती जिसने,भोगों को त्याग दिया है जिसने,आशा रहित ऐसा व्यक्ति,शरीर निर्वाह कर्म करते भी, नहीं पाप का भागी जगमें.
आगे -
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः.समः सिद्धावसिद्धौ च कृतवापि न निबध्यते..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 22
ॐजय श्री कृष्ण
हिन्दी अनुवाद -
व्यक्ति जो कर्मों और उनके फलों में आसक्ति से,संसारी आसरे से रहित रहे, परमात्मा में तृप्त हुआ सर्व कर्मों को करते भी,कुच्छ नहीं करे. अ. 4 श्ल. 20
आगे -
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यॅक्तसर्वपारिग्रहः.शारीरम् केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 21.
ॐजय श्री कृष्ण
हिन्दी अनुवाद -
संपूर्ण कर्म जिसके,कामसंकल्प रहित जाने,ज्ञानाग्नि में भस्म,ज्ञानी भी उसे पंडित माने. अ. 4 श्ल.19
आगे -
त्यक्त्वा कर्मफलासंगम नित्यत्रुप्तो निराश्रयः.कर्मन्यभिप्रव्रुतो$पि नैव किन्चित्करोति सः..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 20
ॐजय श्री कृष्ण
हिन्दी अनुवाद -
मनुष्य जो कर्म में अकर्म, अकर्म में कर्म देखे, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है,वही योगी समस्त कर्मों का करने वाला है,वही सज्ञान है. आ.4 श्ल. 18
आगे -
यस्य सर्वे समारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः.ज्ञानागनिदग्ध्कर्मणम तमाहुः पंडितम् बुधाः..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 19
ॐजय श्री कृष्ण
हिन्दी अनुवाद -
कर्म का स्वरूप भी जानो,अकर्म का भी,और विकर्म का भी जानो,गहन कर्म की गति तभी. अ.4 श्ल. 17
आगे -
कर्मन्यकर्म य: पश्येद्कर्मनि च कर्म य:.स बुद्धिमांमनुष्येषु स युक्त कृतसनकर्मकृत.
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 18
ॐजय श्री कृष्ण
हिन्दी अनुवाद -
कर्म और अकर्म क्या हैं?बुद्धिमान भी मोहित हो जाएँ,इसीसे कहूँगा इसका भेद,जिसे जान बंधन मुक्त हो पाएँ. अ.4 श्ल.16
आगे -
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः.अकर्मनश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः..
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 17
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